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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

हीरों के हार थे। पेशवा के समस्त सम्मान -चिह्नों के साथ भालदार, चोपदारों की ललकारों के बीच श्रीमंत दरबार में पधारे। सबने उनकी वंदना की और आनंदाश्रुओं से डबडबाई आंखों के साथ पेशवा सिंहासन पर विराजमान हुए। फिर उन्होंने ओजपूर्ण शब्दों में धन्यवाद देकर रामराव गोविंद को प्रधानमंत्री नियुक्त किया। तात्या टोपे सेनापति बने और उन्हें रत्नजड़ित तलवार दी गई। अष्ट प्रधानों का चुनाव हुआ। सैनिकों को बीस लाख रूपए बांटे गए ˙(पारसनी कृत-'रानी लक्ष्मीबाई का जीवनचरित', पृष्ठ 309) नाना साहब पेशवाके प्रतिनिधि राव साहब ने इस तरह एक नया सिंहासन जमाकर एक नई आशा, नया प्राण क्रांतिदल में प्रेरित किया और विश्रंखलित क्रांतिकारियों को एक सूत्र में पिरोने के लिए एक नया केंद्र स्थापित किया। युद्ध की धूम के बीच ही इस प्रकार राज्योरोहण समारोह संपन्न करने और वंदनार्थ तोपों को दागने में तात्या का पागलपन नहीं था। संसार ने क्रांति को मृतप्राय देखा था, जिसे इसी उपाय से तात्या ने निराशा के मर्त से उठाया था। संसार कुछ आनंद से, कुछ निराशा से चिल्लाया था, क्रांति अब मर गई, उसमें कोई चेतना नहीं। किंतु यह कैसा जादू है! तात्या ने गोपालपुर में मरी मिट्टी में से एक सिंहासन ऊपर उठा। जिसके चरणों में लाखों रुपयों की झनझनाहट थी। हजारों तलवारें बढ़ रही हैं, तोपें वंदना कर रही हैं। एक नई सेना खड़ी हुई है। नई तोपें तैयार हैं, तात्या ने एक नया राज्य जीता है। पर तात्या ने अपने चमत्कार से चकित करने के लिए इतनी चेष्टा थोड़े ही की है! उसे पहले से ही मालूम था कि मराठा पेशवा के आसीन होने की तोप गर्जना से दूर बिखरे हुए क्रांतिकारी संगठित होंगे। वह जानता था कि ग्वालियर में राष्ट्रीय झंडे को लहराता देखकर उनमें असीम उत्साह और साहस पैदा होगा। तात्या ने जो ताड़ लिया था, उसके अनुसार पांडे दल के शरीर में फिर से जान आ गई। जहां एक ओर तात्या के देशवासियों में उत्साह की लहर दौड़ी, वहां दूसरी ओर अंग्रेज सैनिकों का दिल बैठ गया। इसीलिए तात्या तथा अन्य क्रांति नेताओं ने राज्यारोहण की धूम मचाई थी। उनकी यह चाल सफल हुई, क्योंकि तात्या की तोपों की गर्जना से ह्यू रोज के सुस्ताने की योजना मिट्टी में मिल गई। जिस चतुरता और नीतिज्ञता का परिचय ग्वालियर पर कब्जा करने में तात्या और रानी लक्ष्मीबाई ने दिया, उसके बारे में मैलसन लिखता है—“असंभव संभव कैसे बन गया, यह बताया गया है। ˙ ˙ ह्यू रोजो यह भी मालूम हुआ कि अब और देर करने का परिणाम क्या होगा! क्रांतिकारियों हाथ से यदि ग्वालियर शीघ्र न छीना गया तो क्या भयंकर परिणाम होंगे। इसकी कल्पना करना भी कठिन था। समय मिले तो ग्वालियर पर दखल करने से जो असीम राजनीतिक व सैन्य शक्ति तात्या ने प्राप्त की थी-मानव शक्ति, धन, युद्ध-सामग्री के साधन उसे जो मिले थे, उसके बल पर कालपी में बिखरी सेना को एकत्रित कर फिर से नई सेना 1857 का स्वातंत्र्य समर – 376

खड़ी करेगा और भारत भर में मराठों का उत्थान होगा। अपने स्वाभाविक जीवट के बलबूते पर वह दक्षिणी महाराष्ट्र में फिर से पेशवा का झंडा लहराने में समर्थ होगा। उस प्रदेश से हमारी अर्थात् अंग्रेजी सेना निकाली गई थी, और यदि मध्य भारत में तात्या को विशेष विजय मिल जाए तो वहां के लोग पुन:स साधना में लग जाएंगे, इसी साधना को पूरा करने में उसके पूर्वजों ने अपनी शक्ति क्षीण की थी, अपना खून बहाया था''164 अब तक जो हुआ, सो ठीक हुआ। एक बार तो ह्यू रोज को बेदम-सा बना दिया। लक्ष्मीबाई की बात को महत्त्व न देनेवालों को धिक्कार है! युद्ध ही एकमात्र कार्य हो और सब समारोह बंद कर दिए जाएं। किंतु खेद है किइस बात की ओर कोई ध्यान न देकर क्रांतिकारी अपनी मस्ती में बेखबर थे। ऐशो-आराम, शराब, दावतें आदि में सारे लोग बेसुध थे। शायद स्वराज्य की सीमा उन्होंने यहीं तक मानी थी। पर दरअसल वे स्वराज्य खो रहे थे, क्योंकि मौके का लाभ उठाकर कुशल सैनिकों के साथ अंग्रेजों ने ग्वालियर पर हमला कर दिया। अपने साथ वे देशद्रोही शिंदे को लाए थे और यह घोषणा की थी कि अंग्रेज केवल शिंदे के लिए लड़ेंगे। यह घोषणा ग्वालियर की भोली प्रजा को धोखा देने के लिए थी। किंतु अब लोंगों की आंखें खुल गई थीं। क्रांतिकारियों को संगठित करने में कुशल तात्या अंग्रेजों का मुकाबला करने आगे बढ़ा। मुरार की छावनी के सैनिकों को अंग्रेजों ने हराया था। पराजय की छाया पड़ने से क्रांतिकारियों में सनसनी फैल गई थी। राव साहब बांदा के नवाब की कोठी की ओर जाते दिखाई दिए और बांदा के नवाब राव साहब के पास दौड़े। इस भाग दौड़ में मात्र रानी ठंडे दिमाग से काम कर रही थी। सब तरह से संयत होकर आशा और निराशा को उसने अपने पैरों तले कुचल दिया था। उसकी तलवार म्यान से बाहर थी। संसार की हर वस्तु से उसे वैराग्य था। उसकी तो एक मात्र इच्छा थी-जब तक उसकी सांस की हर वस्तु से उसे वैराग्य था। उसकी तो एक मात्र इच्छा थी-जब तक उसकी सांस रहे, उसकी तलवार स्वाधीनता के झंडे को को ऊंचा करने में ही चलती रहे। इसी हौसलें के सहारे उसने राव साहब को धीरज बंधाया और अपनी शक्ति के साथ व्यवस्थित सेना का पुनर्गठन किया। इस तरह पूर्वी द्वार की रक्षा का भार अपने ऊपर ले लिया। रानी की एक ही मांग थी, ''मैं अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी अपने प्रण को निभाऊंगी, तुम अपने कर्तव्य का पालन करो।'' रानी ने अपना सैनिक गणवेश धारण किया, अच्छे घोड़े पर सवार हुईं, रत्नजटित खड्ग का म्यान से बाहर निकाला और सैनिकों को 'आगे बढ़ो' की आज्ञा दे दी। कोटा की सराय के आसपास, जिसकी रक्षा का भार उनपर था, मोर्चाबंदी की। जब अंग्रेज सेना का चारों तरफ से जोर देखा तो रण के वाद्यों के साथ सैनिक अंग्रेज सेना पर टूट पड़े। काश, उनके पास उनके समान ही धैर्यवान सेना होती! सानी के नेतृत्व में उद्दंड और भीरू भी अनुशासित वीर बन जाता। उनके तथा अपने सैनिकों के साथ रानी ने 1857 का स्वातंत्र्य समर - 377 164 मैलसन कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 5, पृष्ठ 149-50 ।

