१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपक्ष द्वारा भी उनका पालन होगा, ऐसी भी मुझे आशा है। इस समय जितने प्रदेश पर हमारा अधिकार है, उससे अधिक पर अधिकार करने की हमारी इच्छा नहीं है। जिस प्रकार हम अपनी प्रभुसत्ता के अधिकारों तथा मातहत प्रदेशों पर किसी प्रकार का और किसी का भी अतिक्रमण मौन रहकर सहन नहीं करेंगे, उसी प्रकार दूसरे के अधिकारों पर भी कोई आक्रमण करने की अनुमति नहीं देंगे। देशी नरेशों के अधिकार, सम्मान और पद की प्रतिष्ठा का विचार करते हुए हम उनके साथ नितांत आदरपूर्ण व्यवहार करेंगे। हमारी यह भी इच्छा है कि हमारी प्रजा के समान ही वे भी उन्नति करें और आंतरिक शांति, सुरक्षा और सुप्रबंध से प्राप्त होनेवाली सामाजिक प्रगति का भी उन्हें लाभ प्राप्त हो। “हमारी यह भी अभिलाषा है कि हमारे प्रजाजनों में जो भी अपनी शिक्षा, क्षमता एवं कर्त्तव्य के आधार पर योग्यता अर्जित कर ले, तो जाति, धर्म, पंथ किसी का भी विचार न करते हुए उसे निस्संकोच और निष्पक्ष भाव सहित हमारी सेवा में किसी का भी विचार न करते हुए उसे निस्संकोच और निष्पक्ष भाव सहित हमारी सेवा में किसी पद पर भरती किया जाए। “जिन लोगों ने ब्रिटिश प्रजाजनों की हत्या करने में सक्रिय योग दिया हो और जिनके विरूद्ध अभियोग प्रमाणित हो चुका हो, उन अपराधियों के अतिरिक्त अन्य सभी को हम क्षमा देने की भी घोषणा करते हैं। “जो अन्य व्यक्ति अभी तक भी सशस्त्र होकर हमारे विरूद्ध युद्ध कर रहे हैं वे भी यदि अपने ग्रामों को वापस चले जाएंगे, अपने पहले के कामों में लग जाएंगे तो उन्होंने हमारे तथा हमारे शासन के विरूद्ध जो भी अपराध किए हैं, हम उन्हें नितांत कृपा सहित भूल जाने को तत्पर हैं। इस प्रकार महारानी का घोषणापत्र अथवा भारत का भाग्यलेख प्रकाशित किया गया। निस्संदेह, इसका एकमात्र उद्देश्य अवध की क्रांति-ज्वाला पर पानी डालना ही था। किंतु अवध के क्रांतिदूतों को यह घोषणा तनिक भी आकर्षित न कर सकी। महारानी की घोषणा के सर्वथा विपरीत अवध की बेगम ने घोषणा कर दी-“इंग्लैंड की रानी के घोषणापत्र में यह बताया गया है कि देशी नरेशों से कंपनी ने जो संधियां अथवा प्रस्ताव प्रस्तुत किए हैं वह उन सभी का पालन करेंगी। किंतु भारतीय जनता को इस कपटपूर्ण चाल को भलीभांति समझ लेना चाहिए। कंपनी तो संपूर्ण की रानी ने कौन सी नई बात कही है? भरतपुर नरेश को कंपनी ने वचन दिया था कि उसे पुत्रवत् माना जाएगा और दूसरी ओर उसके संपूर्ण राज्य पर भी हाथ साफ कर दिया। लाहौर के अधिपति (दिलीप सिंह) को लंदन में बंदी बनाकर रख दिया गया है। उन्हें भारत नहीं लाया जाता। नवाब शम्सुद्दीन को इन्हीं अंग्रेजों ने एक हाथ से फांसी पर लटकाया और दूसरे हाथ से उसे 1857 का स्वातंत्र्य समर - 398