१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 368, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंया आत्महत्या करने के अतिरिक्त और कोई चारा न था। इस तरह, यमुना के उत्तर कांठे का प्रदेश फिर से हड़पकर विजयी कैंपबेल हिमालय तक पहुंच गया। इधर ह्यू रोज और विटलॉक ने नर्मदा से प्रारंभ कर यमुना के दक्षिणी कांठे के प्रदेश पर दखल किया। क्रांतिकारियों का पूरा सफाया करने पर अंग्रेजों को हक था किवे अपना अभिनंदन करें। ह्यू रोज ने अपने सैनिकों का अभिनंदन इन शब्दों में किया है—“वीर सैनिकों! तुमने एक हजार मील का प्रदेश रौंदकर शत्रु से सौ तोपें छीन ली हैं। नदियों को तैरकर, पहाड़–टीले लांघकर, जंगलों, दर्रों, उपत्यकाओं में शत्रु का सफाया कर असीम प्रदेश अपने देश की प्रतिष्ठा में चार चांद लगाए हैं। वीर तो तुम हो ही, पर अनुशासन के साहसी वीरता का मूल्य नहीं होता। अत्यंत कठिन परिस्थितियों में , कठोर यंत्रणाओं में भी तुमने अपने अधिकारियों की आज्ञा का पालन ज्यों-का-त्यों किया है। आज्ञा भंग करने या उददंडता का तनिक भी परिचय नहीं दिया। यमुना से नर्मदा तक तुमने अपने अद्वितीय सैनिक अनुशासन से महान् महान विजय प्राप्त की है।” वीर स्तुतिपूर्ण और प्रभावशाली वक्तव्य देकर ह्यू रोज स्वास्थ्य के कारण सैनिक सेना से निवृत्त हुआ। उसकी विजयी सेना भी शत्रु की पूरी हार होने से छुटकारे की सांस लेकर आराम की अपेक्षा करने लगी। लेकिन अंग्रेज सैनिकों, अभी आराम की क्यों सोचते हो? अभी तो तात्या और लक्ष्मीबाई जीवित हैं। और यदि स्वेच्छा से रण के लिए तैयार नहीं होंगे तो ग्वालियर की सेना युद्धभूमि में खदेड़ने के लिए कटिबद्ध है। कालपी से छिटककर सभी क्रांति नेता आगामी योजना बनाने के लिए गोपालपूर में जमा हो गए। वास्तव में इस समय विजय के कोई आसार नहीं थे। नर्मदा से यमुना तक और यमुना से हिमाचल तक सारा प्रदेश अंग्रेज फिर से जीत चुके थे। क्रांतिकारियों के पास सैन्यबल नहीं था, किले आदि भी नहीं थे, बराबर हार होते रहने से नई सेना का संगठन करना भी असंभव-सा ही था। परंतु तात्या जीवित है, यही पर्याप्त है। रानी लक्ष्मी भी वहां थीं, तात्या गोपालपुर लौट आया था। लोगों में यह खबर उड़ी कि वह अपने पिता से मिल आया है। खबर झूठ हो या सच, पर इतिहास इसका कोई प्रमाण नहीं देता। अब ह्यू रोज ने अपना धूर्त दांव कालपी में चलाया। तभी एकाएक तात्या को अपने पिता के दर्शन की सनक आ गई। और पितृ-दर्शन की यह धुन आगे चलकर युद्ध की विस्मृति कराने लगी और अपनी इस इच्छा पर काबू न रखते हुए वह चरखी चला गया। इस सनक का रहस्य क्या हो सकता है? यही कि कालपी का पतन होने पर क्रांतिकारियों के हाथ में कोई-न-कोई सुरक्षित स्थान या किले का होना अत्यंत आवश्यक था। नई सेना मिल जाए, यह भी अच्छा था। इसी कारण क्रांति का अग्रदूत तात्या कालपी से छिटककर ग्वालियर में घुस पड़ा। अब 1857 का स्वातंत्र्य समर — 373