भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 418 में से

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पृष्ठ 366

मोर्चे छोड़ते गए, शत्रु ने इसकी अत्यंत प्रशंसा की है।163 काश, यह असंगठन अनुशासनहीनता पराजय से पहले दूर कर दी जाती! ˙ ˙ इसके बाद क्रांतिकारी कालपी पहुंचे और पराजय का दोष एक-दूसरे पर मढ़ने लगे; पैदल सेना ने रिसाले को कोसा, सिाले ने झांसीवालों की निंदा की और सब मिलकर तात्या टोपे की गलती बताई। किंतु इस आपसी बखेड़े को देखने तात्या कालपी पहुंचा ही न था। वह तो जालवण के पास चरखी गांव में अपने पिता से मिलने गया था। ध्यान रहे, रास्ते में ग्वालियर पड़त्रता है, उसके बाद वह और कहां जा सकता है? हम आशा करते हैं कि पिता-पुत्र की भेंट अत्यंत प्रेमपूर्वक तथा आनंद से हो; और फिर इस महान् क्रांतिकारी नेता को अपनी योजनाओं के कार्यान्वयन में यश प्राप्त हो। इस मनचाही यात्रा में तात्या के चले जाने के बाद रानी लक्ष्मीबाई पेशवा के शिविर में गईं। कंच गांव के पराभव से पेशवा को बड़ा दुःख हुआ। अपने ओजपूर्ण शब्दों से उनकी उदासी को दूर करते हुए तथा धीरज बंधाते हुए वीरांगना रानी ने कहा, “आप यदि सेना को फिर से संगठित करें तो शत्रु उसपर कभी विजय नहीं पा सकता।‘‘ रानी के शब्दों से बांदा के नवाब को उत्साह प्राप्त हुआ। ओजपूर्ण शब्दों में रचे घोषणापत्र फिर से क्रांति-सेना में वितरित हुए । आज यमुना के किनारे भीड़ जमा हो रही थी। तलवारें और तोपें चमकती हैं; मातृभूमि की साधना में रत सिपाही यमुना मैया से आशीर्वाद मांग रहे हैं। इस तरह का मेला यमुना किनारे पहले कभी किसी ने नहीं देखा होगा। सब ओर मातृभूमि और धर्म की जय-जयकार हो रही है-‘जय यमुना मैया! तुम्हारा पवित्र जल हाथ में लेकर हम प्रतिज्ञा करते हैं कि फिरंगी नष्ट होगा। देश स्वतंत्र होगा। स्वधर्म की पुनःस्थापना होगी। मां यमुना! यह सब होगा, तभी हम जिंदा रहेंगे, नहीं तो रणभूमि में सदैव के लिए सो जाएंगे। कालिंदी माता, हम तीन बार प्रतिज्ञा करते हैं।‘ तीन बार शपथ ग्रहण किए वीरों! मैदान में बढ़ो। रण-लक्ष्मी तुम्हें उत्तर की ओर बुला रही है। राव साहब सारी सेना का नेतृत्व करेंगे। ह्यू रोज के नेतृत्व में चलने वाली 1857 का स्वातंत्र्य समर - 371 163 सं. 49 ‘‘फिर बागियों ने वह काम किया जिसकी प्रशंसा उनके शत्रुओं को भी करनी पड़ी। पीछे हटने का कार्यक्रम उन्होंने इस तरह पूरा किया कि उसका जोड़ पाना असंभव है। अंग्रेज अफसरों ने उन्हें जो पाठ अच्छी तरह पढ़ाए थे, उनको ठीक तरह ध्यान में रखा गया था। किसी प्रकार की जल्दबाजी, अव्यवस्था तनिक भी न थी, पीछे भागने का नाम नहीं। रणक्षेत्र का संचालन आदि सबकुछ व्यवस्थित था। दो मील लंबी मुठभेड़ का हरावाल हाने पर भी किसी पर भी किसी जगह घबराहट नहीं थी। सैनिक गोली चलाते, फिर पीछे की पाती की ओर दौड़ते और अपनी बंदूकें भरते। फिर आगेवाले गोलियां चलाते और पीछे अपनी जगह पर हट जाते। पीछा करनेवाले यदि बहुत जोर करते तो वे डटकर खड़े हो जाते और घमासान लड़ाई पर मजबूर करते।‘‘-मैलसन कृत-‘इंडियन म्यूटिनी’, खंड 5, पृष्ठ 124 । (शत्रु द्वारा की गई इस प्रशंसा से ‘पांडे’ की सेना का श्रेष्ठतव निखर पड़ता है।)

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