अंग्रेजों पर हमला किया। लक्ष्मीबाई की दो सखियां-मुंदर और काशी भी रानी के कंधे-से-कंधा मिलाकर लड़ीं। पुरूष वेश से विभूषित इन दो सुन्दर कन्याओं की स्मृति रानी लक्ष्मीबाई के साथ-साथ भारतीय इतिहास के जीवन में अमरत्व प्राप्त करेगी। स्मिथ जैसा जनरल रानी की सेना को दबा रहा था, किंतु रानी का साहस और शौर्य देखत ही बनता था। पूरे दिन विद्युत-सी रणभूमि में चमक रही थीं। उनके हरावल पर अंग्रेज जोरदार हमले करते, किंतु हर बा रवह अपने पक्ष को विचलित न होने देतीं। उनका दल जोश में आकर अंग्रेजों के हरावाल पर धावा बोल देता और अंग्रेज मौत की गोद में विश्राम पाते। अंत में स्मिथ को पीछे हटना पड़ा। उसने चट्टान-सी खड़ी हरावल को तोड़ने की कोशिश छोड़ दी। इस तरह वह दिन बीता। 18 तारीख का सूरज निकला। आज अंग्रेजों ने बड़े जोर-शोर से हमला करने का निश्चय किया। सभी दिशाओं से उन्होंने किले पर धावा बोलने का निश्चय किया। जिस स्मिथ को कल पीछे हटना पड़ा था, वही आज नई कुमुक से झांसी की सेना पर टूट पड़ा। ह्यू रोज ने समझ लिया कि उसका वहां होना आवश्यक है, इसी विचार के कारण आज के हमलावर सैनिकों के साथ वह स्वयं था। रानी भी अपनी सेना के साथ तैनात थीं। उस दिन रानी ने कामदार चंदेरी की पगड़ी पहनी, चोगा और पाजामा पहना और गले में मोतियों का एक हार पहनकर घोड़े पर सवार हुई। उनका घोड़ा उस दिन कुछ थका हुआ सा मालूम देता था। अतः एक दूसरा नया घोड़ा लाया गया। रानी की दोनों सखियां नाश्ता कर ही रही थीं, तभी संवाद मिला कि अंग्रेजी सेना बढ़ी चली आ रही है। रानी तुरंत अपने खेमे में दौड़ पड़ी।–तीर भी इतनी तेजी से नहीं छूटता। रानी ने घोड़ा दौड़ाया और तलवार हाथ में लेकर शत्रु पर धावा बोल दिया। इसी विषय में एक अंग्रेज लिखता है–"तत्काल वह सुंदरी मैदान में उतरी और ह्यू रोज के व्यूह का डटकर सामना किया। अपनी सेनाके आगे रहकर पूरी मारकाट यद्यपि उसकी सफों को चीरकर अंग्रेज जाते, फिर भी रानी हरावल में दिखाई पड़ती थी और अपनी टूटी पांतियों को फिर से संगठित कर अतुल धैर्य का परिचय देती थी। इसके बावजूद ह्यू रोज ने स्वयं अपने ऊंट दल के जारे पर आखिरी पंक्ति तोड़ ही दी तो भी रानी अपने स्थान पर डटी रही।" इतने असाधारण शौर्य से लड़ते हुए रानी ने देखा कि अंग्रेज सेना पिछाड़ी से आक्रमण कर रही है, क्योंकि पिछाड़ी से रक्षा करनेवाले क्रांतिकारियों की पांतियों को उन्होंने तोड़ दिया था। तोपें ठंडी पड़ी थीं। मुख्य सेना तितर-बितर हो गई थी, विजयी अंग्रेज सेना रानी पर चारों तरफ से हमला बोल रही थी और रानी के पास केवल पंद्रह-बीस सवार थे। रानी ने अपनी दोनों सखियों के साथ घोड़े को एड़ लगाई। शत्रु की पांतियों को चीर वह परले सिरे पर लड़नेवाले लोगों से मिलना चाहती थी। गोरे घुड़सवार 1857 का स्वातंत्र्य समर – 378

शिकारी कुत्तों की तरह उनका पीछा कर रहे थे। किंतु रानी ने तलवार के बल पर अपना मार्ग बनाया और आगे बढ़ीं और सहसा एक चीख सुनाई दी- "बाई साहब, मैं मरी!" उफ, यह किसकी पुकार ! रानी ने घूमकर देखा। उसकी सखी मुंदर को एक अंग्रेज ने गोली मारी थी। वह मर गई। बिजली की गति से दौड़कर रानी ने एक ही बार में उस फिरंगी के दो टुकड़े कर दिए। मुंदा का प्रतिशोध ले लिया। अब घूमकर आगे बढ़ीं। मार्ग में एक नाला आया। बस घोड़े की एक छलांग में रानी अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त थीं। किंतु नया घोड़ा वहीं अड़ गया। नाला पार करने से उस बेवफा घोड़े ने इन्कार कर दिया। काश, आज रानी का वह पुराना घोड़ा होता! मानो किसी जादुई असर के प्रभाव से वह घोड़ा गोल चक्कर काटने लगा। क्षण भर में ही गोरे सैनिक रानी के करीब आ गए और इस घिरी हुई अवस्था में भी एक तलवार ने अनेक तलवारों का सामना किया। पर एक एक ही है, उन बहुत से अंग्रेजों में से एक ने पीछे से सिर पर वार किया और उस वार के साथ सिर का दाहिना हिस्सा और दाईं आंख निकलकर बाहर लटकने लगी; उसी समय दूसरा वार छाती पर हुआ। महालक्ष्मी, अब तुम्हारे रक्त की पावन बूंद, आखिरी बूंद टपकनेवाली है। स्वतंत्रता की देवी को उसने अंतिम बलि दी। अपने ऊपर वार करनेवाले अंग्रेज के टुकड़े कर डाले और अब रानी अंतिम सांस लेने लगी। रानी का विश्वासपात्र सरदार रामचंद्रराव देशमुख पास ही था। उसने रानी को उठाया और पास की एक झोंपड़ी में उन्हें ले गया। बाबा गंगादास ने रानी को ठंडा पानी पिलाया और रक्त से लथपथ उस देवी के शरीर को बिछौने पर लिटा दिया। उनकी पावन आत्मा स्वर्ग सिधार गई। अंतिम सांस में निकले अपनी स्वामिनी की अंतिम सूचना के शब्दों के अनुसार रामचंद्रराव देशमुख ने शत्रु की आंख बचाकर घास को ढेर लगा दिया और उसी चिता पर लिटाकर, पराधीनता के अपवित्र स्पर्श के भय से अग्नि-संस्कार कर डाला। सिंहासन पर नहीं, चिता पर लक्ष्मी के गले में स्वतंत्रता की कौस्तुभ मणि विराजमान है। रणभूमि में उत्सर्ग करके रानी ने मृत्यु का दरवाजा तोड़ दिया है। अब भला कोई मानव उसका क्या पीछा करेगा! इस प्रकार रानी लक्ष्मीबाई लड़ीं। अपना लक्ष्य पूरा कर गईं। ऐसा एक जीवन संपूर्ण राष्ट्र का मुख उज्जवल करता है। वह सब सद्गुणों का निचोड़ थीं। एक महिला, जिसने जीवन के तेईस वसंत ही देखे थे; कोमलांगी, मधुर, विशुद्ध चरित्र, पुरुषों में भी न पाई जाने वाली संगठन-कुशलता से ओतप्रोत थीं। उनके हृदय में देशभक्ति रत्नदीप की तरह प्रकाशमान थी। अपने देश पर उन्हें गर्व था। युद्ध कौशल में अद्वितीय थीं। विश्व में शायद ही कोई देश ऐसा होगा, जो ऐसी देवी का अपनी कन्या और रानी कहने का अधिकारी होगा। इंग्लैंड के भाग्य में यह सम्मान अब तक नहीं बदा है। इटली की क्रांति में ऊंचे शौर्य और आदर्श का परिचय मिलता है; फिर भी इतने वैभवकाल में 1857 का स्वातंत्र्य समर - 379

