भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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थे। वे केवल आंग्ल शत्रुओं को ही ठिकाने नहीं लगा रहे थे अपितु शत्रु द्वारा क्षमादान दिए जाने की भूलभुलैया में पड़े हुए राजा मान सिंह तथा पावेन नरेश के समान चांडाल देशद्रोहियों पर भी टूट पड़े थे। इस प्रकार अवध के देशभक्तों को दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ रही थी। उन्होंने पावेन पर धावा बोला, लखनऊ में संग्राम जारी रखा, सुलतानपुर में वे शत्रु के भिड़े, उन्होंने नीचे विश्वासघात मान सिंह को उसके दुर्ग में ही बंद कर दिया, अंग्रेजों के लिए प्रत्येक मार्ग में अवरोध उत्पन्न किया, उनकी चौकिया को लूट लिया। उन्होंने अवध के कण-कण को अपने रक्त का अभिषेक देकर पावन बना दिया। उसके चप्पे-चप्पे में आत्मयाग की पताकाएं गाड़ दीं। जहां कहीं भी अंग्रेज उन्हें घेर लेते थे, वे देशभक्त उसे तोड़कर इधर-उधर फैल जाते थे और युद्ध तथा प्रतिशोध का जयघोष जारी रखते थे। जून से अक्तूबर-पर्यंत और अक्तूबर से दिसंबर-पर्यंत अवध रण में जूझता रहा। दक्षिण से और उत्तर से नही अपितु सभी दिशाओं से नित नवीन अंग्रेजी सेनाएं उनपर आकर धावा बोलती थीं। इस प्रकार अनंत शत्रु सैन्य के साथ कृतनिश्चयी अक्तूबर-पर्यंत लोहा लेते रहे। वेणीमाधव के शंकरपुर को अंग्रेजी सेनाओं द्वारा तीन ओर से घेरा गया। शंकरपुर में सेना भी कम थी और रसद भी। वेणीमाधव ने इस स्थिति में भी शस्त्र समर्पित नहीं किए। तब अंग्रेजी सेना के प्रधान सेनापति ने उन्हें स्वतः यह संदेश भेजा कि "तुम्हारे पक्ष के विजयी होने का अब कोई लक्षण दिखाई नहीं देता। अतः तुम यदि युद्ध के हठ को छोड़कर शरण मांग लोगे तो तुम्हें पूर्णरूपेण क्षमा कर तुम्हारी संपत्ति वापस लौटा दी जाएगी।‘’ वेणीमाधव ने उसे उत्तर दिया, "अब मेरे लिए दुर्ग की रक्षा कर पाना संभव नहीं, अतः उसे तो मैं छोड़ रहा हूं; किंतु तुम्हारी शरण में कदापि नहीं आऊंगा, क्योंकि मेरी इस देह पर मेरा अधिकार नहीं है। यह तो मेरे प्रभु की है। किला तुम्हारे हाथ में आ जाएगा, किंतु वेणीमाधव नहीं, कारण? उसकी देह तो स्वराज्य की दास है।‘’169 1857 का स्वातंत्र्य समर - 396 169 चार्ल्स बाल कहता है-‘उपर्युक्त घोषणा के उपरांत भी अवध का संघर्ष विचित्र सा ही रहा। इन सभी विद्रोहियों को जनता की अपूर्व सहानुभूति प्राप्त थी तथा उन्हें आदमियों की कुमुक भी मिलती रहती थी। ये विद्रोही बिना रसद के ही रवाना हो जाते थे, क्योंकि प्रत्येक स्थान पर ही लोग इन्हें खिलाते-पिलाते थे। ये अपना सामान आदि भी बिना किसी प्रहरी के ही छोड़कर चल देते थे, क्योंकि लोग अपने आप ही उसकी रक्षा करते थे। इन विद्रोहियों को प्रति घंटे ही अंग्रेजों की दशा का पूर्णतः आकलन कर लेते थे। प्रत्येक भोजनालय में मेज के समीप खड़े रहनेवाले खानसामा भी विद्रोहियों से गुप्त रूप से सहानुभूति रखते थे। इस कारण हमारी कोई भी योजना गुप्त नहीं रह सकती थी। यों तो अंग्रेजों के शिविर में ही गुप्तचर खड़े होते थे, विद्रोहियों पर अचानक आक्रमण करना इसलिए संभव नहीं था। कोई कौतिक ही हो जाए तो अलग बात थी। क्योंकि एक मुख से दूसरे मुख तक पहुंचनेवाले समाचारों ने तो हमारे अश्वारोही भी मात कर दिए थे।'-खंड 2, पृष्ठ 572 ।