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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

स्थान इस समय भी रणस्थली बने हुए थे। किंतु इन स्थानों पर हुई पराजय के उपरांत इन क्रांतिवीरों को नेपाल की सीमा तक हटने पर विवश होना पड़ा। अंग्रेजों ने भी अपनी विभिन्न सेनाओं द्वारा इनका पीछा करना जारी रखा। अतः क्रांतिकारियों को अब नेपाल में ही प्रविष्ट होना पड़ा और साथ ही उनमें यह नवीन आशा भी उत्पन्न हुई कि नेपाल का हिंदू राजा उन्हें संरक्षण प्रदान करेगा। इस समय नेपाल में प्रविष्ट होनेवाले क्रांतिकारियों की संख्या साठ हजार थी। बेगम, उसका पुत्र और तरूण नवाब, नाना साहब तथा बाला साहब ही इनके नेता थे। उन्हें नेपाल के जंगबहादुर का पुत्र मिला था, जिसके उत्तर में नाना साहब और बेगम ने उसे दो पत्र लिखे थे। इनमें से भी नाना साहब का पत्र सुस्पष्ट, मुंहतोड़ तथा मार्मिक था। उसका एक अंश यहां देना उपयुक्त रहेगा। उन्होंने लिखा था- "आपका पत्र प्राप्त हुआ। आपकी उदारता की ख्याति हम अब तक दूर से ही सुन रहे थे। हमने भारत के अनेक प्राचीन राजाओं का इतिहास पढ़ा है तथा नरेशों के भी गुण-दोषों से हम परिचित हैं। तब भी हम यह बात निश्चय के साथ कह सकते हैं कि आपकी समानता किया है उनमें से कोई भी नहीं कर सकता; क्योंकि जिन अंग्रेजों ने आपकी प्रजा से भी दुर्व्यवहार नहीं दिखाया। उनके आग्रह मात्र पर ही आप तत्काल उनकी सहायता के लिए दौड़ पड़े, आपकी निस्सीम उदारता सब पर स्पष्ट हो गई। आज जैसे उदारमना व्यक्ति ने जब प्रत्येक दृष्टि से अपने विरोधी शत्रु की भी सहायता की तो मैं भी आपसे आशा करता हूं कि आपके प्रजाजनों से पेशवाओं के जो वंशज सदैव ही मैत्री और उदारतापूर्ण व्यवहार अपेक्षा अस्वाभाविक है? और विशेषतः उस स्थिति में जबकि आपने कट्टर शत्रु अंग्रेजों-की मुक्त हस्त से सहायता की हैः जिसने अपने शत्रु को अपने घर में सादर नहीं सुना है कि अनेकानेक अन्यायों, दिए गए वचनों के स्पष्टतः उल्लंघन और अनेक संधियों के भंग किए जाने से हिंदुस्थान अंग्रेजों द्वारा किस प्रकार सताया जा रहा है। इसका विवरण यहां प्रस्तुत किया जाना आवश्यक नहीं है। स्वराज्य के अतिरिक्त अंग्रेज हिंदुस्थान के लोगों के धर्म को नष्ट करने के लिए किस प्रकार प्रवृत्त हैं, यह भी जगद्विख्यात है। इन्हीं कारणों से यह क्रांतियुद्ध आरंभ हुआ है। मैं अपने भाई बाबा साहब पेशवा को आपके पास भेज रहा हूं, जिससे कि वे आपसे मिलकर अन्य बातों को विस्तृत रूप से आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे।"171 इस पत्र पर पेशवा की राजमुद्रा भी अंकित की गई। पत्र के पहुंचने के उपरांत 1857 का स्वातंत्र्य समर – 401 171 चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 2 ।

