१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रांति का वात्याचक्र घूमने लगा है। सेनाधिकारियों के शपथपूर्वक आश्वासन तात्या ने प्राप्त किए तथा दरबार के उत्तरदायी व्यक्ति, सरदार आदि लोगों से संबंध स्थापित कर क्रांति के लिए उसने एक स्वतंत्र सेना बना ली। अपनी शक्ति भर सबकुछ करने का आश्वासन लोगों ने उसका दिया, एक महीने में ही ग्वालियर की संपूर्ण सेना तात्या की मुट्ठी में थी। फिर ग्वालियर के मर्म स्थानों को जान लिया और शिंदे के सिंहासन के नीचे से सुरंग बनाकर तात्या टोपे राव साहब के पास गोपालपुर में आया। अपने ‘पिता के दर्शन’ वह कर चुका था। ग्वालियर की प्रजा को क्रांति कार्य की ओर कर लेने में सफल हो तात्या के आ पहुंचने के समाचार सुनकर रानी लक्ष्मी को बड़ा आनंद हुआ और उसने पेशवा से सीधे ग्वालियर पर चढ़ाई करने का आग्रह किया। 28 मई को क्रांतिकारी अमीनमहल पहुंचे। नंबरदार ने उन्हें रोकने की चेष्टा की। उत्तर मिला, “तुम कौन हो रोकनेवाले? हम पेशवा हैं और स्वराज्य, स्वधर्म के लिए लड़ रहे हैं।'” श्रीमंत राव साहब के इन शब्दों से कायर चुप हो गए और वहां के हजारों देशभक्तों ने क्रांतिवीरों का हृदय से स्वागत किया। तब पेशवा सीधे ग्वालियर की राजधानी की दीवारों से टकराए। शिंदे को उन्होंने लिखा–“मात्र मित्रता की भावना से हम आपके पास आ रहे हैं। पुराने आपसी संबंधों का स्मरण करो। हम आपकी सहायता चाहते हैं। और उसी से हम दक्षिण पर चढ़ाई कर सकेंगे। किंतु कृतघ्न ग्वालियर नरेश ने पुराना नाता कब को तोड़ दिया था। यह तो उसे बताना होगा कि पुराना नाता कब का और क्या है–‘शिंदे के पुरखे हमारे सेवक थे, मामूली सेवक; यही पुराना नाता। और इस समय शिंदे की सारी सेना हमारा साथ देने का उद्यत है। तात्या टोपे ने सेनाधिकारियों से मिलकर सब भेद जान लिया है।'” किंतु यह सब भूलकर शिंदे अपनी सेना और तोपों के साथ ग्वालियर के पास पेशवा की सेना पर चढ़ाई करने चला। श्रीमंत पेशवा ने सैन्यदल को आते देख यह जाना कि शिंदे पछताकर स्वदेश के झंडे की वंदना करके अगवानी कर रहा है। किंतु रानी लक्ष्मी ने स्पष्ट बता दिया कि ग्वालियर नरेश स्वदेश के झंडे को ठुकराने आ रहा है। रानी ने अपने तीन सौ सैनिकों के साथ शिंदे के तापेखाने पर धावा बोल दिया। थोड़े ही समय में जयाजीराव शिंदे और उसके अंगरक्षक ‘भाले घाटी’ वीर दीख पड़े। छेड़ी हुई नागिन से अधिक क्रोधातुर रानी लक्ष्मी उनपर टूट पड़ीं। देख, महादजी शिंदे के शूर वंशज जयाजी! रनवास में पड़ी यह बाईस वर्ष की अबला तुम्हारी तलवार को ललकार रही है। अब संसार यह देखे कि देशभक्त महादजी के कितना अंश इस फिरंगी भक्त जयाजी में उतरा है। रानी के पहले हमले से ही उसके मुसाहब बगलें झांकने लगे और ‘भाले घाटी’ भाग खड़े हुए। किंतु उसका विशाल तोपखाना अवश्य अपनी शक्ति दिखा 1857 का स्वातंत्र्य समर – 374