१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशिकारी कुत्तों की तरह उनका पीछा कर रहे थे। किंतु रानी ने तलवार के बल पर अपना मार्ग बनाया और आगे बढ़ीं और सहसा एक चीख सुनाई दी- "बाई साहब, मैं मरी!" उफ, यह किसकी पुकार ! रानी ने घूमकर देखा। उसकी सखी मुंदर को एक अंग्रेज ने गोली मारी थी। वह मर गई। बिजली की गति से दौड़कर रानी ने एक ही बार में उस फिरंगी के दो टुकड़े कर दिए। मुंदा का प्रतिशोध ले लिया। अब घूमकर आगे बढ़ीं। मार्ग में एक नाला आया। बस घोड़े की एक छलांग में रानी अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त थीं। किंतु नया घोड़ा वहीं अड़ गया। नाला पार करने से उस बेवफा घोड़े ने इन्कार कर दिया। काश, आज रानी का वह पुराना घोड़ा होता! मानो किसी जादुई असर के प्रभाव से वह घोड़ा गोल चक्कर काटने लगा। क्षण भर में ही गोरे सैनिक रानी के करीब आ गए और इस घिरी हुई अवस्था में भी एक तलवार ने अनेक तलवारों का सामना किया। पर एक एक ही है, उन बहुत से अंग्रेजों में से एक ने पीछे से सिर पर वार किया और उस वार के साथ सिर का दाहिना हिस्सा और दाईं आंख निकलकर बाहर लटकने लगी; उसी समय दूसरा वार छाती पर हुआ। महालक्ष्मी, अब तुम्हारे रक्त की पावन बूंद, आखिरी बूंद टपकनेवाली है। स्वतंत्रता की देवी को उसने अंतिम बलि दी। अपने ऊपर वार करनेवाले अंग्रेज के टुकड़े कर डाले और अब रानी अंतिम सांस लेने लगी। रानी का विश्वासपात्र सरदार रामचंद्रराव देशमुख पास ही था। उसने रानी को उठाया और पास की एक झोंपड़ी में उन्हें ले गया। बाबा गंगादास ने रानी को ठंडा पानी पिलाया और रक्त से लथपथ उस देवी के शरीर को बिछौने पर लिटा दिया। उनकी पावन आत्मा स्वर्ग सिधार गई। अंतिम सांस में निकले अपनी स्वामिनी की अंतिम सूचना के शब्दों के अनुसार रामचंद्रराव देशमुख ने शत्रु की आंख बचाकर घास को ढेर लगा दिया और उसी चिता पर लिटाकर, पराधीनता के अपवित्र स्पर्श के भय से अग्नि-संस्कार कर डाला। सिंहासन पर नहीं, चिता पर लक्ष्मी के गले में स्वतंत्रता की कौस्तुभ मणि विराजमान है। रणभूमि में उत्सर्ग करके रानी ने मृत्यु का दरवाजा तोड़ दिया है। अब भला कोई मानव उसका क्या पीछा करेगा! इस प्रकार रानी लक्ष्मीबाई लड़ीं। अपना लक्ष्य पूरा कर गईं। ऐसा एक जीवन संपूर्ण राष्ट्र का मुख उज्जवल करता है। वह सब सद्गुणों का निचोड़ थीं। एक महिला, जिसने जीवन के तेईस वसंत ही देखे थे; कोमलांगी, मधुर, विशुद्ध चरित्र, पुरुषों में भी न पाई जाने वाली संगठन-कुशलता से ओतप्रोत थीं। उनके हृदय में देशभक्ति रत्नदीप की तरह प्रकाशमान थी। अपने देश पर उन्हें गर्व था। युद्ध कौशल में अद्वितीय थीं। विश्व में शायद ही कोई देश ऐसा होगा, जो ऐसी देवी का अपनी कन्या और रानी कहने का अधिकारी होगा। इंग्लैंड के भाग्य में यह सम्मान अब तक नहीं बदा है। इटली की क्रांति में ऊंचे शौर्य और आदर्श का परिचय मिलता है; फिर भी इतने वैभवकाल में 1857 का स्वातंत्र्य समर - 379