भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 390

1857 को होप ग्रांट लखनऊ के समीप नवाबगंज की ओर बढ़ चला, जहां लखनऊ प्रस्थान करने के लिए क्रांतिकारी वीर एकत्र हुए थे। उन्हें अपनी विजय की तो किंचित मात्र भी आशा नहीं थी। उनपर होप ग्रांट सहसा ही अपने गोरे और कोल सैनिकों सहित टूट पड़ा। अन्य कोई सेना होती तो ऐसे आक्रमण की स्थिति में उसका तितर-बितर हो जाना अपरिहार्य था। परंतु हे क्रांतिवीरों, ठहरो; अभी तो मौलवी का निधन हुए आठ दिन भी व्यतीत नहीं हा पाए हैं। अतः रुको! वे रुके और उन्होंने आक्रमण का प्रतिकार करना आरंभ कर दिया। उन्होंने प्रचंड, उत्कर्ष शौर्य का परिचय दिया उसे देखकर तो शत्रुओं के हृदय भी उनकी वीरता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। आंग्ल वीर होप ग्रांट ने भी उनकी वीरता के संबंध में लिखा-“इतने पर भी उनके आ क्रमण बड़े ही प्रचंड होते थे और उन्हें विफल बनाने के लिए हमें कठोर परिश्रम करना पड़ा। सुदृढ़ साहसी जमींदारों ने दो तोपों सहित हमारी सेना के पिछले भाग पर आक्रमण कर दिया। मैंने हिंदुस्थान में अनेक संग्राम देखे हैं और विजय अथवा मृत्यु का वरण करने के लिए कृतसंकल्प सुभट वीरों को भी देखा है, किंतु जिस असाधारण वीरता का प्रदर्शन इन जमींदारों ने किया वैसी वीरता शायद ही कहीं देखी हो। सर्वप्रथम उन्होंने हडसन के अश्वारोही दल पर आक्रमण किया और उसे तितर-बितर कर दिया और उसकी दो तोपें भी विचलित-सी हो गई। उस समय मैंने सातवीं हुजार पलटन के दस्तों को आगे बढ़ने का आदेश दिया, उनके चार तोपें भी थीं। ये तोपें विद्रोहियों पर केवल पांच सौ गज के अंतर से ही अग्नि-वर्षा कर रही थीं। विद्रोही हंसियां से काटे जानेवाले भुट्टों की तरह गिरते जा रहे थे। उनके प्रमुख ने, जो काफी मोटा था, निर्भय होकर दो पताकाएं अपनी तोपों के समक्ष गाड़ दी। वस्तुतः यह वहीं डटे रहने का संकेत था। किंतु हमारी तोपों से इतने प्रचंड प्रहार हो रहे थे कि जो भी उनके समीप आता, धराशायी हो जाता। हमारी सहायता के लिए अन्य दो दस्ते भी आ पहुंचे। अतः बचे हुए विद्रोहियों को हटना पड़ा। फिर भी वे हम पर तलवारें और भाले चमकाते हुए हमें चुनौती देते रहे। केवल उन दो तोपों के चारों ओर ही एक सौ पच्चीस शव पड़े हुए थे। तीन घंटे के संग्राम के उपरांत विजयश्री हमारे हाथ रही।‘’168 इस प्रकार की घमासान मुठभेड़ पूर्वी अवध, मध्य अवध, उत्तरी अवध अथवा संपूर्ण अवध में ही आरंभ हो गई थीं। अपनी पुरानी शमशीरों और तोड़ेदार बंदूकों से ही अवधवासी अंग्रेजी की प्रबल सत्ता को चुनौती दे रहे थे। अंग्रेजों के रचे हुए जाल को उनकी कृपाणें काट डालने में संलग्न हो उठी थीं। इन उग्र हठी रणवीरों के प्रबल पराक्रम का पूर्ण विवरण प्रस्तुत करना तो स्थानाभाव के कारण संभव नहीं है। किंतु इतना कहना ही उपयुक्त होगा कि अवधवासी रणांगण में भयंकर तांडव करने में संलग्न 1857 का स्वातंत्र्य समर – 395 168 होपग्रांट कृत-‘इंसीडेंट्स ऑफ द सेपॉय वार’, पृष्ठ 292 ।