१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तर में ही अपनी संपूर्ण शक्ति लगाने का सुयोग्य मिल गया। इस प्रकार दक्षिण का विहंगावलोकन करते के उपरांत अब हमें पुनः अहमदशाह की उस वीररस-प्रचुर चरित्र कथा के उस अध्याय पर दृष्टिपात करना होगा ज बवह तड़पते और कराहते अवध की पीड़ा का हरण करने के लिए अंतिम बार प्रयासरत हुआ था। मौलवी सरीखे असाधारण वीरों की मृत्यु भी उनके जीवन के सदृश ही वैभवशाली होती है। दूसरे अनेक व्यक्ति रणभूमि में संघर्ष करते हुए स्वर्ग सिधारते हैं; किंतु जिनके अंतःकरणों में राष्ट्रभक्ति की पावन ज्वाला प्रज्वलित हो रही हो, उसके शमन हेतु रणभूमि पर ‘रक्त-रक्त कहते जो तांडव करते हुए अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हैं, उन्हें तो वस्तुतः मृत्यु भी नहीं मार पाती। ऐसे महान् योद्धा यदि प्रतिशोध की अग्नि पूर्णतः बुझ जाने के पूर्व ही रणभूमि में प्राण विसर्जित कर दें तो भी यमराज के अधीन नहीं हो पाते। यह भी देखा गया है कि ऐसे महान् वीर का शीश धड़ से पृथक् हो जाने पर उनका धड़ ही समर में लिप्त रहता है। और अनेक लोगों में यह भी धारणा व्याप्त है कि यदि ऐसे महावीर के धड़ के भी टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएं तब भी उस वीर का अदृश्य भूत ही रात्रि में शत्रुओं की छाती पर चढ़कर अपनी प्रतिशोधाग्नि को शांत करता है। इस धारणा के मूल में कोई-न-कोई तथ्य अवश्य ही है, ऐसा प्रतीत होता है। जब मौलवी अहमदा शाह समर भूमि में लड़ रहे थे, उस समय लॉर्ड केनिंग ने एक घोषणा प्रसारित कर संपूर्ण अवधवासियों पर यह व्यक्त किया था कि “जो स्वतः आत्मसमर्पण कर देगा उसे विद्रोही न समझते हुए उसके पूर्व के सभी अपराधों को दया सहित क्षमा कर दिया जाएगा और जो लोग आज हमारा साथ दे रहे हैं उनकी संपत्ति और जागीरें आदि भी वापस दे दी जाएंगी। अब अंग्रेजी सत्ता की निश्चित रूपेण विजय हो रही है, अतः अवध के जो लोग अभी भी ब्रिटिश सत्ता का विरोध करने पर डटे रहेंगे उन्हें उनके इस हठ के लिए कठोरतम दंड दिया जाएगा।‘‘ अंग्रेज यह समझते थे किइस घोषणा के उपरांत अवध के प्रायः सभी जमींदार शांत हो जाएंगे। परंतु इन्हीं दिनों यह समाचार भी मिला कि ‘पावेन के राजा ने 5 जून, 1857 को मौलवी अहमद शाह का सिर काट लिया है।’ मंद होती हुई अग्नि मौलवी की मृत्यु के समाचार से पुनः दहक उठी। अत्यधिक प्रयत्नों के उपरांत मिली असफलता से जो अवध थक गया था और जिसे क्षमा के प्रलोभन में फंसाया जा रहा था, वह अवध मौलवी के निधन पर शोक प्रदर्शन करने के स्थान पर ‘प्रतिशोध’, ‘प्रतिशोध’ की गर्जना करता हुआ पुनः रणभूमि में कूद पड़ा। मौलवी का शीश तो उनके क्रूर शत्रु ने काटकर निश्चित रूप से ही नगर के तोरण द्वार पर लटका दिया था, किंतु अब तो उसका धड़ ही रणभूमि में अंग्रेजों के होश उड़ा रहा था। मौलवी की हत्या के कारण संपूर्ण अवध पर ही मानो उनका भूत सवार हो गया था और अब अवध जय-पराजय, हानि-लाभ, आशा-निराशा और जीवन-मरण 1857 का स्वातंत्र्य समर – 393