१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतथा डोगरों की एक सेना का गठन किया था। उन्हीं दिनों उसके पास नाना साहब के दूत भी पहुंचे थे और उन्होंने उसको नाना साहब के पक्ष में उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया था। रायचूर और अर्काट के भी कुछ ब्राह्मणों और मौलवियों ने उसे प्रेरित किया। किंतु इन सबके प्रोत्साहित करने पर भी ज बवह अंग्रेजों के विरुद्ध उठकर खड़े होने में टालमटोल कर रहा था तो उसकी प्रजा ने ही उसे कायर कहकर ताने देने आरंभ कर दिए। तब उसने पेशवा के नाम पर अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह प्रारंभ कर दिया। किंतु निजाम और अंग्रेज इन दोनों की शक्ति के विरूद्ध उस अकेले की पर न बसी। अतः सन् 1858 के फरवरी मास में यह वीर नरेश अपनी सेनाओं के पराभव के उपरांत हैदराबाद में आ गया। ज बवह वहां के बाजारों में टहल रहा था तो उसे सालारगंज ने बंदी बना लिया। अंग्रेज अधिकारी मेडोज टेलर को ही भेजा गया। किंतु गुप्त संगठन और उसमें योगदान के संबंध में जब राजा से टेलर ने प्रश्न किया तो उसने क्या उत्तर दिया, यह टेलर के शब्दों में ही बताना उत्तम होगा। मेडोज टेलर ने लिखा है कि "वह तत्काल तनकर खड़ा हो गया और बड़े आवेश सहित उसने कहा, 'नहीं अप्पा, जिस संबंध में तुम मुझे रेजीडेंसी से भेंट करने के लिए कह रहे हो, मैं उस बात को कदापि स्वीकार नहीं करूंगा; रेजीडेंस समझता होगा कि मैं अपने प्राणदान के लिए उससे याचना करूंगा, किंतु स्मरण रहे अप्पा, मैं अपने सहयोगी देशबांधुवों के नाम तो जीवन की अंतिम घड़ी तक भी नहीं बता सकता हूं, किंतु यदि मुझे मेरे स्फूर्तिदाता का नाम बताने हेतु बाध्य किया जाता है तो मेरा स्पष्ट उत्तर है 'नहीं'। क्या काल के गाल में जाने के हेतु बाध्य किया जाता हो तो मेरा स्पष्ट उत्तर है 'नहीं। क्या तोप से उड़ाए जाने, कालेपानी में सड़ाए जाने अथवा फांसी पर लटकाए जाने, इन सबसे भी अधिक भयंकर दंड-अपने आपको देशद्रोहियों की श्रेणी में गिना जाना मानता हूं।'' वीरव्रती नरेश गरज उठा, "अप्पा, मैं तुमसे एक ही याचना करता हूं कि मुझे फांसी पर न लटकाओ, अपितु मुझे तोप से उड़ा दो, फिर तुम देखोगे कि मैं कितनी निर्भीकता और शांति से तोप के समक्ष सधकर खड़ा होता हूं।''
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