भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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सलाम करते हुए भी उन्हें तनिक भी लज्जा न आई। सतारा के छत्रपति को, पूना के पेशवा को बंदी बनाया और मृत्युपर्यंत बिठुर में उससे पेंशन चढ़वाते रहे। काशी नरेश को इन्होंने आगरा में बंदी बनाकर रखा। इन्होंने ही बिहार, उत्कल और बंगभूमि के राजाओं को और जागीरदारों को समूल नष्ट कर दिया। इन्होंने अवशिष्ट वेतन का वितरण करने के नाम पर अवध का संपूर्ण पैतृक धन भी हड़प लिया। हां, इतनी कृपा अवश्य ही की कि संधि के 7वें परिच्छेद में इस प्रतिज्ञा का अवश्य ही उल्लेख कर दिया कि भविष्य में और कोई वसूली नहीं की जाएगी। ऐसी स्थिति में जो कुछ कंपनी ने किया है, यदि उसी को स्वीकृत करने की बात इंग्लैंड की रानी करती हो तो पहले की और आज की स्थिति में अंतर ही क्या है? यह सब तो पुरानी ही बातें हैं। किंतु हाल ही में लिखी गई संधि की शर्तों की पूर्णतः उपेक्षा करके और हमारा लाखों रूपए का ऋण उसकी ओर होते हुए भी कंपनी को जब कोई अन्य बहाना हाथ न आया तो 'शासकों के प्रति प्रजा में असंतोष' का कृत्रिम उपालंभ गढ़कर हमारे विपुल धन और करोड़ों रूपए के प्रदेश को हड़प लिया। यदि हमारी प्रजा इससे पूर्व नवाब वाजिद अली शाह के शासनकाल में ही सुखी नहीं थी तो अब हमारे प्रशासन काल में उसे संतुष्ट हो जाने का कारण क्या है? आज हमारी प्रजा हमारे प्रति जितनी श्रद्धा और प्रेम तथा राजनिष्ठा का प्रदर्शन कर रही है उतनी तो शायद ही किसी राजा की प्रजा ने प्रदर्शित की होगी। ऐसी स्थिति में हमारा प्रदेश हमें क्यों नहीं लौटाया जा रहा है? इंग्लैंड की रानी ने यह भी कहा है कि और अधिक प्रदेशों पर विजय प्राप्त कर उन्हें अपने शासन में मिलाने की उनकी कोई इच्छा नहीं है। किंतु इस कथन के बावजूद राज्यों पर दखल करने का कार्य पूर्ववत् चल ही रहा है। किंतु इस कथन के बावजूद राज्यों पर दखल करने का कार्य पूर्ववत् चल ही रहा है। यदि अब उसने संपूर्ण शासन-व्यवस्था अपने हाथों में ले ली है तो फिर हमारे प्रजाजनों द्वारा स्पष्टतः अपनी इच्छा की अभिव्यक्ति कर देने के पश्चात् भी हमारा राज्य हमें वापस क्यों नहीं दिया जा रहा है? “किसी भी राजा अथवा रानी ने आज तक विद्रोह के अपराध में संपूर्ण सेना अथवा संपूर्ण जनता को दंडित नहीं किया, यह सत्य जगद्विख्यात है। सभी को क्षमा किया जाएगा, क्योंकि संपूर्ण सेना अथवा समग्र हिंदुस्थान को दंडित किया जाना कोई भी विचारवान् व्यक्ति कदापि पसंद न करेगा। उन्हें यह भी भलीभांति विदित है कि जब तक दंड का भय विद्यमान रहता है तब तक विद्रोह की ज्वाला भी शांत नहीं हो पाती। “मरता क्या न करता', यह कहावत भी सुप्रसिद्ध ही है। “रानी की घोषणा में कहा गया है कि जिन्होंने विद्रोहियों को आश्रय दिया अथवा विद्रोह को प्रोत्साहित दिया है, उनका पता लगाकर भी उन्हें प्राणदंड नहीं दिया जाएगा, अपितु नाम मात्र का दंड ही दिया जाएगा। किंतु जिन्होंने स्वयं हत्या की है अथवा हत्या करने में सहायता की है, उनके साथ किसी प्रकार को भी दया प्रदर्शित नहीं 1857 का स्वातंत्र्य समर - 399