१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइस बीच सन् 1857 के नवंबर मास में ब्रिटेन की सम्राज्ञी ने अपनी सुप्रसिद्ध घोषणा की और यह भविष्यवाणी भी इस घोषणा के माध्यम से सत्य ही सिद्ध हो गई कि ठीक सौ वर्ष के पश्चात् कंपनी के राज्य का भारत से अंत हो जाएगा, क्योंकि अब हिंदुस्थान से कंपनी की राज्य सत्ता समाप्त हो गई थी और उसके स्थान पर ब्रिटिश सम्राज्ञी का राज्य आरंभ हो गया था। महारानी की घोषणा में यह भी स्पष्ट वचन दिया गया था कि जिस-जिसने भी अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह किया है, किंतु अपने शस्त्र समर्पित कर दिए हैं और ब्रिटेन की शरण में आ गए हैं, उन्हें सार्वजनिक रूप से क्षमादान दिया जाएगा और उनकी संपत्ति भी जब्त नहीं की जाएगी। इतना ही नहीं, अपितु उनके अपराधों की भी जांच-पड़ताल नहीं की जाएगी।170 इस घोषणा में ही राजा-महाराजाओं को दत्तक पुत्र लेने का अधिकार भी स्वीकार कर लिया गया। ब्रिटेन की महारानी की इसी घोषणा में ही यह अभिवचन भी दिया गया कि जनता के धार्मिक अधिकारों और रूढ़ियों में किंचित् मात्र भी हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा और उपर्युक्त सभी वचनों का पूर्णरूपेण पालन किया जाएगा। महारानी ने अपनी घोषणा में यह भी कहा-“ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यकाल में नागरिक तथा सैनिक पदों पर काम कर रहे वर्तमान कर्मचारियों को हम उन्हीं पदों तथा अधिकारों पर बनाए रखने का भी वचन देते हैं; किंतु भविष्य के नियम-कानूनों का निर्धारण हम स्वेच्छानुसार करेंगे और उन्हें इनका पालन करना होगा। “मैं यह भी घोषणा करती हूं कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने देशी राज्यों और संस्थानों से जो संधियां की हैं अथवा करार किए हैं, उनका अक्षरशः पालन किया जाएगा। दूसरे 1857 का स्वातंत्र्य समर – 397 170 महारानी के इन वचनों का पालन अंग्रेजों ने किस प्रकार किया, इसका परिचय भारतवासियों को भलीभांति मिला है। विभिन्न साहूकारों से जमानती देकर जो लाखों रुपए ऋण के रूप में लिये गए थे वे रुपए साहूकारों को विद्रोही बताकर देने से पूर्णतः इंकार कर दिया गया। इस संबंध में प्रस्तुत उदाहरण नितांत महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि सन् 1857 से संबंधित किसी भी इतिहास ग्रंथ में इसकी जानकारी नहीं मिल सकेगी। इतना ही नहीं, अपितु 'लंदन टाइम्स' से लिए श्री रसेल द्वारा प्रेषित संवाद पत्रों में भी इसका कहीं उल्लेख नहीं है। किंतु 'लंदन टाइम्स' के संपादक जॉन डीलन का आत्मचरित प्रकाशित हुआ है। उसमें 'लंदन टाइम्स' के संपादक को भारत स्थित संवाददाता श्री रसेल द्वारा लिखे गए व्यक्तिगत पत्र का भी समावेश है। इस पत्र में लिखा गया है-‘सन् 1849 के जनवरी मास के अंत में भी सर डब्ल्यू. एच. रसेल लॉर्ड क्लाइव के साथ था। लखनऊ से लिखे गए अपने अंतिम पत्रों में से एक में उसने एक रोचक कहानी बताई है, जो उसने प्रधान सेनापति से सुनी थी। इलाहाबाद के अपने मकान मालिक (एक एंग्लो-इंडियन जनरल मर्चेंट) के संबंध में लॉर्ड क्लाइव ने बताया कि तुम ठीक प्रकार जानते हो कि उसने क्या किया? 'नहीं', अच्छा, जब विद्रोह भड़क उठा तब देशी व्यापारियों का उसपर पर्याप्त ऋण था। वह अब स्पेशल कमिश्नर नियुक्त कर दिया गया था और उसने सर्वप्रथम जो कार्य किया वह यह था कि सभी साहूकारों को फांसी के तख्तों पर लटका दिया'।