भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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25वीं पैदल पलटन को भगा दो। ये सब अहिंदी हैं-इन देशद्रोहियों को भगा दो। यह मेजर आर्क बढ़ा क्या? उसकी भी वही गत कर दो। कालपी के सामने के मैदान में हिलोरनेवाले हिस्से की सेना को सुरक्षित रखने पर हमारी स्थिति लगभग अजेय है। देखो, सेना मुख पीछे हट रहा है। वह बहुत अधिक आगे बढ़ गया था और पीछे से पूरी सहायता न मिलने पर उसे पीछे हटना पड़ा है। रान लक्ष्मी, तुम उनकी रक्षा के लिए दौड़ो। तलवार हाथ में लिये हुए अपनी सेना को बचाने बिजली की तरह वह दौड़ पड़ी। अंग्रेजों के दाएं पार्श्व पर लाला गणवेशधारी सवारों के साथ टूट पड़ी। अंग्रेज एकदम ठंडे पड़े-हमला इतना जोरदार था! लाचार हो पीछे हटने लगे। इक्कीस साल की लड़की की बिजली-सी झपट, उसके घोड़े का वायु वेग से दौड़ना, दांह-बाएं गाजर मूली की तरह उसका अंग्रेजों को काटना-इन सबको देख कौन होगा जो लड़ने को तत्पर न होगा? रानी ने अपने रण-कौशल से सभी क्रांतिकारियों का उत्साह बढ़ाया। भीषण युद्ध शुरू हुआ। हलकी तोपों पर धावा बोल दिया। तोपची भागे। घोड़ों पर चलनेवाला तोपखाना तितर-बितर हो गया। क्रांतिवीर चारों ओर से आगे बढ़ने लगे। आज तक हाथ में न आनेवाले फिरंगी को मटियामेट करने का मौका मिलने से वे आनंदित हो उठे। उन सबके आगे रानी लक्ष्मीबाई चल रही थीं। इस आकस्मिक धावे को देखकर ह्यू रोज चौंक पड़ा। वह अपने इमदादी ऊंटों को लेकर आगे बढ़ा; किसी तरह ऊंटों को कारण अंग्रेजों ने अपनी प्राणरक्षा की । एक अंग्रेज का कथन है, "यदि पंद्रह मिनट और बीत जाते तो क्रांतिकारियों ने हमारा सफाया कर दिया होता। इमदादी डेढ़ सौ ऊंटों ने ही उस दिन हमारा उद्धार किया। और उसी दिन से सचमुच मैं ऊंट को प्यार की नज़र से देखने लगा।" केवल ऊंटों के काफिले ने 22 मई को पेशवा की सेना को कालपी तक पीछे हटने को मजबूर किया। कुछ मुठभेड़ों के बाद 24 मई को ह्यू रोज कालपी में घुस पड़ा। तात्या टोपे तथा पेशवा राव साहब द्वारा कालपी किले में एकत्र की गई-सामग्री अनायास ही अंग्रेजों के हाथ लगी। साठ हजार रतल बारूद भूमि में गड़ी पाई गई। नई बंदूकें, पीतल की तोपों के गोलें, उन्हें बनाने के यंत्र, ढेरों सैनिक गणवेश, झंडे, मारू बाजे, फ्रांसीसी तुरहियां, यूरोप में बनी गरनाल तोपें तथ कई प्रकार के शस्त्रास्त्र आदि युद्धोपयोगी सामग्री अंग्रेजों के हाथ लगी। अगर हाथ न लगे तो शूरवीर चिरस्मरणीय क्रांति नेता, क्योंकि कालपी का संपूर्ण पतन होने के पहले एक सप्ताह तक राव साहब, बांदा का नवाब, रानी लक्ष्मीबाई और अन्य नेता वहां से गायब होकर किसी अज्ञात स्थान को चले गए थे। निस्सहाय, निःशस्त्र इन नेताओं को मारे-मारे फिरकर, भूखों भटककर या तो शत्रु के चंगुल में पकड़ा जाने 1857 का स्वातंत्र्य समर – 372