इटली एक ऐसी लक्ष्मी को पैदा नहीं कर सका। भारत का यह अहोभाग्य है कि ऐसा स्त्री-रत्न यहां पैदा हुआ। उनका शरीर बाबा गंगादास की झोंपड़ी में प्रज्वलित ज्वाला में दमक रहा है। पर यह रत्नदीप हमारी मातृभूमि भी कदाचित् पैदा न कर सकती, यदि यह स्वतंत्रता संग्राम का महायज्ञ न रचा जाता। अनमोल मोती सागर की सतह पर ही नहीं मिल जाते, रात्रि के अंधकार में सूर्यकांत मणि तेज की किरणें नहीं फेंकती, चमकम पत्थर कोमल वस्तु की रगड़ पर चिंगारी उत्पन्न नहीं करता। इन सबको विरोध की अपेक्षा होती है। अन्याय से पिसे हुए मन को बेचैन बना दो-अंदर तक, रक्त की एक-एक बूंद में उबाल आना चाहिए। अन्याय का ईंधन प्रतिशोध की भट्ठी को तपाता रहे, ऐसी भट्ठी में फिर सद्गुणों के कण चमकने लगते हैं। सन् 1857 में हमारी भूमि पर सचमुच ही आग भड़क उठी थी और फिर विश्व के कानों में गूंज भरनेवाला धमाका ˙इस अग्नि का कितना विस्तृत फैलाव हुआ है। ऊंची लपट-लपट में से लपट-मेरठ में चिंगारी और डलहौजी के 'रोलर' से समतल बना धूल का ढेर-सारा देश ज्वालामुखी बारूद के अंबार-सा दिखाई पड़ा। जैसे आतिशबाजी की अनार खुलने पर उसमें से रंग-बिरंगे बाण-पेड़ तथा अन्य चीजें छूटती हैं और शांत हो जाती हैं, उसी तरह इस क्रांति के अनार से तप्त लहू बहा, शस्त्रास्त्र और मुठभेड़ें निकलीं। और यह अनार भी कितना बड़ा-मेरठ से विंध्याचल तक लंबा, पेशावर से डमडम तक चौड़ा। और उसे सुलगाया गया। आग की लपटें सभी दिशाओं में व्याप्त हो गईं और उस अनार के पेट में क्या-क्या अजीब चीजें थीं। लहू मेघ की तरह बरसा-ओलों के साथ। दिल्ली के घेरे, प्लासी के प्रतिशोध, कानपुर, लखनऊ तथा सिंकदराबाद के कत्ल। सहस्त्रों वीर जूझ रहे हैं, खप रहे हैं, नगर जल रहे हैं; कुंवर सिंह आता है, जूझता है, गिरता है; मौलवी आया, लड़ा और मरा, कानपुर, लखनऊ, दिल्ली, बरेली, जगदीशपुर, झांसी, बांदा, फर्रूखाबाद के सिंहासन; पांच हजार, दस हजार, सहस्त्रों, लाखों तलवारें, ध्वजाएं, सेनापति, घोड़े, हाथी, ऊंट-सब इस अनार से बाहर-एक-के-बाद एक आग के फव्वारे-से निकलते हैं। एक कुछ ऊंचाई की लपट पर, कुछ दूसरी पर-ये ऊंचे चढ़ जाते हैं, लड़खड़ाते हैं और लुप्त हो जाते हैं। सब ओर लड़ाई-बिजली की कड़क, ज्वालामुखी की भीषण ज्वालाओं का यह फव्वारा। और यह चिता-बाबा गंगादास की झोंपड़ी के पास जल रही है। सन् 1857 के स्वातंत्र्य समर के ज्वालामुखी की यह अंतिम ज्वाला है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 380

भाग—4 अस्थायी शांति

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प्रकरण-9 विहंगावलोकन सन् 1857 के स्वातंत्र्य समर की प्रमुख भूमिका उत्तरी हिंदुस्थान में ही निभाई गई थी, अतः इस प्रदेश में हुई अद्भुत उथल-पुथल का विस्तृत विवरण इस ग्रंथ में प्रस्तुत करना आवश्यक ही था। परंतु इस स्वातंत्र्य युद्ध को पूर्णतः समझने के लिए अन्य प्रदेशों में इन दिनों में हुई घटनाओं का उल्लेख करना भी अनिवार्य है। एतदर्थ इस रण-विस्फोट की प्रचंड ज्वालाओं को उत्तरी हिंदुस्थान के आकाश में किल्लोलें करते हुए छोड़कर अब हम अन्य प्रदेशों में इस विस्फोट से भड़की चिनगारियों पर भी दृष्टिपात करेंगे। दिल्ली के घेरे के दिनों में पंजाब प्रांत में चले घटनाचक्र का कुछ विवरण हमने उसी स्थान पर प्रस्तुत किया है। तदुपरांत वहां एक-दो सामान्य विद्रोही घटनाओं के अतिरिक्त प्रायः शांति ही रही। सिखों के अतिरिक्त यहां की अन्य जनता ने किसी भी ओर से इस युद्ध में भाग तो नहीं लिया, किंतु वे हृदय से इस बात के आकांक्षी थे कि क्रांति का यह यज्ञ सफलता प्राप्त करे । हां, सिख लोग और सिख संस्थान निश्चित रूप से ही अंग्रेजों के पक्ष में संघर्ष करते रहे। राजपूताना के जनसाधारण की सहानुभूति क्रांतिकारियों के साथ ही थी। इस तथ्य की साक्षी भी अनेक प्रसंगों से प्रस्तुत हुई। जयपुर, जोधपुर और उदयपुर आदि के जो भारतीय सैनिक अंग्रेजों की ओर से संघर्ष करते थे, उन्हें अपशब्दों से संबोधित किया जाता था; किंतु ज्यों ही क्रांतिकारियों के कहीं विजयी होने का समाचार प्राप्त होता था, 1857 का स्वातंत्र्य समर - 383

राजस्थान के बाजारों और गलियों में हर्ष का वातावरण व्याप्त हो जाता था। स्थान-स्थान पर इन क्रांतिकारियों के जय-जयकार से धरा-गगन निनादित हो उठते थे। किंतु जब कभी क्रांतिकारियों की पराजय की सूचना मिलती थीं तो संपूर्ण राजस्थान में विषाद और संताप की गहरी छाया व्याप्त हो जाती थी। ये घटनाएं इसी सत्य की परिचायक हैं कि राजस्थान का जनसाधारण हृदय से क्रांति की सफलता का इच्छुक था। राजस्थान के राजपूत नरेशों की स्थिति यह थी कि क्रांति की सफलता का इच्छुक था। राजस्थान के राजपूत नरेशों की स्थिति यह थी कि वे किसी विशेष स्थिति के उत्पन्न होने से पूर्व किसी भी एक पक्ष को प्रकट रूप से सहायता देने के लिए तत्पर नहीं होते थे। किंतु जब कभी भी अंग्रेजों द्वारा दबाव डाला जाता था तो इन राजपूत राजाओं के सैनिक ही अपने शासकों की आज्ञाओं का खुला उल्लंघन कर अपने देशबांधवों के विरूद्ध अंग्रेजों का पक्ष लेकर युद्ध करने से स्पष्टतः इन्कार कर देते थे। विंध्याचल के उत्तर का यह विहंगावलोकन करने के उपरांत जब हमद क्षिण की ओर दृष्टिपात करते हैं तो हमारी आंखों के समक्ष सर्वप्रथम शिवाजी के मराठों का साम्राज्य उभर आता है। इन्हीं के देशबांधवों ने उत्तर में जाकर कानपुर, कालपी और झांसी इत्यादि में प्रचंड रण-गर्जना की थी। इसके कारण रायगढ़ में पराभूत हुआ राज्य सिंहासन ब्रह्मवर्त में रक्त से स्नान करता हुआ दिखाई दे रहा था। वहां स्वराज्य के पुनीत आसन का प्रादुर्भाव हो रहा था। संताजी और धानाजी ने जिस परम पवित्र भगवा ध्वज को ऊंचा किया था वह अब उत्तर भारत में तात्य ओपे द्वारा पुनः फहराया जा रहा था। उत्तरी हिंदुस्थान ने इस स्वातंत्र्य युद्ध में जैसी एकता, साहस और दृढ़ संकल्प व्यक्त किया, वैसी ही एकता यदि दक्षिण में भी उत्पन्न हो जाती तो यह सुनिश्चित था कि यदि संपूर्ण ब्रिटेन भी भारत में आकर युद्ध करने लग जाता तब भी महाराष्ट्र की पावन पताका कभी भी न झुक पाती। महाराष्ट्र का भगवा ध्वज जब रणांगण में फहराता है तो उसके प्रति प्रेम और गर्व से जिसका हृदय न भर जाता हो, ऐसा मराठा वंश का एक भी व्यक्ति कहीं खोजने से मिलना कठिन है। सन् 1857 की वीरता की यह पावन प्रेरणा सभी मराठों के हृदय में स्वाभाविक रूप से ही जाग्रत हो उठी थी। किंतु दृढ़ संकल्प के अभाव और अनिश्चित नीति-इन दो रोगों ने इस वीर भावना और पावन प्रेरणा की भ्रूण-हत्या ही कर दी। जिन दिनों उत्तरी हिंदुस्थान में क्रांति की योजना प्रगति पथ पर थी, उन्हीं दिनों दक्षिण भारत में भी क्रांति का प्रचार करने के लिए दूत भेजे गए थे। वे प्रत्येक नगर और संस्थान में जा रहे थे। सतारा के रंगोजी बापू से भी कानपुर के नाना साहब का पत्र-व्यवहार हो रहा था। पूना, सतारा, बेलगांव, धारवाड़, बंबई, हैदराबाद इत्यादि स्थानों की विभिन्न पलटनों में ब्राह्मण, मौलवी और उत्तर भारत की क्रांतिकारी सेनाओं के प्रतिनिधि क्रांति की ज्वाला गुप्त रूप से संलग्न थे। मैसूर से लेकर विंध्य पर्वत मेखला तक सर्वत्र यह प्रतिज्ञा दोहराई जा चुकी थी कि जब 'उत्तर उठेगा तो दक्षिण भी उभरकार खड़ा हो जाएगा।' दक्षिणी भारत ने भी विद्रोह करना तो स्मरण रखा, किंतु यह भी सत्य है कि वह उत्तरी हिंदुस्थान के साथ उठना स्मरण न रख 1857 का स्वातंत्र्य समर - 384

