१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउस देशभक्त नरेश को पहले फांसी का ही दंड सुनाया गया, किंतु मेडोज टेलर के हस्तक्षेप से उसे कालापानी के दंड में परिवर्तित कर दिया गया। उसे जब अंडमान भेजा जा रहा था तो उसने समीप में किसी को न पाकर जेल के एक वार्डर से पिस्तौल छीन ली और अपने ऊपर गोली दागकर प्राण विसर्जित करते हुए ये अंतिम शब्द कहे-"काला पानी से तो मृत्यु ही श्रेयस्कर है। मेरा तो एक साधारण सा प्रहरी भी बंदीशाला में नहीं रहेगा, फिर मैं तो उनका राजा हूं। मैं कदापि बंदी नहीं रह सकता।'"167 जोहरापुर के नरेश का इस प्रकार पराभव होते हुए देखकर अब तक असमंजस में पड़े नरगुंद के नरेश ने भी अब विद्रोह करने के लिए कमर कस ली। इस वीरव्रती का नाम था भास्करराव बाबासाहब! बाबासाहब बड़ा विद्या-प्रेमी था। उसने अपने पुस्तकालय में विभिन्न उत्तम ग्रंथों का एक संग्रहालय भी बनाया था। वह स्वतः तो दयालु था ही, उसकी धर्मपत्नी भी अनिंद्य सुंदरी थी और साहसी भी। जब उसे दत्तक पुत्र लेने की स्वीकृति न दी गई थी तभी से उसने अंग्रेजी राज्य का सर्वनाश कर देने का संकल्प कर लिया था। उसी की प्रेरणा से, नितांत ही संकोच सहित नरगुंद नरेश ने 25 मई, 1857 को अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठा लिये। बाबासाहब ने ब्रिटिश राज्य सत्ता की दासता का तौक गले से तोड़कर फेंक दिया। जब उन्हें विदित हुआ कि अंग्रेज अधिकारी मैनसन उनपर आक्रमण करने के लिए आ रहा है तो उन्होंने अपने कतिपय विश्वस्त साथियों के साथ नरगुंद के समीप स्थित वन में ही उसे घेर लिया। मैनसन को यमलोक पठा दिया गया और वीर सैनिक उसका सिर काटकर ले आए। मैनसन को यमलोक पठा दिया गया और वीर सैनिक उसका सिर काटकर ले आए। वे इस अंग्रेज अधिकारी के सिर को जुलूस के रूप में नरगुंद लाए और अगले दिन उसे नरगुंद नगर के प्रवेशद्वार पर टांग दिया था। किंतु नरगुंद नरेश के ही सौतेले भाई ने क्रांतिकारियों के साथ सहयोग देना ही स्वीकार नहीं किया, अपितु वह अंग्रेजों से भी जा मिला। अंग्रेज सेना ने नरगुंद पर आक्रमण कर वहां की सेना को पराजित कर दिया। किंतु बाबासाहब शत्रुओं के हाथ में आने से बच निकलने में सफल हो गए। बाद में एक दिन गुप्त रूप से घूमते हुए वे बंदी बना लिये गए और 12 जून को अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दे दी। उनकी नवयुवती, परम सुंदरी महारानी भी जीते-जी अंग्रेजों के हाथ न आई, अपितु उसने अपनी सास सहित मलप्रभा नदी की जलधारा में छलांग लगाकर प्राण विसर्जित कर दिए। इनके अतिरिक्त कोमलदुर्ग के भीमराव, सावंतवाड़ी के अधिपति इत्यादि अन्य लोगों ने भी पेशवा के नाम पर अनेक स्थानों पर विद्रोह किए। किंतु विद्रोह का ठीक समय निर्धारित करने की चतुरता के अभाव, संगठन की अपूर्णता एवं एकाकी और असंगठित जनबल के आधार पर दक्षिण में हुई क्रांतियों में से कोई भी प्रभावी सिद्ध नहीं हुई और अंग्रेजों को भी अपना अधिक ध्यान केंद्रित नहीं करना पड़ा। परिणामतः उन्हें
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167 मेडोज टेलर कृत-'स्टोरी ऑफ माई लाइफ'।