भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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उसके हृदय को तरंगित नहीं होने दिया। किंतु इतने पर भी उसे क्रांति के संघर्ष में योगदान देने के लिए प्रेरित करने में हैदाराबाद की जनता ने कोई कसर न उठा रखी थी। किंतु सालारजंग अविचल ही रहा। तब हैदराबाद में 12 जून को प्रातः काल ही अत्यधिक उत्तेजना परिलक्षित हुई। उस दिन एक लब्धप्रतिष्ठ मौलवी के हस्ताक्षरों से युक्त भित्तिपत्रक यत्र-तत्र दीवारों पर चिपके हुए दृष्टिगोचर हुए। क्रांतिकारी हस्तपत्रकों के तो अंबार ही लग गए थे। मसजिदों में मुसलमानों की विशाल सभाएं भी आयोजित हुईं, जहां उत्तेजित भाषण होते थे और लोगों से ये प्रतिज्ञाएं कराई जाती थीं कि फिरंगी काफिरों को भारत से निष्कासित करके ही चैन की सांस ली जाएगी। किंतु सालारजंग पर तो इन सभी घटनाओं का विपरीत प्रभाव पड़ा। उसने कुछ क्रांतिकारी नेताओं को बंदी बनाकर अंग्रेजों को सौंप दिया। किंतु इसपर भी 17 जुलाई को हैदराबाद में विद्रोह का शंखनाद गूंज उठा और क्रांतिकारी नारों की गूंज सर्वत्र सुनाई पड़ने लगी। क्रांति की पताका फहराते हुए लोग अपने नेताओं को मुक्त कराने के लिए ब्रिटिश रेजिडेंसी में प्रविष्ट हो गए। सर्वप्रथम निजाम की सेना के ही रूहेलों ने विद्रोह की पताका फहराई थी और लगभग पांच सौ नागरिक भी इसमें सम्मिलित हुए थे। ब्रिदोहियों को आशा थी कि सालारगंज खुलकर भले ही उनकी सहायता न करे, किंतु गुप्त रूप से तो उनकी सहायता करेगा ही और यदि उसने ऐसा भी न किया तो वह कम-से-कम तटस्थ तो अवश्य ही रहेगा; किंतु उसने तो सभी की आशाओं पर तुषारपात कर दिया। वह उनसे न मिलकर शांत ही नहीं बैठा रहा, अपितु उसने तो ब्रिटिश अधिकारियों से हाथ मिलाकर अपने ही सैनिकों की हत्या करने में भी संकोच नहीं किया। एक मुठभेड़ में क्रांतिकारी नेता तोराबाज खां मारे गए तो अलाउद्दीन नामक एक अन्य नेता शत्रुओं द्वारा बंदी बना लिया गया। उसे तत्काल ही अंडमान भेज दिया गया। इस प्रकार हैदराबाद में हुआ क्रांति का प्रयत्न असफल हो गया। एक अंग्रेज इतिहासकार ने स्पष्टतः इन शब्दों में वस्तुस्थिति को स्वीकार किया है- “तीन मास तक संपूर्ण भारत का भाग्य निजाम अफजलउद्दौला और सालारगंज के ही हाथों में था। उनकी बुद्धिमत्तापूर्ण नीति से यह सिद्ध होता है कि उन्होंने विद्रोही सिपाहियों के प्रयासों से दिल्ली के राजसिंहासन के पुनः प्रतिष्ठित होने की आशा पर संदिग्ध अवस्था में पड़े रहकर अवलंबित रहने के स्थान पर अंग्रेजों की छत्रच्छाया में मांडलिक बनकर रहना ही श्रेष्ठ समझा।‘' सालारजंग की इस अस्पृहणीय कारस्तानी के कारण इतिहास उसकी सदैव ही निंदा करता रहेगा। इस प्रकार जहां दक्षिण मं निजाम क्रांति का विनाश करने में तल्लीन था वहां उसी के राज्य के समीप स्थित जोहरापुर के तरूण हिंदू राजा ने अपना सर्वस्व स्वातंत्र्य संग्राम में समर्पित कर देने का सत्संकल्प ग्रहण किया था। तदनुसार उसने अरब, रूहेलों, पठानों 1857 का स्वातंत्र्य समर - 390