सका। उत्तर में तो क्रांति की विद्युत ज्वाला अकल्पित गति से धधकी और इस संकल्प के साथ दहकी कि करेंगे अथवा मरेंगे। किंतु तत्काल ही विद्रोह करने के स्थान पर दक्षिणवाले उस विद्रोह के परिणाम की ओर ही दृष्टि गड़ाए शांत रहे। क्रांति के जोखिमक` समय में तो एक क्षण में जीवन-मरण का निर्णय हो जाता है। उतावलापन और विलंब-दोनों ही इसकी सफलता में बाधक सिद्ध होते हैं। दुविधा के इन क्षणों में क्षमतावान् पुरुष ऐसे मुहूर्त का चयन करते हैं जिनमें तेजी और धैर्य से अधिकाधिक लाभ की उपलब्धि हो। क्रांति का संचालन अंकगणित के नियमों के अनुसार नहीं होता। क्रांति की सफलता तो मानव के हृदय में विद्यमान अद्भुत आत्मिक सामर्थ्य पर ही अवलंबित होती है। अकर्मण्यता और मंदता से तो क्रांति को जाग्रत रखती है। संयम, दूरदर्शिता और विद्रोह की तिथि का निर्धारण करना आदि क्रांति की सिद्धता तक ही उपयोगी है। किंतु एक बार शंखनाद हुआ कि जीवन जाए अथवा रहे, इस ओर से निश्चित होकर ही क्रांति के रणांगण ममें जूझना पड़ता है। उस अवस्था में जो दुविधा में पड़ेगा उसकी पराजय सुनिश्चित है। उस निर्णायक घड़ी में जो इस चर्चा में उलझ जाएगा कि विद्रोह करना अच्छा है अथवा बुरा है, वह निश्चित रूप से ही अंततोगत्वा पराजित होगा। संगठन करते हुए शांति और क्रांति में धैर्य-ये ही सफलता की सीढ़ियां है। क्रांति का संगठन तो गलीची की बुनाई के समान सावधानी सहित धीरे-धीरे किया जाता अपेक्षित है। किंतु जब एक बार क्रांति का विस्फोट हो जाए तो क्षण मात्र के लिए भी असमंजस्यग्रस्त न होते हुए तीर के तुल्य उसमें प्रवेश करना चाहिए। फिर यश मिले अथवा अपयश, जीवित रहें अथवा मृत्यु का वरण करें, सब ओर से निश्चिंत होकर समरांगण मे जूझना ही श्रेयस्कर है। मारते-मारते मरने का अटल संकल्प ही ग्रहण करना चाहिए; क्योंकि एक बार क्रांति का शंखनाद हो उठे तो क्रांति को यशस्वी करने के लिए एकमात्र मार्ग है-आगे बढ़ते जाना और अपने पग कदापि न रोकना। किंतु दक्षिण भारत ने इस तत्त्व को विस्मृत कर दिया और जब उत्तर में क्रांति की ज्वाला धधकी तो उसके साथ ही न उठकर खड़े होते हुए धीरे-धीरे सक्रिय रहे, किंतु असमंजसग्रस्त भी रहे। सफलता के प्रति अत्याधिक चिंता और उसके फलस्वरूप जोश में आकर अनुपम विद्रोह करने के कारण उन्हें अपयश कैसे प्राप्त हुआ, आइए, इस तथ्य पर भी दृष्टिपात करें। कोल्हापुर में 29वीं और धारवाड़ में 28वीं रेजीमेंट थी। जब पत्र-व्यवहार के माध्यम से क्रांति की योजना बनाई गई तो विद्रोह की तिथि 10 अगस्त, 1857 निर्धारित की गई। परंतु कोल्हापुर की जनता और सिपाहियों के दमन के लिए इसी बीच अंग्रेजों द्वारा एक गोरी सेना भेजने का निश्चय किया गया। यह समाचार तार विभाग के एक भारतीय कर्मचारी के माध्यम से भारतीय सिपाहियों को भी मिल गया? ज्यों ही यह गुप्त सूचना प्राप्त हुई तो पहले से ही दग्ध सिपाहियों ने 31 जुलाई को ही विद्रोह कर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 385

दिया। उन्होंने कई अंग्रेज अधिकारियों की तो हत्या कर ही दी, साथ ही खजाने पर भी अधिकार कर लिया। इन विद्रोही सैनिकों ने आई हुई गोरी सेना से भी दो-दो हाथ किए और कोल्हापुर से चलकर घाटियों की ओर निकल गए। विभिन्न क्रांतिकारी सावंतवाड़ी के प्रमुख नेता रामजी शिरसाई के नेतृत्व में एकत्र हुए और वाड़ी के वनों से गोरी सेना पर छापे मारने लगे। गोवा के पुर्तगालियों के सहयोग से अंग्रेजों ने कोल्हापुर में हुए इस विद्रोह को दबा दिया और वहां आए हुए नए अंग्रेज अधिकारी जैकब ने बचे हुए क्रांतिकारियों को आत्मसमर्पण करने पर विवश कर उनके नेताओं को गोलियों से उड़ा दिया। किंतु जिस दिन इन सिपाहियों ने विद्रोह किया उस दिन भी कोल्हापुर के नागरिक तो मौन दर्शक ही बने रहे। इसी मध्य वहां के तरुण राजा के साथ नाना साहब के दूत से भी मंत्रणा हुई थी। उस दूत ने नरेश को भी क्रांति के संघर्ष में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। लखनऊ के नवोत्थित सिंहासन की ओर से उसे एक तलवार भी भेंट की गई। इसी भांति जपखंडी, सांगली आदि के अन्य दक्षिणी संस्थानों से भी गुप्त पत्र-व्यवहार चल रहा था। किंतु कोल्हापुर के नरेश की अपेक्षा तो शिवाजी का अधिक उष्ण रक्त उसके छोटे भाई चिमा साहब की ही नसों में प्रवाहित हो रहा था। अब तक क्रांति का जो बना-बनाया कार्य बिगड़ गया था, अब क्रांति के उसी कार्य को पुन: व्यवस्थित रूप देने के लिए पुन: मंत्रणाओं का क्रम आरंभ हो गया था। इस कार्य को चिमा साहब ही निभा रहे थे। उन्होंने कोल्हापुर के अस्थाई सैनिकों को विद्रोह के लिए संगठित किया। 15 दिसंबर को प्रातःकाल ही कोल्हापुर में पुन: क्रांति की ज्वाला धधक उठी। नगर के द्वार बंद कर वहां तोपें तैनात कर दी गई। नगर के प्रत्येक मार्ग में क्रांति की पुनीत पताका फहरा उठी। जैकब को ज्यों ही समाचार मिला, उसने अपनी सेना का एकत्रित कर एक कच्चे द्वार पर आक्रमण कर दिया। उस समय से अंग्रेजी सेना द्वारा राजमहल पर अधिकार करने की घड़ी तक प्रचंड मुठभेड़ और संघर्ष जारी रहा। पराजय मिलने पर, जैसाकि सामान्यतः होता है, उसने घोषणा की कि विद्रोह सैनिकों तथा राजाज्ञा का उल्लंघन कर जनता ने आरंभ किया था। जब विद्रोहियों के नाम पूछे गए तो उसने कहा कि मुझे इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है। जैकब विद्रोही नेताओं को बंदी बनाने में प्राणपण लगा रहा। उसने अनेक व्यक्तियों को संदेह में ही कारागार में बंद कर दिया; किंतु उसके जी तोड़ प्रयास करने पर भी उसे इस विशाल क्रांति का सूत्र हाथ नहीं लग सका। जब एक करके ही उन्हें निगल गया। बंद बनानेवाले ताकते ही रह गए। अनेक लोगों को तोपों के सामने खड़ा करके उड़ा दिया गया। उनमें से एक पहली बार के आघात से न मारा जा सका, किंतु वह दूसरी बार तोप से गोला दगने तक भी निश्चित भाव से निडर खड़ा रहा। उस समय जैकब उसके पास आया और जैकब उसके पास आया और बोला, “तुम यदि विद्रोहियों के नाम बता दोगे तो तुम्हें प्राणदान दे दिया जाएगा।“ किंतु वह महान् वीर धैर्य सहित अपने अंग- 1857 का स्वातंत्र्य समर – 386

