भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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किरवी रियासत खालसा में मिलाई गई। विजित प्रदेश में ‘शांति’ स्थापना के लिए विटलॉक महोबा में छावनी डाल रहा था। दरअसल उसने अपनी मुहिम पूरी की थी। बुंदेलखंड का पूर्वी भाग जीत लिया था। एक-दो छोटी जगहों में शांति कायम करने के लिए कुछ दस्ते भेजे थे। अब विटलॉक को यहीं छोड़ झांसी की रानी के पवित्र चरणों का दर्शन करें।

अब रानी ने पेशवा की सेना के साथ कालपी से बयालीस मील दूर कंच गांव को कूच किया। लेकिन ऐसा अनुमान है कि रानी की सूचना के अनुसार सेना की व्यूह-रचना राव साहब ने नहीं की थी। ध्यान रहे, राव साहब या तात्या टोपे के लिए पूरी तरह प्रबंध करना असंभव-सा था। यद्यपि उनके साथ बांदा का नवाब, शाहगढ़ नरेश, बानापुर के राजा-ये सब एक ही झंडे के नीचे इकट्ठे हुए थे; फिर भी एक विशाल सैनिक संगठन के अंतर्गत अनुशासित होकर नहीं आए थे। कोई ऐसा संगठन नहीं था जो एक स्वर से संचालित हो, एक सुनिश्चित विधान के अनुसार चले। प्रत्येक अपनी अलग योजना बनाता, इससे किसी की योजना पर पूरा अमल न हो पाता था। दूसरी ओर शत्रु दल के नेताओं में कोई झगड़ा न था; उनका संगठन व्यवस्थित और अच्छी तरह अनुशासित था। सर ह्यू रोज के सेनानी नियुक्त होने से पहले अफवाहों और मतभेदों का बाजार गरम रहा। लेकिन एक बार जब उसकी नियुक्ति हुई कि उसका मत ही सबका मत था। वह जो भी आज्ञा देता वह ठीक मानी जाती, उसका पालन होता। किसी साधारण सेनानी की आज्ञा का भी, चाहे वह गलत ही हो, पालन एकता के साथ हो तो सफलता निश्चित ही है। इसके विपरीत, यदि सैनिक अपनी सनक को महत्त्व दें, शासन में संगठन न हो, सुयोग्य सेनानी की विचारपूर्ण आज्ञा भी पराजय का कारण बनती है। यदि यह तथ्य गलत है तो कंच गांव में जो पराजय हुई, वह कभी न होती।

झांसी सेसर ह्यू रोज के आते ही क्रांतिकारियों से कंच गांव में मुठभेड़ हुई। दोपहर की कड़ी धूप गोरे सह नहीं सकते, यह जानकर क्रांतिकारियों के एक आज्ञापत्र में लिख था-‘सवेरे दस बजे के पहले फिरंगियों से कोई मुठभेड़ न करे, सदा ही दस के बाद लड़ाई हो।’इस सूझ-बूझकर आज्ञा का उस दिन पालन हुआ। जैसाकि अन्य स्थानों में हुआ था, दस बजने के बाद जहां लड़ाई शुरु होती, अंग्रेजों की छावनी में कुहराम मच जाता, आज ऐसा ही हुआ। इसपर भी कंच गावं में क्रांतिकारियों की हार हुई और उन्हें कालपी की ओर हटना पड़ा। जिस सराहनीय ढंग से पीछे हटे, जिस संगठित ढंग से

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162 — बागी माना जाए। इस नीचता का कारण यह था कि गोरे सैनिकों को उनकी कठिन लड़ाइयों तथा चिलचिलाती धूप में कष्ट उठाने का पुरस्कार किरवी के खजाने में ही भरा पड़ा था। वहां के तहखाने आदि में अनमोल हीरे तथा जेवरात थे। इस संपत्ति के लालच में यह अन्याय किया गया।‘‘ –के एवं मैलसन कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 5, पृष्ठ 140–41