भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 418 में से

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पृष्ठ 373

अंग्रेजों पर हमला किया। लक्ष्मीबाई की दो सखियां-मुंदर और काशी भी रानी के कंधे-से-कंधा मिलाकर लड़ीं। पुरूष वेश से विभूषित इन दो सुन्दर कन्याओं की स्मृति रानी लक्ष्मीबाई के साथ-साथ भारतीय इतिहास के जीवन में अमरत्व प्राप्त करेगी। स्मिथ जैसा जनरल रानी की सेना को दबा रहा था, किंतु रानी का साहस और शौर्य देखत ही बनता था। पूरे दिन विद्युत-सी रणभूमि में चमक रही थीं। उनके हरावल पर अंग्रेज जोरदार हमले करते, किंतु हर बा रवह अपने पक्ष को विचलित न होने देतीं। उनका दल जोश में आकर अंग्रेजों के हरावाल पर धावा बोल देता और अंग्रेज मौत की गोद में विश्राम पाते। अंत में स्मिथ को पीछे हटना पड़ा। उसने चट्टान-सी खड़ी हरावल को तोड़ने की कोशिश छोड़ दी। इस तरह वह दिन बीता। 18 तारीख का सूरज निकला। आज अंग्रेजों ने बड़े जोर-शोर से हमला करने का निश्चय किया। सभी दिशाओं से उन्होंने किले पर धावा बोलने का निश्चय किया। जिस स्मिथ को कल पीछे हटना पड़ा था, वही आज नई कुमुक से झांसी की सेना पर टूट पड़ा। ह्यू रोज ने समझ लिया कि उसका वहां होना आवश्यक है, इसी विचार के कारण आज के हमलावर सैनिकों के साथ वह स्वयं था। रानी भी अपनी सेना के साथ तैनात थीं। उस दिन रानी ने कामदार चंदेरी की पगड़ी पहनी, चोगा और पाजामा पहना और गले में मोतियों का एक हार पहनकर घोड़े पर सवार हुई। उनका घोड़ा उस दिन कुछ थका हुआ सा मालूम देता था। अतः एक दूसरा नया घोड़ा लाया गया। रानी की दोनों सखियां नाश्ता कर ही रही थीं, तभी संवाद मिला कि अंग्रेजी सेना बढ़ी चली आ रही है। रानी तुरंत अपने खेमे में दौड़ पड़ी।–तीर भी इतनी तेजी से नहीं छूटता। रानी ने घोड़ा दौड़ाया और तलवार हाथ में लेकर शत्रु पर धावा बोल दिया। इसी विषय में एक अंग्रेज लिखता है–"तत्काल वह सुंदरी मैदान में उतरी और ह्यू रोज के व्यूह का डटकर सामना किया। अपनी सेनाके आगे रहकर पूरी मारकाट यद्यपि उसकी सफों को चीरकर अंग्रेज जाते, फिर भी रानी हरावल में दिखाई पड़ती थी और अपनी टूटी पांतियों को फिर से संगठित कर अतुल धैर्य का परिचय देती थी। इसके बावजूद ह्यू रोज ने स्वयं अपने ऊंट दल के जारे पर आखिरी पंक्ति तोड़ ही दी तो भी रानी अपने स्थान पर डटी रही।" इतने असाधारण शौर्य से लड़ते हुए रानी ने देखा कि अंग्रेज सेना पिछाड़ी से आक्रमण कर रही है, क्योंकि पिछाड़ी से रक्षा करनेवाले क्रांतिकारियों की पांतियों को उन्होंने तोड़ दिया था। तोपें ठंडी पड़ी थीं। मुख्य सेना तितर-बितर हो गई थी, विजयी अंग्रेज सेना रानी पर चारों तरफ से हमला बोल रही थी और रानी के पास केवल पंद्रह-बीस सवार थे। रानी ने अपनी दोनों सखियों के साथ घोड़े को एड़ लगाई। शत्रु की पांतियों को चीर वह परले सिरे पर लड़नेवाले लोगों से मिलना चाहती थी। गोरे घुड़सवार 1857 का स्वातंत्र्य समर – 378

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