भंग हुए शरीर का कष्ट सहन करता रहा। उसने जैकब की ओर घृणा से देखते हुए कहा, “विद्रोह मैंने ही किया है।” दूसरे एक क्रांतिकारी ने तोप दगने से पूर्व भूल से एक नेता का स्मरण कर लिया। किंतु गोरे अधिकारी उस नेता को बंदी बना पाते, इसके पूर्व ही वह सुशिक्षित नेता कोल्हापुर के बाहर निकल गया। चिमा सहाब ने भी अंग्रेजों को उसक कोई सूत्र नहीं दिया । इस प्रकार के पारस्परिक विश्वास के कारण ही क्रांतिकारी एकता के महान् सूत्र में आबद्ध हुए थे। इसी पद्धति के कारण उनमें कोई भी आपसी मनमुटाव उत्पन्न न हो पाता था। इसी के कारण वे षड्यंत्रों का सफलतापूर्वक निर्वाह करते थे।165 कोल्हापुर में यदि इस प्रकार विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित हुई थी तो बेलगांव में भी 10 अगस्त से ही क्रांति का रंग मुखरित होने लगा गया था। किंतु विद्रोही सिपाहियों के एक नेता ठाकुर सिंह तथा मुसलमान एवं अन्य नागरिकों के नेता एक साहसी मुंशी के बंदी बना लिये जाने से बेल गांव और धारवाड़ में शांति ही बनी रही, क्योंकि अंग्रेजी सेना भी तत्काल वहां आ पहुंची थी। मुंशी एक सरकारी कर्मचारी था, अतः उसके द्वारा क्रांति के संबंध में पूना और कोल्हापुर आदि के सैनिकों को लिखे गए पत्रों के पकड़ लिये जाने के कारण अंग्रेजों ने उसे तोप से उड़ा दिया। सतारा में रंगोली बापू पर तो पहले ही ब्रिटिश सरकार अपना क्रोध प्रदर्शित कर चुकी थी। इधर कोल्हापुर में क्रांति का संचार करने के आरोप में अंग्रेजों ने रंगोजी बापू के एक पुत्र को भी बंदी बना लिया था, उसे भी सतारा में लाकर विद्रोह के संशय में ही अन्य क्रांतिकारियों के साथ फांसी पर लटका दिया गया था। सतारा के दो राजपुत्रों को सीमा पार निष्कासित कर दिया गया था। जिस राजसिंहासन की सेवा करने में रंगोजी बापू ने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया था, उसकी ऐसी दुर्दशा देखकर उन्होंने भी तत्काल सतारा का परित्याग कर दिया था। उनके बंदी बनाने के लिए अंग्रेजों ने भारी मात्रा में इनाम देने की घोषणा की थी; किंतु अभी कोई ऐसा घृणित कार्य करनेवाला वहां नहीं जनमा था। शत्रुओं के हाथों से बच निकलने के उपरांत रंगोजी बापू का क्या हुआ, यह तो इतिहास आज तक भी नहीं बता पाया; किंतु उनके जाने के साथ-ही-साथ सतारा स्वतंत्रता से भी हाथ धो बैठी। उन दिनों बंबई क्षेत्र का गवर्नर लॉर्ड एलफिंस्टन नामक एक सुयोग्य अधिकारी को बनाया गया था। अपने प्रदेश में शांति स्थापित करने के साथ-ही-साथ उसने कुछ अंग्रेजी सेना राजस्थान भेज दी। किंतु बंबई में विद्रोहाग्नि का शमन करने में जो तत्परता प्रदर्शित की गई उसका श्रेय फॉरेस्ट नामक मुख्य पुलिस अधिकारी को था। बंबई तो उस समय आलसी, सुखभोगी और राष्ट्रद्रोहियों की नगरी ही बनकर रह गई थी। ऐसी स्थिति 1857 का स्वातंत्र्य समर – 387 165 सर जॉर्ज ले ग्रांड जैकब के.सी.एस.आई.सी.बी. कृत- 'वेस्टर्न इंडिया'।

में केवल उन्हीं सैनिकों के हृदय राष्ट्र-प्रेम की पावन ज्वाला से दग्ध हो रहे थे जो वहां तैनात थे। इस स्थिति को समझकर ही फॉरेस्ट की दृष्टि निरंतर उनपर रहती थी। विद्रोह दीपावली के दिन निर्धारित हो चुका था। तदनुसार सैनिकों की गुप्त बैठकों का क्रम भी आरंभ हो चुका था। इन सभाओं में फॉरेस्ट ने अपने विशेष कृपापात्रों को भी घुसाने की भरसक चेष्टा की थी। किंतु सिपाहियों की दक्षता ने उसकी दाल न गलने दी। फॉरेस्ट कभी ब्राह्मण तो कभी अन्य कोई वेश बदलकर स्वयं भी सामूहित भोजों आदि में यदा कदा पहुंचने में सफल हो जाता था। अंततः उसे विदित हो गया कि गंगाप्रासाद नामक एक सज्जन का निवास-स्थान ही गुप्त बैठकों का केंद्र है। किसी-न-किसी प्रकार रौब और आतंक के सारे वह एक दिन गंगाप्रसाद के घर में प्रविष्ट होने में सफल भी हो गया। उसने एक दीवार के छेद से क्रांतिकारियों की पूरी बैठक का भी अवलोकन कर लिया। किंतु क्रांतिकारियों को वहां उसकी उपस्थिति का आभास तक नहीं हो पाया। इतना ही नहीं, वह कतिपय अंग्रेज अधिकारियों को भी एक दिन वहां ले गया और उसने उन्हें भी सबकुछ दिखा दिया। जब एक अंग्रेज अधिकारी ने देखा कि अपने जिन सैनिकों को वे परम राजभक्त समझते थे वे ही एक-एक करके उस बैठक में भाग लेने के लिए आ रहे हैं तो उसके मुख से हठात् निकल पड़ा, "हे मेरे भगवान! ये तो मेरे अपने ही आदमी हैं। क्या ऐसा होना भी संभव है?" इन सिपाहियों के विद्रोह की रूपरेखा सामान्यतः इस प्रकार थी कि पहले बंबई में विद्रोह किया जाए और तदुपरांत पूजा की ओर प्रस्थान किया जाए, और जब वहां अधिकार कर लिया जाए और तदुपरांत पूना की ओर प्रस्थान किया जाए, और जब वहां मराठों का झंडा पुनः फहरा दिया जाए।166 परंतु इस योजना के कार्यान्वित होने के पूर्व ही फॉरेस्ट द्वारा इस योजना का पता लगा लिये जाने के कारण दो विद्रोही नेता फांसी पर लटका दिए गए तथा अन्य छह को सीमा पार कर दिया गया। इस प्रकार वहां सन् 1857 के अक्टूबर मास में ही विद्रोह को पूर्णतः कुचल दिया गया। उन्हीं दिनों नागपुर और जबलपुर में भी क्रांति की चिंगारी फूटने की संभावनाएं प्रतीत होने लगी थी। नागपुर में विद्रोह के लिए सिपाहियों ने 13 जून, 1857 की तिथि निर्धारित की थी। इस योजना को सभी प्रमुख नागरिकों का भी समर्थन प्राप्त था। निर्धारित योजना के अनुसार 13 जून की रात्रि में ग्राम के लोगों को तीन प्रज्वलित आकाशद्वीप आकाश में उठाते थे। इन्हें ही सैनिकों के विद्रोह का संकेत वाक्य निर्धारित किया गया था। यहां क्रांतिकारियों के पक्ष में एक और भी बात थी कि नागपुर से जबलपुर तक के मध्य क्षेत्र में अंग्रेज एक भी गोरी पलन नहीं रख पाए थे। किंतु कुछ ही समय उपरांत मद्रास से गोरी पलटन आ पहुंची और उसने विद्रोह का दमन कर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 388 166 फॉरेस्ट कृत-'रियल डेंजर इन इंडिया'।

