१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंका मोह त्यागकर नवीन और प्रचंड उत्साह सहित शत्रु से संघर्ष हेतु रणभूमि में पुनः उतर पड़ा था। पावेन के चांडाल से प्रतिशोध लेने के लिए निजाम अली खां पीलीभीत जा पहुंचा । खानबहादुर खान ने चार हजार लोगों को लेकर चढ़ाई की तो फर्रुखाबाद के नेता के साथ पांच हजार लोग थे और तीन हजार लोगों सहित विलायतशाह तथा तीन हजार को साथ लेकर ही नाना साहब, अली खां मेवाती और उनके अनुगामियों ने संपूर्ण अवध में ही उथल-पुथल मचा दी। इनमें से प्रत्येक ही पावेन के राजा का रक्त पीने के लिए उतावला था। इतनी विशाल वाहिनी को चढ़कर आता हुआ देखकर इस देशद्रोही पापी का अंग-अंग कांप उठा। उसके संरक्षण के लिए अंग्रेजी सेना भी वहां तीव्र गति से एकत्रित होती जा रही थी। इस प्रदेश के आसपास शत्रुओं से क्रांतिकारियों का घमासान संघर्ष हो रहा था। घाघरा नदी के तट पर बेगम हजरत महल और हेमू खां डेरा डाले हुए थे। इधर राजा रामबख्श, बाहुनाथ सिंह, चांद सिंह, हनुमंत सिंह एवं अन्य बड़े-बड़े जमींदार अपनी संपूर्ण सेना लेकर अवध क स्वतंत्रता के लिए एक और प्रयास करने में लगे थे। इसी भांति शहजादा फिरोजाबाद, जो अभी तब धार में युद्ध कर रहा था, अवध आ पहुंचा था। अपने असाधारण धैर्य का परिचय देकर कोया के दुर्ग की रक्षा करनेवाले वीर पिता के वीर पुत्र नृपति सिंह अवध के संग्राम में भाग लेने के लिए आ पहुंचे थे। उसके पिता जुस्सा सिंह नाना साहब के परम मित्र थे और स्वतंत्रता के युद्ध में ही उन्होंने अपने प्राण विसर्जित किए थे। उन्होंने ही नाना साहब को अपने दुर्ग में आश्रय दिया था। इसी भांति देशप्रेम क पावन प्रेरणा लिये दृढ़ता और उत्साह से बढ़ता राजा वेणीमाधव भी अपने दुर्ग से निकलकर देश-रक्षा हेतु रण-कंकण बांधकर प्रचंड शौर्य का प्रदर्शन करता कानपुर होते हुए लखनऊ के लिए चल पड़ा। जिनकी विजयी होने की आशाएं धूमिल हो गई हों, किंतु जो जाति के सम्मान हेतु मरण का वरण करने चल पड़े हों, उनके साहस का पारावार पा भी कौन सकता है! केवल अपने क्षत्रिय धर्म का निर्वाह करने हेतु वीर वेणीमाधव ने अनुपम साहस का प्रदर्शन किया था। उन्हें तो विजय प्राप्ति की किंचित् मात्र भी आशा नहीं थी। किंतु विलंब से ही क्यों न हो, उसने लखनऊ पर धावा बोल दिया था। उसने लखनऊ नगर में यह विज्ञप्ति भी प्रसारित कर दी कि नगर में रहनेवाले सभी भारतीय नगर छोड़ दें, क्योंकि फिरंगियों पर मेरा प्रचंड प्रहार आरंभ होनेवाला है। विजय से उत्मत्त और पूर्ण अनुशासनबद्ध सेना से सुरक्षित अंग्रेज भी उसकी इस घोषणा, तत्परता और साहस से आश्चर्यचकित हो गए थे। इसमें आश्चर्य की कौन सी बात थी। मृतवत् और साहस से आश्चर्यचकित हो गए थे। इसमें आश्चर्य की कौन सी बात थी। तत्परता अवध एक निमिष मात्र के लिए क्यों न हो पुनः प्राणहान् सा होकर खड़ा हो गया था। लखनऊ पर इससे पूर्व क्रांतिकारियों का जितना प्रबल आक्रमण पहले कभी भी नहीं हो पाया था, वैसा अब होने वाला था। रक्त के सागर से ता अभी भी अवध के अंग सूख नहीं पाए थे, तभी 13 जून 1857 का स्वातंत्र्य समर -394