भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

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देगा। ग्वालियर की सेना ने तात्या टोपे को देखा और अपनी शपथ का स्मरण कर पेशवा के विरूद्ध लड़ने से साफ इन्कार कर दिया। मुख्य सेनाधिकारियों के साथ सारी सेना पेशवा के साथ हो गई। तोपखाना रखा रह गया। ग्वालियर के हर सैनिक ने स्वराज्य के झंडे को प्रणाम किया। इस प्रकार क्रांति नेता के जादुई स्पर्श से ग्वालियर नरेश का सिंहासन लड़खड़ाकर गिर पड़ा। और कायर जयाजी, उसका मंत्री दिनकर राव दोनों केवल रणभूमि ही नहीं, ग्वालियर छोड़कर आगरा भाग गए। ग्वालियर की प्रजा के आनंद का ठिकाना र रहा। श्रीमंत राव साहब के सम्मान में सेना ने तोपें दागीं। शिंदे के कोषाध्यक्ष अमरचंद भाटिया ने शिंदे के खजाने का सबकुछ पेशवा के चरणों में अर्पित कर दिया। क्रांति कार्य में सहानुभूति दिखानेवाले इन देशभक्तों को बंदी बनाया गया था, उन्हें जनता के जयघोष में मुक्त किया गया। अंग्रेजों का साथ देनेवाले सलाहकार पिट्ठू जयाजी के साथ भाग गए। लेकिन उनके घरों में इसलिए आग लगाई गई कि उनका नामोनिशान भी न रहे, उनकी संपत्ति भी जब्त कर ली गई। 'राजा और प्रजा का नाता एशियाई लोग बिलकुल समझ नहीं पाते।' इस घृणित व्यंग्य का ग्वालियर की प्रजा ने मुंहतोड़ जवाब देकर झूठ साबित कर दिया है, क्योंकि वह राजा क्या जो 'स्वदेश', 'स्वधर्म' का द्रोह करे! पेशवा के सिंहासन से बाजीराव (द्वितीय) को ठीक समय पर नीचे न खींचने के कारण ही तो सन् 1857 में मातृभूमि का द्रोह करने के कलंक का टीका पूना के माथे लगा। ग्वालियर इस कलंक से बचा रहा, इसलिए सन् 1857 की क्रांति आधुनिक भारत में नवांकुरित प्रजा की शक्ति के प्रथम उदाहरण के रूप में इतिहास में अंकित होगी। शिंदे यदि स्वदेश का साथ नहीं देता तो देश भी उसे सहारा नहीं देगा। तलवारें और तोपें, रिसाला तथा पैदल सेना, दरबार एवं सरदार, मंदिर और मूर्ति-सबकुछ राष्ट्र के लिए है और अकेला शिंदे यदि राष्ट्र के लिए नहीं है तो उसे सिंहासन से घसीटकर फेंक दो। राजमहल से निकाल बाहर करो। राजसीमा से भी दूर भगा दो। अब 'राजाप्रकृति रंजनात्' (रघुवंश, सर्ग 4, श्लोक 12) अर्थात् राजा जनता के सुख के लिए है-इस रघुकुल रीति के अनुसार राजा वही बनेगा, जो प्रजा को सुखी करने के लिए ही राजपद स्वीकार करेगा। 3 जून का शुभ दिन निकम्मे होकर बिताना अच्छा नहीं। स्वराज्य को पवित्र स्नान कराकर स्वदेश के सिंहासन पर बिठाना आवश्यक है। अतः फूलबाग में एक बड़ा साथ दे रहे थे, अपनी श्रेणी के अनुसार सभी विराजमान थे। तात्या के नेतृत्व में अरब, रूहेले, पठान, राजपूत, रंगड़, परदेशी-हर प्रकार के वीर अपने-अपने सैनिक गणवेश में तलवार से सज्जित होकर आए थे। श्रीमंत पेशवा ने भी अपने शाही वस्त्र पहने थे; मस्तक पर सिरपेंच और कलगी-तुर्रा, कानों में मोती के कुंडल, गले में मोतियों तथा 1857 का स्वातंत्र्य समर – 375