दिया। जबलपुर में गोंड जाति के राजा शंकर सिंह और उनके पुत्र द्वारा सर्वत्र क्रांति की ज्वाला धधकाई जा रही थी। जब उन्हें अंग्रेजों द्वारा बंदी बना लिया गया तो उनके पास से एक रेशमी बस्ता भी मिला, जिसमें वह प्रातः स्मरण की श्लोक पंक्ति भी एक कागज पर लिखी मिली, जिसका राजा शंकर सिंह प्रतिदिन पाठ करते थे। उसके अंग्रेजी भाषांतर का हिंदी रूपांतर संक्षेप में इस प्रकार है- साधुओं से छल और दुष्कृत्य कर रहे नित्य, दुष्ट दलन हेतु धाओ त्वरित, आओ देवि चंडिके। शत्रुओं का दलन करो, धम्न संस्थापन करो, भक्त की पुकार सुनो, ध्याओ शीघ्र मातृके। आंग्ल दुष्ट संहार करो, धरती का त्रास हरो, शत्रु रक्त पी अघाओ, आओ शत्रु संहारके! राजा शंकर सिंह ने 52वीं रेजिमेंट को भी अपने साथ विद्रोह में सम्मिलित करने का प्रयास किया था। इस आरोप में उनको पुत्र सहित 18 सितंबर, 1857 को तोप से उड़ा दिया गया। किंतु इस समाचार ने निराश होने के स्थान पर 52वीं पलटने ने विद्रोह का शंखनाद ही कर दिया। उन्होंने रणभूमि में कूदकर एक अंग्रेज अधिकारी येक ग्रेगर को यमलोक ही पठा दिया। इसी भांति धार राज्य में भी विद्रोह की ज्वालाएं दहकी थीं तो दिल्ली के राजपुत्र वीर फीरोजशाह के द्वारा किए गए प्रयासों के फलस्वरूप महिदपुर और गौरेया में भी क्रांति का विस्फोट हुआ था, जिसका विवरण हम यहां विस्तार के भय से प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं। किंतु इन सभी स्थानों की अपेक्षा ब्रिटिश सत्ता का मर्मस्थान तो हैदराबाद के निजाम के हाथों में ही था। इस राज्य के सिंहासन पर मई 1857 के मध्य में अफजल उलउद्दौला सिंहासनासीन हुआ था। सर सालारजंग नामक व्यक्ति उसके दीवान पद का भार वहन कर रहा था। इस सालारगंज में अपने इशारे मात्र पर ही संपूर्ण दक्षिण को उठाने की क्षमता थी। यदि हैदराबाद का निजाम विद्रोह में शामिल हो जाता तो यह सुनिश्चित था कि संपूर्ण दक्षिण प्रदेश ही एक व्यक्ति के समान उठ खड़ा होता । फिर उत्तर में हुए विद्रोह के कारण पड़नेवाले दबाव से कसमसाकर टूटने की स्थिति में आई हुई ब्रिटिश साम्राज्य की आयु की डोरी दक्षिण का भी दबाव पड़ने से निश्चित रूप से कड़कड़ाकर टूक-टूक हो जाती। यह भी कैसे कहा जाए कि अंग्रेजों के विरूद्ध प्रारंभ किए गए इस स्वातंत्र्य संग्राम के सिद्धांतों से किसी ने सालारजंग को अवगत नहीं कराया होगा। यही मानना होगा कि सर सालारजंग के अंतःकरण में इतनी प्रचंड 'राजभक्ति' विद्यमान थी कि उसने स्वधर्म, स्वराज्य और स्वतंत्रता के प्रति प्रेम की एक भी तरंग से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 389

उसके हृदय को तरंगित नहीं होने दिया। किंतु इतने पर भी उसे क्रांति के संघर्ष में योगदान देने के लिए प्रेरित करने में हैदाराबाद की जनता ने कोई कसर न उठा रखी थी। किंतु सालारजंग अविचल ही रहा। तब हैदराबाद में 12 जून को प्रातः काल ही अत्यधिक उत्तेजना परिलक्षित हुई। उस दिन एक लब्धप्रतिष्ठ मौलवी के हस्ताक्षरों से युक्त भित्तिपत्रक यत्र-तत्र दीवारों पर चिपके हुए दृष्टिगोचर हुए। क्रांतिकारी हस्तपत्रकों के तो अंबार ही लग गए थे। मसजिदों में मुसलमानों की विशाल सभाएं भी आयोजित हुईं, जहां उत्तेजित भाषण होते थे और लोगों से ये प्रतिज्ञाएं कराई जाती थीं कि फिरंगी काफिरों को भारत से निष्कासित करके ही चैन की सांस ली जाएगी। किंतु सालारजंग पर तो इन सभी घटनाओं का विपरीत प्रभाव पड़ा। उसने कुछ क्रांतिकारी नेताओं को बंदी बनाकर अंग्रेजों को सौंप दिया। किंतु इसपर भी 17 जुलाई को हैदराबाद में विद्रोह का शंखनाद गूंज उठा और क्रांतिकारी नारों की गूंज सर्वत्र सुनाई पड़ने लगी। क्रांति की पताका फहराते हुए लोग अपने नेताओं को मुक्त कराने के लिए ब्रिटिश रेजिडेंसी में प्रविष्ट हो गए। सर्वप्रथम निजाम की सेना के ही रूहेलों ने विद्रोह की पताका फहराई थी और लगभग पांच सौ नागरिक भी इसमें सम्मिलित हुए थे। ब्रिदोहियों को आशा थी कि सालारगंज खुलकर भले ही उनकी सहायता न करे, किंतु गुप्त रूप से तो उनकी सहायता करेगा ही और यदि उसने ऐसा भी न किया तो वह कम-से-कम तटस्थ तो अवश्य ही रहेगा; किंतु उसने तो सभी की आशाओं पर तुषारपात कर दिया। वह उनसे न मिलकर शांत ही नहीं बैठा रहा, अपितु उसने तो ब्रिटिश अधिकारियों से हाथ मिलाकर अपने ही सैनिकों की हत्या करने में भी संकोच नहीं किया। एक मुठभेड़ में क्रांतिकारी नेता तोराबाज खां मारे गए तो अलाउद्दीन नामक एक अन्य नेता शत्रुओं द्वारा बंदी बना लिया गया। उसे तत्काल ही अंडमान भेज दिया गया। इस प्रकार हैदराबाद में हुआ क्रांति का प्रयत्न असफल हो गया। एक अंग्रेज इतिहासकार ने स्पष्टतः इन शब्दों में वस्तुस्थिति को स्वीकार किया है- “तीन मास तक संपूर्ण भारत का भाग्य निजाम अफजलउद्दौला और सालारगंज के ही हाथों में था। उनकी बुद्धिमत्तापूर्ण नीति से यह सिद्ध होता है कि उन्होंने विद्रोही सिपाहियों के प्रयासों से दिल्ली के राजसिंहासन के पुनः प्रतिष्ठित होने की आशा पर संदिग्ध अवस्था में पड़े रहकर अवलंबित रहने के स्थान पर अंग्रेजों की छत्रच्छाया में मांडलिक बनकर रहना ही श्रेष्ठ समझा।‘' सालारजंग की इस अस्पृहणीय कारस्तानी के कारण इतिहास उसकी सदैव ही निंदा करता रहेगा। इस प्रकार जहां दक्षिण मं निजाम क्रांति का विनाश करने में तल्लीन था वहां उसी के राज्य के समीप स्थित जोहरापुर के तरूण हिंदू राजा ने अपना सर्वस्व स्वातंत्र्य संग्राम में समर्पित कर देने का सत्संकल्प ग्रहण किया था। तदनुसार उसने अरब, रूहेलों, पठानों 1857 का स्वातंत्र्य समर - 390

तथा डोगरों की एक सेना का गठन किया था। उन्हीं दिनों उसके पास नाना साहब के दूत भी पहुंचे थे और उन्होंने उसको नाना साहब के पक्ष में उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया था। रायचूर और अर्काट के भी कुछ ब्राह्मणों और मौलवियों ने उसे प्रेरित किया। किंतु इन सबके प्रोत्साहित करने पर भी ज बवह अंग्रेजों के विरुद्ध उठकर खड़े होने में टालमटोल कर रहा था तो उसकी प्रजा ने ही उसे कायर कहकर ताने देने आरंभ कर दिए। तब उसने पेशवा के नाम पर अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह प्रारंभ कर दिया। किंतु निजाम और अंग्रेज इन दोनों की शक्ति के विरूद्ध उस अकेले की पर न बसी। अतः सन् 1858 के फरवरी मास में यह वीर नरेश अपनी सेनाओं के पराभव के उपरांत हैदराबाद में आ गया। ज बवह वहां के बाजारों में टहल रहा था तो उसे सालारगंज ने बंदी बना लिया। अंग्रेज अधिकारी मेडोज टेलर को ही भेजा गया। किंतु गुप्त संगठन और उसमें योगदान के संबंध में जब राजा से टेलर ने प्रश्न किया तो उसने क्या उत्तर दिया, यह टेलर के शब्दों में ही बताना उत्तम होगा। मेडोज टेलर ने लिखा है कि "वह तत्काल तनकर खड़ा हो गया और बड़े आवेश सहित उसने कहा, 'नहीं अप्पा, जिस संबंध में तुम मुझे रेजीडेंसी से भेंट करने के लिए कह रहे हो, मैं उस बात को कदापि स्वीकार नहीं करूंगा; रेजीडेंस समझता होगा कि मैं अपने प्राणदान के लिए उससे याचना करूंगा, किंतु स्मरण रहे अप्पा, मैं अपने सहयोगी देशबांधुवों के नाम तो जीवन की अंतिम घड़ी तक भी नहीं बता सकता हूं, किंतु यदि मुझे मेरे स्फूर्तिदाता का नाम बताने हेतु बाध्य किया जाता है तो मेरा स्पष्ट उत्तर है 'नहीं'। क्या काल के गाल में जाने के हेतु बाध्य किया जाता हो तो मेरा स्पष्ट उत्तर है 'नहीं। क्या तोप से उड़ाए जाने, कालेपानी में सड़ाए जाने अथवा फांसी पर लटकाए जाने, इन सबसे भी अधिक भयंकर दंड-अपने आपको देशद्रोहियों की श्रेणी में गिना जाना मानता हूं।'' वीरव्रती नरेश गरज उठा, "अप्पा, मैं तुमसे एक ही याचना करता हूं कि मुझे फांसी पर न लटकाओ, अपितु मुझे तोप से उड़ा दो, फिर तुम देखोगे कि मैं कितनी निर्भीकता और शांति से तोप के समक्ष सधकर खड़ा होता हूं।''

