१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहीरों के हार थे। पेशवा के समस्त सम्मान -चिह्नों के साथ भालदार, चोपदारों की ललकारों के बीच श्रीमंत दरबार में पधारे। सबने उनकी वंदना की और आनंदाश्रुओं से डबडबाई आंखों के साथ पेशवा सिंहासन पर विराजमान हुए। फिर उन्होंने ओजपूर्ण शब्दों में धन्यवाद देकर रामराव गोविंद को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। तात्या टोपे सेनापति बने और उन्हें रत्नजड़ित तलवार दी गई। अष्ट प्रधानों का चुनाव हुआ। सैनिकों को बीस लाख रूपए बांटे गए ˙(पारसनी कृत-'रानी लक्ष्मीबाई का जीवनचरित', पृष्ठ 309) नाना साहब पेशवाके प्रतिनिधि राव साहब ने इस तरह एक नया सिंहासन जमाकर एक नई आशा, नया प्राण क्रांतिदल में प्रेरित किया और विश्रंखलित क्रांतिकारियों को एक सूत्र में पिरोने के लिए एक नया केंद्र स्थापित किया। युद्ध की धूम के बीच ही इस प्रकार राज्योरोहण समारोह संपन्न करने और वंदनार्थ तोपों को दागने में तात्या का पागलपन नहीं था। संसार ने क्रांति को मृतप्राय देखा था, जिसे इसी उपाय से तात्या ने निराशा के मर्त से उठाया था। संसार कुछ आनंद से, कुछ निराशा से चिल्लाया था, क्रांति अब मर गई, उसमें कोई चेतना नहीं। किंतु यह कैसा जादू है! तात्या ने गोपालपुर में मरी मिट्टी में से एक सिंहासन ऊपर उठा। जिसके चरणों में लाखों रुपयों की झनझनाहट थी। हजारों तलवारें बढ़ रही हैं, तोपें वंदना कर रही हैं। एक नई सेना खड़ी हुई है। नई तोपें तैयार हैं, तात्या ने एक नया राज्य जीता है। पर तात्या ने अपने चमत्कार से चकित करने के लिए इतनी चेष्टा थोड़े ही की है! उसे पहले से ही मालूम था कि मराठा पेशवा के आसीन होने की तोप गर्जना से दूर बिखरे हुए क्रांतिकारी संगठित होंगे। वह जानता था कि ग्वालियर में राष्ट्रीय झंडे को लहराता देखकर उनमें असीम उत्साह और साहस पैदा होगा। तात्या ने जो ताड़ लिया था, उसके अनुसार पांडे दल के शरीर में फिर से जान आ गई। जहां एक ओर तात्या के देशवासियों में उत्साह की लहर दौड़ी, वहां दूसरी ओर अंग्रेज सैनिकों का दिल बैठ गया। इसीलिए तात्या तथा अन्य क्रांति नेताओं ने राज्यारोहण की धूम मचाई थी। उनकी यह चाल सफल हुई, क्योंकि तात्या की तोपों की गर्जना से ह्यू रोज के सुस्ताने की योजना मिट्टी में मिल गई। जिस चतुरता और नीतिज्ञता का परिचय ग्वालियर पर कब्जा करने में तात्या और रानी लक्ष्मीबाई ने दिया, उसके बारे में मैलसन लिखता है—“असंभव संभव कैसे बन गया, यह बताया गया है। ˙ ˙ ह्यू रोजो यह भी मालूम हुआ कि अब और देर करने का परिणाम क्या होगा! क्रांतिकारियों हाथ से यदि ग्वालियर शीघ्र न छीना गया तो क्या भयंकर परिणाम होंगे। इसकी कल्पना करना भी कठिन था। समय मिले तो ग्वालियर पर दखल करने से जो असीम राजनीतिक व सैन्य शक्ति तात्या ने प्राप्त की थी-मानव शक्ति, धन, युद्ध-सामग्री के साधन उसे जो मिले थे, उसके बल पर कालपी में बिखरी सेना को एकत्रित कर फिर से नई सेना 1857 का स्वातंत्र्य समर – 376