भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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इटली एक ऐसी लक्ष्मी को पैदा नहीं कर सका। भारत का यह अहोभाग्य है कि ऐसा स्त्री-रत्न यहां पैदा हुआ। उनका शरीर बाबा गंगादास की झोंपड़ी में प्रज्वलित ज्वाला में दमक रहा है। पर यह रत्नदीप हमारी मातृभूमि भी कदाचित् पैदा न कर सकती, यदि यह स्वतंत्रता संग्राम का महायज्ञ न रचा जाता। अनमोल मोती सागर की सतह पर ही नहीं मिल जाते, रात्रि के अंधकार में सूर्यकांत मणि तेज की किरणें नहीं फेंकती, चमकम पत्थर कोमल वस्तु की रगड़ पर चिंगारी उत्पन्न नहीं करता। इन सबको विरोध की अपेक्षा होती है। अन्याय से पिसे हुए मन को बेचैन बना दो-अंदर तक, रक्त की एक-एक बूंद में उबाल आना चाहिए। अन्याय का ईंधन प्रतिशोध की भट्ठी को तपाता रहे, ऐसी भट्ठी में फिर सद्गुणों के कण चमकने लगते हैं। सन् 1857 में हमारी भूमि पर सचमुच ही आग भड़क उठी थी और फिर विश्व के कानों में गूंज भरनेवाला धमाका ˙इस अग्नि का कितना विस्तृत फैलाव हुआ है। ऊंची लपट-लपट में से लपट-मेरठ में चिंगारी और डलहौजी के 'रोलर' से समतल बना धूल का ढेर-सारा देश ज्वालामुखी बारूद के अंबार-सा दिखाई पड़ा। जैसे आतिशबाजी की अनार खुलने पर उसमें से रंग-बिरंगे बाण-पेड़ तथा अन्य चीजें छूटती हैं और शांत हो जाती हैं, उसी तरह इस क्रांति के अनार से तप्त लहू बहा, शस्त्रास्त्र और मुठभेड़ें निकलीं। और यह अनार भी कितना बड़ा-मेरठ से विंध्याचल तक लंबा, पेशावर से डमडम तक चौड़ा। और उसे सुलगाया गया। आग की लपटें सभी दिशाओं में व्याप्त हो गईं और उस अनार के पेट में क्या-क्या अजीब चीजें थीं। लहू मेघ की तरह बरसा-ओलों के साथ। दिल्ली के घेरे, प्लासी के प्रतिशोध, कानपुर, लखनऊ तथा सिंकदराबाद के कत्ल। सहस्त्रों वीर जूझ रहे हैं, खप रहे हैं, नगर जल रहे हैं; कुंवर सिंह आता है, जूझता है, गिरता है; मौलवी आया, लड़ा और मरा, कानपुर, लखनऊ, दिल्ली, बरेली, जगदीशपुर, झांसी, बांदा, फर्रूखाबाद के सिंहासन; पांच हजार, दस हजार, सहस्त्रों, लाखों तलवारें, ध्वजाएं, सेनापति, घोड़े, हाथी, ऊंट-सब इस अनार से बाहर-एक-के-बाद एक आग के फव्वारे-से निकलते हैं। एक कुछ ऊंचाई की लपट पर, कुछ दूसरी पर-ये ऊंचे चढ़ जाते हैं, लड़खड़ाते हैं और लुप्त हो जाते हैं। सब ओर लड़ाई-बिजली की कड़क, ज्वालामुखी की भीषण ज्वालाओं का यह फव्वारा। और यह चिता-बाबा गंगादास की झोंपड़ी के पास जल रही है। सन् 1857 के स्वातंत्र्य समर के ज्वालामुखी की यह अंतिम ज्वाला है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 380