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उस देशभक्त नरेश को पहले फांसी का ही दंड सुनाया गया, किंतु मेडोज टेलर के हस्तक्षेप से उसे कालापानी के दंड में परिवर्तित कर दिया गया। उसे जब अंडमान भेजा जा रहा था तो उसने समीप में किसी को न पाकर जेल के एक वार्डर से पिस्तौल छीन ली और अपने ऊपर गोली दागकर प्राण विसर्जित करते हुए ये अंतिम शब्द कहे-"काला पानी से तो मृत्यु ही श्रेयस्कर है। मेरा तो एक साधारण सा प्रहरी भी बंदीशाला में नहीं रहेगा, फिर मैं तो उनका राजा हूं। मैं कदापि बंदी नहीं रह सकता।'"167 जोहरापुर के नरेश का इस प्रकार पराभव होते हुए देखकर अब तक असमंजस में पड़े नरगुंद के नरेश ने भी अब विद्रोह करने के लिए कमर कस ली। इस वीरव्रती का नाम था भास्करराव बाबासाहब! बाबासाहब बड़ा विद्या-प्रेमी था। उसने अपने पुस्तकालय में विभिन्न उत्तम ग्रंथों का एक संग्रहालय भी बनाया था। वह स्वतः तो दयालु था ही, उसकी धर्मपत्नी भी अनिंद्य सुंदरी थी और साहसी भी। जब उसे दत्तक पुत्र लेने की स्वीकृति न दी गई थी तभी से उसने अंग्रेजी राज्य का सर्वनाश कर देने का संकल्प कर लिया था। उसी की प्रेरणा से, नितांत ही संकोच सहित नरगुंद नरेश ने 25 मई, 1857 को अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठा लिये। बाबासाहब ने ब्रिटिश राज्य सत्ता की दासता का तौक गले से तोड़कर फेंक दिया। जब उन्हें विदित हुआ कि अंग्रेज अधिकारी मैनसन उनपर आक्रमण करने के लिए आ रहा है तो उन्होंने अपने कतिपय विश्वस्त साथियों के साथ नरगुंद के समीप स्थित वन में ही उसे घेर लिया। मैनसन को यमलोक पठा दिया गया और वीर सैनिक उसका सिर काटकर ले आए। मैनसन को यमलोक पठा दिया गया और वीर सैनिक उसका सिर काटकर ले आए। वे इस अंग्रेज अधिकारी के सिर को जुलूस के रूप में नरगुंद लाए और अगले दिन उसे नरगुंद नगर के प्रवेशद्वार पर टांग दिया था। किंतु नरगुंद नरेश के ही सौतेले भाई ने क्रांतिकारियों के साथ सहयोग देना ही स्वीकार नहीं किया, अपितु वह अंग्रेजों से भी जा मिला। अंग्रेज सेना ने नरगुंद पर आक्रमण कर वहां की सेना को पराजित कर दिया। किंतु बाबासाहब शत्रुओं के हाथ में आने से बच निकलने में सफल हो गए। बाद में एक दिन गुप्त रूप से घूमते हुए वे बंदी बना लिये गए और 12 जून को अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दे दी। उनकी नवयुवती, परम सुंदरी महारानी भी जीते-जी अंग्रेजों के हाथ न आई, अपितु उसने अपनी सास सहित मलप्रभा नदी की जलधारा में छलांग लगाकर प्राण विसर्जित कर दिए। इनके अतिरिक्त कोमलदुर्ग के भीमराव, सावंतवाड़ी के अधिपति इत्यादि अन्य लोगों ने भी पेशवा के नाम पर अनेक स्थानों पर विद्रोह किए। किंतु विद्रोह का ठीक समय निर्धारित करने की चतुरता के अभाव, संगठन की अपूर्णता एवं एकाकी और असंगठित जनबल के आधार पर दक्षिण में हुई क्रांतियों में से कोई भी प्रभावी सिद्ध नहीं हुई और अंग्रेजों को भी अपना अधिक ध्यान केंद्रित नहीं करना पड़ा। परिणामतः उन्हें

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167 मेडोज टेलर कृत-'स्टोरी ऑफ माई लाइफ'।

उत्तर में ही अपनी संपूर्ण शक्ति लगाने का सुयोग्य मिल गया। इस प्रकार दक्षिण का विहंगावलोकन करते के उपरांत अब हमें पुनः अहमदशाह की उस वीररस-प्रचुर चरित्र कथा के उस अध्याय पर दृष्टिपात करना होगा ज बवह तड़पते और कराहते अवध की पीड़ा का हरण करने के लिए अंतिम बार प्रयासरत हुआ था। मौलवी सरीखे असाधारण वीरों की मृत्यु भी उनके जीवन के सदृश ही वैभवशाली होती है। दूसरे अनेक व्यक्ति रणभूमि में संघर्ष करते हुए स्वर्ग सिधारते हैं; किंतु जिनके अंतःकरणों में राष्ट्रभक्ति की पावन ज्वाला प्रज्वलित हो रही हो, उसके शमन हेतु रणभूमि पर ‘रक्त-रक्त कहते जो तांडव करते हुए अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हैं, उन्हें तो वस्तुतः मृत्यु भी नहीं मार पाती। ऐसे महान् योद्धा यदि प्रतिशोध की अग्नि पूर्णतः बुझ जाने के पूर्व ही रणभूमि में प्राण विसर्जित कर दें तो भी यमराज के अधीन नहीं हो पाते। यह भी देखा गया है कि ऐसे महान् वीर का शीश धड़ से पृथक् हो जाने पर उनका धड़ ही समर में लिप्त रहता है। और अनेक लोगों में यह भी धारणा व्याप्त है कि यदि ऐसे महावीर के धड़ के भी टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएं तब भी उस वीर का अदृश्य भूत ही रात्रि में शत्रुओं की छाती पर चढ़कर अपनी प्रतिशोधाग्नि को शांत करता है। इस धारणा के मूल में कोई-न-कोई तथ्य अवश्य ही है, ऐसा प्रतीत होता है। जब मौलवी अहमदा शाह समर भूमि में लड़ रहे थे, उस समय लॉर्ड केनिंग ने एक घोषणा प्रसारित कर संपूर्ण अवधवासियों पर यह व्यक्त किया था कि “जो स्वतः आत्मसमर्पण कर देगा उसे विद्रोही न समझते हुए उसके पूर्व के सभी अपराधों को दया सहित क्षमा कर दिया जाएगा और जो लोग आज हमारा साथ दे रहे हैं उनकी संपत्ति और जागीरें आदि भी वापस दे दी जाएंगी। अब अंग्रेजी सत्ता की निश्चित रूपेण विजय हो रही है, अतः अवध के जो लोग अभी भी ब्रिटिश सत्ता का विरोध करने पर डटे रहेंगे उन्हें उनके इस हठ के लिए कठोरतम दंड दिया जाएगा।‘‘ अंग्रेज यह समझते थे किइस घोषणा के उपरांत अवध के प्रायः सभी जमींदार शांत हो जाएंगे। परंतु इन्हीं दिनों यह समाचार भी मिला कि ‘पावेन के राजा ने 5 जून, 1857 को मौलवी अहमद शाह का सिर काट लिया है।’ मंद होती हुई अग्नि मौलवी की मृत्यु के समाचार से पुनः दहक उठी। अत्यधिक प्रयत्नों के उपरांत मिली असफलता से जो अवध थक गया था और जिसे क्षमा के प्रलोभन में फंसाया जा रहा था, वह अवध मौलवी के निधन पर शोक प्रदर्शन करने के स्थान पर ‘प्रतिशोध’, ‘प्रतिशोध’ की गर्जना करता हुआ पुनः रणभूमि में कूद पड़ा। मौलवी का शीश तो उनके क्रूर शत्रु ने काटकर निश्चित रूप से ही नगर के तोरण द्वार पर लटका दिया था, किंतु अब तो उसका धड़ ही रणभूमि में अंग्रेजों के होश उड़ा रहा था। मौलवी की हत्या के कारण संपूर्ण अवध पर ही मानो उनका भूत सवार हो गया था और अब अवध जय-पराजय, हानि-लाभ, आशा-निराशा और जीवन-मरण 1857 का स्वातंत्र्य समर – 393

