भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 418 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 395

की जाएगी; किंतु अन्य सभी को क्षमा प्रदान कर दी जाएगी। इस घोषणा को पढ़कर तो कोई मूर्ख भी यह समझ सकता है कि चाहे कोई अपराधी हो अथवा न हो, कोई भी दंडित हुए बिना नहीं रहेगा। इस घोषणा में तो सभी कुछ लिखकर भी कुछ नहीं लिखा गया। किंतु एक तथ्य तो स्पष्टतः उल्लिखित ही है कि जिस किसी का भी क्रांति से संबंध रहा है, ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं छोड़ा जाएगा। यह भी स्पष्ट है कि जिस नगर अथवा अंचल में हमारे सैनिक रूके हैं उस ग्राम के सभी ग्रामीणों को क्षमा नहीं किया जा सकता। शत्रुता से परिपूर्ण रानी की इस घोषणा को पढ़कर मेरे मन में यह चिंता उत्पन्न हो गई है कि हमारी प्रिय प्रजा के साथ क्या व्यवहार किया जाएगा। उस व्यवहार की तो कल्पना मात्र से ही मेरा हृदय भर आता है। अतः मैं स्पष्ट शब्दों में विश्वास दिलाती हूं कि जो ग्राम-प्रमुख अपनी अनभिज्ञता के वशीभूत अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण कर चुके हैं, वे 1 जनवरी, 1857 से पूर्व ही हमारे शिविर में उपस्थित हो जाएं। इस बात में कोई भी संशय नहीं है कि मैं उन्हें क्षमा प्रदान कर दूंगी। हिंदुस्थान के राज्यकर्ता दयालु और उदार रहे हैं, इस अनुभव को ध्यान में रखते हुए हमारी घोषणा पर विश्वास करो। सहस्रों लोगों ने यह अनुभव ग्रहण किया है, लाखों लोगों ने भारतीय शासकों की यह कीर्ति सुनी है; किंतु अंग्रेजों ने कभी एक भी अपराधी को क्षमा किया है, यह किसी ने नहीं सुना होगा।

“इंग्लैंड की रानी की घोषणा में यह भी कहा गया है कि शांति की प्रस्थापना के उपरांत लोगों की स्थिति सुधारने की दृष्टि से राजमार्ग बनेंगे और नवीन नहरों का निर्माण आदि जनहित के कार्य किए जाएंगे। उनके इस आश्वासन से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि वे हिंदुस्थान की जनता को मार्गों के बनाने और नहरे तथा कुएं आदि खोदने से अधिक अन्य कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं सौंप सकते।

“इसका अर्थ यदि जनता ने ध्यानपूर्वक समझने की चेष्टा न की तो फिर आशा की कोई भी संभावना नहीं रह जाएगी।

“मैं यही चाहती हूं कि इस घोषणापत्र के भुलावे में किसी को भी नहीं फंसना चाहिए।”

एतदर्थ अब अवध ने बिना शर्त दिए जानेवाले इस क्षमादान को ग्रहण करना अस्वीकार कर दिया। वह अब भी हाथों में तलवार संभाले हुए था, अश्वारूढ़ था। उसके एक-एक खेत में लड़ाई चल रहा थी, रक्त-स्नान हो रहा था और अवध स्वातंत्र्य यज्ञ की ज्वाला में खुलकर भाग ले रहा है। स्वतंत्रता की प्राप्ति अथवा अंतिम समय तक संग्राम, यही उसकी टेक थी। शत्रु के पैरों में पड़ने के स्थान पर शत्रु का गला घोट देना ही उसने अपनी प्रवृत्ति बना ली थी। इस प्रकार सन् 1859 का अप्रैल मास आ जाने पर भी अवध का संग्राम जारी था। शंकरपुर, डुंडिया खेड़ा, रायबरेली, सीतापुर आदि अनेक

1857 का स्वातंत्र्य समर – 400

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर) · पृष्ठ 395, कुल 418 में से · BharatKosha