१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसे मुंह मोड़ लिया । भारत माता की तलवार विजयी होकर चमकती हुई आगे बढ़ीं। आकाश में सूर्य और धरती पर लक्ष्मी-दोनों आगे बढ़ रहे थे। दोपहर हुई। रानी नहीं रुकीं। सांझ हुई। सूर्यदेव थककर क्षितिज के पीछे जा छिपे। रानी नहीं थकी। वह बढ़ती गई। दौड़ते-दौड़ते रानी कालपी पहुंची। एक सौ दो मील का सफर और वह भी बॉकर जैसे योद्धा के साथ जूझते हुए-पीठ पर एक बालक का बोझ लेकर रानी ने तय किया। वह घोड़ा कालपी तक रानी को सुरक्षित पहुंचाने के लिए ही प्राण धारण किए हुए था। अमूल्य रत्न को अपनी पीठ पर से उतारने के बाद वह लड़खड़ाता और स्वर्ग सिधार गया। छह आदमियों को उसकी अंतिम क्रिया में तुरंत लगाया गया। वह घोड़ा रानी को अत्यंत प्यारा था। जिस घोड़े ने इतनी ईमानदारी से अपने प्राण देकर भी अपने जिस कर्तव्य का पालन किया, उसकी स्मृति सदा के लिए प्यारी रहेगी। रानी ने सवेरे तक आराम किया। सुबह रानी और राव साहब पेशवा का हृदयवेधक साक्षात्कार हुआ। दोनों को अपने पूर्वजों का स्मरण हुआ, जिन्होंने असंभव को संभव बनाने के लिए बड़े-बड़े काम किए। ऐसे महापुरुषों में जन्म लेने का सौभाग्य दोनों को प्राप्त था उन्हें इस बात से प्रेरणा मिलती थी मराठों का झंडा अटक पर लहराने का कारण था-शिंदे, होलकर, गायकवाड़, बुंदेले और पटवर्द्धन का स्वराज्य के लिए अपने प्राणों के उत्सर्ग के लिए कृतसंकल्प होना। जिसके लिए उनके पूर्वजों ने अपना खून बहाया था, उसी झंडे, उसी स्वराज्य के लिए शुरू हुए युद्ध को अंत तक निभाने के लिए दोनों ने प्रण किया। स्वदेश को भ्रष्ट करनेवालों से वह युद्ध लड़ा जा रहा था। पुनः लक्ष्मीबाई तथा तात्या टोपे ने घनघोर संग्राम की सिद्धता के लिए युद्ध शुरू किया। इन दोनों को युद्ध में तत्पर छोड़ अब हम ब्रिगेडियर विटलॉक की गतिविधि पर सरसरी निगाह डालेंगे, जिसे हम कुछ पहले छोड़ चुके हैं। नर्मदा तथा गंगा-यमुना के प्रदेश को फिर से जीतने के लिए दो सेनाएं चली थीं। उनमें एक ने ह्यू रोज के नेतृत्व में झांसी को जीत लिया। झांसी जीतने के बाद वहां अराजकता फैली। लूट के काम में तो नादिरशाह की बराबरी की गई। मंदिर-मूर्तियां तोड़ी गई। भयंकर हत्याकांड हुआ। उसके बाद मुहिम जारी रखने के लिए यह सेना कालपी की ओर बढ़ने वाली थी। इसका अंतिम भाग पूरा करने का भार ब्रिगेडियर विटलॉक को सौंपा गया। विटलॉक काली पलटन, गोरा और काला रिसाला और उत्कृष्ट तोपखाना था। बड़ी शान के साथ उसने सागर में प्रवेश किया। अंग्रेजभक्त आरेछा नरेश उससे मिला। यहां से यह सेना बांदा के नवाब को जीतने चली, जो उस प्रांत के मुख्य क्रांति-नेता थे। क्रांति की पहली लहर में झांसी, सागर और अन्य स्थानों में क्रूर कत्ल थे। वहां के गोरे जहां शरण मिली वहां जान बचाने भाग गए। बांदा के नवाब ने उन्हें अपने राजमहल में सुरक्षित रखा था और 1857 का स्वातंत्र्य समर – 368