भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 418 में से

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खड़ी करेगा और भारत भर में मराठों का उत्थान होगा। अपने स्वाभाविक जीवट के बलबूते पर वह दक्षिणी महाराष्ट्र में फिर से पेशवा का झंडा लहराने में समर्थ होगा। उस प्रदेश से हमारी अर्थात् अंग्रेजी सेना निकाली गई थी, और यदि मध्य भारत में तात्या को विशेष विजय मिल जाए तो वहां के लोग पुन:स साधना में लग जाएंगे, इसी साधना को पूरा करने में उसके पूर्वजों ने अपनी शक्ति क्षीण की थी, अपना खून बहाया था''164 अब तक जो हुआ, सो ठीक हुआ। एक बार तो ह्यू रोज को बेदम-सा बना दिया। लक्ष्मीबाई की बात को महत्त्व न देनेवालों को धिक्कार है! युद्ध ही एकमात्र कार्य हो और सब समारोह बंद कर दिए जाएं। किंतु खेद है किइस बात की ओर कोई ध्यान न देकर क्रांतिकारी अपनी मस्ती में बेखबर थे। ऐशो-आराम, शराब, दावतें आदि में सारे लोग बेसुध थे। शायद स्वराज्य की सीमा उन्होंने यहीं तक मानी थी। पर दरअसल वे स्वराज्य खो रहे थे, क्योंकि मौके का लाभ उठाकर कुशल सैनिकों के साथ अंग्रेजों ने ग्वालियर पर हमला कर दिया। अपने साथ वे देशद्रोही शिंदे को लाए थे और यह घोषणा की थी कि अंग्रेज केवल शिंदे के लिए लड़ेंगे। यह घोषणा ग्वालियर की भोली प्रजा को धोखा देने के लिए थी। किंतु अब लोंगों की आंखें खुल गई थीं। क्रांतिकारियों को संगठित करने में कुशल तात्या अंग्रेजों का मुकाबला करने आगे बढ़ा। मुरार की छावनी के सैनिकों को अंग्रेजों ने हराया था। पराजय की छाया पड़ने से क्रांतिकारियों में सनसनी फैल गई थी। राव साहब बांदा के नवाब की कोठी की ओर जाते दिखाई दिए और बांदा के नवाब राव साहब के पास दौड़े। इस भाग दौड़ में मात्र रानी ठंडे दिमाग से काम कर रही थी। सब तरह से संयत होकर आशा और निराशा को उसने अपने पैरों तले कुचल दिया था। उसकी तलवार म्यान से बाहर थी। संसार की हर वस्तु से उसे वैराग्य था। उसकी तो एक मात्र इच्छा थी-जब तक उसकी सांस की हर वस्तु से उसे वैराग्य था। उसकी तो एक मात्र इच्छा थी-जब तक उसकी सांस रहे, उसकी तलवार स्वाधीनता के झंडे को को ऊंचा करने में ही चलती रहे। इसी हौसलें के सहारे उसने राव साहब को धीरज बंधाया और अपनी शक्ति के साथ व्यवस्थित सेना का पुनर्गठन किया। इस तरह पूर्वी द्वार की रक्षा का भार अपने ऊपर ले लिया। रानी की एक ही मांग थी, ''मैं अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी अपने प्रण को निभाऊंगी, तुम अपने कर्तव्य का पालन करो।'' रानी ने अपना सैनिक गणवेश धारण किया, अच्छे घोड़े पर सवार हुईं, रत्नजटित खड्ग का म्यान से बाहर निकाला और सैनिकों को 'आगे बढ़ो' की आज्ञा दे दी। कोटा की सराय के आसपास, जिसकी रक्षा का भार उनपर था, मोर्चाबंदी की। जब अंग्रेज सेना का चारों तरफ से जोर देखा तो रण के वाद्यों के साथ सैनिक अंग्रेज सेना पर टूट पड़े। काश, उनके पास उनके समान ही धैर्यवान सेना होती! सानी के नेतृत्व में उद्दंड और भीरू भी अनुशासित वीर बन जाता। उनके तथा अपने सैनिकों के साथ रानी ने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 377 164 मैलसन कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 5, पृष्ठ 149-50 ।

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