१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्थान इस समय भी रणस्थली बने हुए थे। किंतु इन स्थानों पर हुई पराजय के उपरांत इन क्रांतिवीरों को नेपाल की सीमा तक हटने पर विवश होना पड़ा। अंग्रेजों ने भी अपनी विभिन्न सेनाओं द्वारा इनका पीछा करना जारी रखा। अतः क्रांतिकारियों को अब नेपाल में ही प्रविष्ट होना पड़ा और साथ ही उनमें यह नवीन आशा भी उत्पन्न हुई कि नेपाल का हिंदू राजा उन्हें संरक्षण प्रदान करेगा। इस समय नेपाल में प्रविष्ट होनेवाले क्रांतिकारियों की संख्या साठ हजार थी। बेगम, उसका पुत्र और तरूण नवाब, नाना साहब तथा बाला साहब ही इनके नेता थे। उन्हें नेपाल के जंगबहादुर का पुत्र मिला था, जिसके उत्तर में नाना साहब और बेगम ने उसे दो पत्र लिखे थे। इनमें से भी नाना साहब का पत्र सुस्पष्ट, मुंहतोड़ तथा मार्मिक था। उसका एक अंश यहां देना उपयुक्त रहेगा। उन्होंने लिखा था- "आपका पत्र प्राप्त हुआ। आपकी उदारता की ख्याति हम अब तक दूर से ही सुन रहे थे। हमने भारत के अनेक प्राचीन राजाओं का इतिहास पढ़ा है तथा नरेशों के भी गुण-दोषों से हम परिचित हैं। तब भी हम यह बात निश्चय के साथ कह सकते हैं कि आपकी समानता किया है उनमें से कोई भी नहीं कर सकता; क्योंकि जिन अंग्रेजों ने आपकी प्रजा से भी दुर्व्यवहार नहीं दिखाया। उनके आग्रह मात्र पर ही आप तत्काल उनकी सहायता के लिए दौड़ पड़े, आपकी निस्सीम उदारता सब पर स्पष्ट हो गई। आज जैसे उदारमना व्यक्ति ने जब प्रत्येक दृष्टि से अपने विरोधी शत्रु की भी सहायता की तो मैं भी आपसे आशा करता हूं कि आपके प्रजाजनों से पेशवाओं के जो वंशज सदैव ही मैत्री और उदारतापूर्ण व्यवहार अपेक्षा अस्वाभाविक है? और विशेषतः उस स्थिति में जबकि आपने कट्टर शत्रु अंग्रेजों-की मुक्त हस्त से सहायता की हैः जिसने अपने शत्रु को अपने घर में सादर नहीं सुना है कि अनेकानेक अन्यायों, दिए गए वचनों के स्पष्टतः उल्लंघन और अनेक संधियों के भंग किए जाने से हिंदुस्थान अंग्रेजों द्वारा किस प्रकार सताया जा रहा है। इसका विवरण यहां प्रस्तुत किया जाना आवश्यक नहीं है। स्वराज्य के अतिरिक्त अंग्रेज हिंदुस्थान के लोगों के धर्म को नष्ट करने के लिए किस प्रकार प्रवृत्त हैं, यह भी जगद्विख्यात है। इन्हीं कारणों से यह क्रांतियुद्ध आरंभ हुआ है। मैं अपने भाई बाबा साहब पेशवा को आपके पास भेज रहा हूं, जिससे कि वे आपसे मिलकर अन्य बातों को विस्तृत रूप से आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे।"171 इस पत्र पर पेशवा की राजमुद्रा भी अंकित की गई। पत्र के पहुंचने के उपरांत 1857 का स्वातंत्र्य समर – 401 171 चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 2 ।