का मोह त्यागकर नवीन और प्रचंड उत्साह सहित शत्रु से संघर्ष हेतु रणभूमि में पुनः उतर पड़ा था। पावेन के चांडाल से प्रतिशोध लेने के लिए निजाम अली खां पीलीभीत जा पहुंचा । खानबहादुर खान ने चार हजार लोगों को लेकर चढ़ाई की तो फर्रुखाबाद के नेता के साथ पांच हजार लोग थे और तीन हजार लोगों सहित विलायतशाह तथा तीन हजार को साथ लेकर ही नाना साहब, अली खां मेवाती और उनके अनुगामियों ने संपूर्ण अवध में ही उथल-पुथल मचा दी। इनमें से प्रत्येक ही पावेन के राजा का रक्त पीने के लिए उतावला था। इतनी विशाल वाहिनी को चढ़कर आता हुआ देखकर इस देशद्रोही पापी का अंग-अंग कांप उठा। उसके संरक्षण के लिए अंग्रेजी सेना भी वहां तीव्र गति से एकत्रित होती जा रही थी। इस प्रदेश के आसपास शत्रुओं से क्रांतिकारियों का घमासान संघर्ष हो रहा था। घाघरा नदी के तट पर बेगम हजरत महल और हेमू खां डेरा डाले हुए थे। इधर राजा रामबख्श, बाहुनाथ सिंह, चांद सिंह, हनुमंत सिंह एवं अन्य बड़े-बड़े जमींदार अपनी संपूर्ण सेना लेकर अवध क स्वतंत्रता के लिए एक और प्रयास करने में लगे थे। इसी भांति शहजादा फिरोजाबाद, जो अभी तब धार में युद्ध कर रहा था, अवध आ पहुंचा था। अपने असाधारण धैर्य का परिचय देकर कोया के दुर्ग की रक्षा करनेवाले वीर पिता के वीर पुत्र नृपति सिंह अवध के संग्राम में भाग लेने के लिए आ पहुंचे थे। उसके पिता जुस्सा सिंह नाना साहब के परम मित्र थे और स्वतंत्रता के युद्ध में ही उन्होंने अपने प्राण विसर्जित किए थे। उन्होंने ही नाना साहब को अपने दुर्ग में आश्रय दिया था। इसी भांति देशप्रेम क पावन प्रेरणा लिये दृढ़ता और उत्साह से बढ़ता राजा वेणीमाधव भी अपने दुर्ग से निकलकर देश-रक्षा हेतु रण-कंकण बांधकर प्रचंड शौर्य का प्रदर्शन करता कानपुर होते हुए लखनऊ के लिए चल पड़ा। जिनकी विजयी होने की आशाएं धूमिल हो गई हों, किंतु जो जाति के सम्मान हेतु मरण का वरण करने चल पड़े हों, उनके साहस का पारावार पा भी कौन सकता है! केवल अपने क्षत्रिय धर्म का निर्वाह करने हेतु वीर वेणीमाधव ने अनुपम साहस का प्रदर्शन किया था। उन्हें तो विजय प्राप्ति की किंचित् मात्र भी आशा नहीं थी। किंतु विलंब से ही क्यों न हो, उसने लखनऊ पर धावा बोल दिया था। उसने लखनऊ नगर में यह विज्ञप्ति भी प्रसारित कर दी कि नगर में रहनेवाले सभी भारतीय नगर छोड़ दें, क्योंकि फिरंगियों पर मेरा प्रचंड प्रहार आरंभ होनेवाला है। विजय से उत्मत्त और पूर्ण अनुशासनबद्ध सेना से सुरक्षित अंग्रेज भी उसकी इस घोषणा, तत्परता और साहस से आश्चर्यचकित हो गए थे। इसमें आश्चर्य की कौन सी बात थी। मृतवत् और साहस से आश्चर्यचकित हो गए थे। इसमें आश्चर्य की कौन सी बात थी। तत्परता अवध एक निमिष मात्र के लिए क्यों न हो पुनः प्राणहान् सा होकर खड़ा हो गया था। लखनऊ पर इससे पूर्व क्रांतिकारियों का जितना प्रबल आक्रमण पहले कभी भी नहीं हो पाया था, वैसा अब होने वाला था। रक्त के सागर से ता अभी भी अवध के अंग सूख नहीं पाए थे, तभी 13 जून 1857 का स्वातंत्र्य समर -394

1857 को होप ग्रांट लखनऊ के समीप नवाबगंज की ओर बढ़ चला, जहां लखनऊ प्रस्थान करने के लिए क्रांतिकारी वीर एकत्र हुए थे। उन्हें अपनी विजय की तो किंचित मात्र भी आशा नहीं थी। उनपर होप ग्रांट सहसा ही अपने गोरे और कोल सैनिकों सहित टूट पड़ा। अन्य कोई सेना होती तो ऐसे आक्रमण की स्थिति में उसका तितर-बितर हो जाना अपरिहार्य था। परंतु हे क्रांतिवीरों, ठहरो; अभी तो मौलवी का निधन हुए आठ दिन भी व्यतीत नहीं हा पाए हैं। अतः रुको! वे रुके और उन्होंने आक्रमण का प्रतिकार करना आरंभ कर दिया। उन्होंने प्रचंड, उत्कर्ष शौर्य का परिचय दिया उसे देखकर तो शत्रुओं के हृदय भी उनकी वीरता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। आंग्ल वीर होप ग्रांट ने भी उनकी वीरता के संबंध में लिखा-“इतने पर भी उनके आ क्रमण बड़े ही प्रचंड होते थे और उन्हें विफल बनाने के लिए हमें कठोर परिश्रम करना पड़ा। सुदृढ़ साहसी जमींदारों ने दो तोपों सहित हमारी सेना के पिछले भाग पर आक्रमण कर दिया। मैंने हिंदुस्थान में अनेक संग्राम देखे हैं और विजय अथवा मृत्यु का वरण करने के लिए कृतसंकल्प सुभट वीरों को भी देखा है, किंतु जिस असाधारण वीरता का प्रदर्शन इन जमींदारों ने किया वैसी वीरता शायद ही कहीं देखी हो। सर्वप्रथम उन्होंने हडसन के अश्वारोही दल पर आक्रमण किया और उसे तितर-बितर कर दिया और उसकी दो तोपें भी विचलित-सी हो गई। उस समय मैंने सातवीं हुजार पलटन के दस्तों को आगे बढ़ने का आदेश दिया, उनके चार तोपें भी थीं। ये तोपें विद्रोहियों पर केवल पांच सौ गज के अंतर से ही अग्नि-वर्षा कर रही थीं। विद्रोही हंसियां से काटे जानेवाले भुट्टों की तरह गिरते जा रहे थे। उनके प्रमुख ने, जो काफी मोटा था, निर्भय होकर दो पताकाएं अपनी तोपों के समक्ष गाड़ दी। वस्तुतः यह वहीं डटे रहने का संकेत था। किंतु हमारी तोपों से इतने प्रचंड प्रहार हो रहे थे कि जो भी उनके समीप आता, धराशायी हो जाता। हमारी सहायता के लिए अन्य दो दस्ते भी आ पहुंचे। अतः बचे हुए विद्रोहियों को हटना पड़ा। फिर भी वे हम पर तलवारें और भाले चमकाते हुए हमें चुनौती देते रहे। केवल उन दो तोपों के चारों ओर ही एक सौ पच्चीस शव पड़े हुए थे। तीन घंटे के संग्राम के उपरांत विजयश्री हमारे हाथ रही।‘’168 इस प्रकार की घमासान मुठभेड़ पूर्वी अवध, मध्य अवध, उत्तरी अवध अथवा संपूर्ण अवध में ही आरंभ हो गई थीं। अपनी पुरानी शमशीरों और तोड़ेदार बंदूकों से ही अवधवासी अंग्रेजी की प्रबल सत्ता को चुनौती दे रहे थे। अंग्रेजों के रचे हुए जाल को उनकी कृपाणें काट डालने में संलग्न हो उठी थीं। इन उग्र हठी रणवीरों के प्रबल पराक्रम का पूर्ण विवरण प्रस्तुत करना तो स्थानाभाव के कारण संभव नहीं है। किंतु इतना कहना ही उपयुक्त होगा कि अवधवासी रणांगण में भयंकर तांडव करने में संलग्न 1857 का स्वातंत्र्य समर – 395 168 होपग्रांट कृत-‘इंसीडेंट्स ऑफ द सेपॉय वार’, पृष्ठ 292 ।