पर्याप्त विचार-विमर्श भी हुआ। विद्रोहियों से भेंट करने के लिए जब जंगबहादुर ने अपने एक सरदार कर्नल बलभद्र को भेजा तो उसे भी विद्रोहियों की सेना के प्रमुखों ने स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया कि "हम हिंदू धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। महाराज जंगबहादुर (नेपाल-नरेश) भी हिंदू ही हैं, अतः उन्हें हमारी सहायता अवश्य करनी चाहिए" तब उस सरदार ने उनसे प्रश्न किया कि "आपके कार्य करने का उद्देश्य क्या है?" इसके उत्तर में विद्रोही पक्ष के उस प्रतिनिधि ने उसे उत्तर दिया, "हमारे पास अभी भी साठ हजार लड़ाकू जवान हैं। जंगबहादुर ने अंग्रेजों को सहायता दी है; किंतु यदि वे हमें पचास लड़ाकू हजार गुरखा सैनिक दे दें तो मैं उन्हें अंग्रेजों की अपेक्षा दुगुना वेतन दे सकता हूं। यदि वे ऐसा न कर सकते हों तो हमें केवल अपने सुयोग्य सेनापति ही दे दें। मैं पुनः हिंदुस्थान में जाकर अंग्रेजों को कलकत्ता तक भगा सकता हूं और हम जो भी प्रदेश जीतेंगे, उसपर नेपाल राज्य का आधिपत्य होगा, और यदि हो सके तो उसके पश्चात् महाराज हमें अपने राज्य में आश्रय दे दें। हम उनके आज्ञाकारी बनकर वहां रहेंगे।" ये बातें सुनकर सरदार बलभद्र बोला, "किंतु ब्रिटिश सरकार तो कृपा-दृष्टि कर रही है, आप लोग उसके समक्ष आत्मसमर्पण क्यों नहीं कर देते?" इस पर क्रांतिकारी नेताओं ने उसे उत्तर दिया, "हमें अंग्रेजों की वह घोषणा सुन ली है। किंतु दूसरों को मृत्यु के मुख में धकेलकर हम अपनी जीवन-रक्षा करना नहीं चाहते। हम ब्रिटेन के समक्ष आत्मसमर्पण कदापि नहीं करेंगे।" इस प्रकार की अनेक वार्त्ताओं के उपरांत जंगबहादुर ने विद्रोहियों को स्पष्ट उत्तर दिया कि "यदि मुझे तुम्हारी सहायता ही करनी होती तो मैं लखनऊ में तुम लोगों की हत्या कराने हेतु अपनी सेनाएं ही क्यों भेजता?" इतना अधिक नीचतापूर्ण उत्तर देकर ही उसने बस नहीं की अपितु उसने अंग्रेजों को नेपाल में प्रवेश कर क्रांतिकारियों का शिकार करने की पूरी-पूरी छूट भी दे दी। अब सभी आरे से सर्वथा निराश होकर क्रांतिकारी सिपाही अपने-अपने शस्त्रास्त्र छिपाकर अपने घरों को जाने लगे। अब उन्हें उभारने में लाभ न होता देखकर अंग्रेजों ने भी उन्हें छेड़ने का प्रयास नहीं किया। जो क्रांतिकारी अपने घरों को न लौटे वे वन में ही उपवास कर आत्मार्पण करने लगे। इन्हीं दिनों नाना साहब ने प्रमुख ब्रिटिश सेनापति होप ग्रांट को भी एक पत्र लिखा था। अपने इस पत्र में उन्होंने ब्रिटिश कूटनीति की घोर भर्त्सना की तथा विस्तृत आलोचना करने के पश्चात् लिखा था-"What right have to occupy India and declare me an outlaw" (हिंदुस्थान पर राज्य करने का अधिकार तुम्हें किसने दिया है? तुम विदेशी हमारे राजा हो तो क्या मैं चोर हूं?) इतिहास ने नाना साहब के नाम पर ये ही अंतिम शब्द संगृहीत रखे हैं। ये शब्द क्या हैं, वस्तुतः बालाजी विश्वनाथ पेशवा के सिंहासन का अंतिम उच्छ्वास है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 402

शिवाजी के अंतिम उत्तराधिकारी के योग्य, सुदृढ़, न्यायपूर्ण, आत्मभिमान और शान की शोभ बढ़ानेवाले ही ये शब्द हैं। बाजीराव द्वितीय की नपुंसकता के कलंक को रक्त ही शत्-शत् धाराओ से नहलाकर निष्कलंक कर दिया गया था और पेशवा का वह विशुद्ध राजसिंह चित्तौड़ की राजपूतानियों के समान लड़ते, झगड़ते, जलते तथा देदीप्यमान अग्नि ज्वालामालाओं को विस्फारित करते हुए विश्व के रंगमंच से विलुप्त हो गया। उनकी अंतिम आह इन्हीं शब्दों से निकली थी-‘'परकीय हिंदुस्थान के राजा और हम हिंदू-भूमि के ही पुत्र हिंदुस्थान में चोर बना दिए गए हैं।'' इस पत्र के लिखने के पश्चात् नाना साहब का क्या हुआ, इस संबंध में इतिहास मौन है। स्वेच्छा सहित अंगीकृत दरिद्रता में ही बाला साहब का इन्हीं दिनों वनों में ही स्वर्गवास हो गया। तदुपरांत अवध की बेगम और तरूण राजकुमार को नेपाल में अनुमति प्रदान कर दी गई। महान् हुतात्मा गजराज सिंह नामक एक अन्य क्रांतिकारी नेता भी बाद में हुए एक संघर्ष में देवलोकगामी हुआ। इस प्रकार अवध में क्रांतियुद्ध की इतिश्री हो गई। अपनी स्वतंत्रता हेतु अवध ने कितनी वीरता सहित संघर्ष किया था, इसका विवरण शत्रु द्वारा प्रस्तुत किए गए विवरण से ही पढ़ना उचित होगा। स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए इतने महान् हठ और पराक्रम सहित क्या विश्व के किसी अन्य देश ने संघर्ष किया होगा? मैलसन ने लिखा है-‘'सिपाहियों ने स्वतंत्रता के लिए जिस क्रांतियुद्ध का श्रीगणेश किया था उसमें अवध की प्रजा ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था। वे स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए जूझ पड़े। वे कितनी वीरता सहित संग्राम कर रहे थे, इसका विवरण हम प्रस्तुत कर चुके हैं। किंतु कितने दीर्घकाल तक अवध की जनता संग्राम करती रही उतनी वीरता से हिंदुस्थान के अन्य किसी भी अंचल में संग्राम नहीं हुआ था। सन् 1856 के मध्य से ही उनपर जो अत्याचार और अन्याय हुए थे, इससे उनका अंतःकरण इस्पात के समान कठोर हो गया था और उन्होंने सुदृढ़ संकल्प भी ग्रहण कर लिया था। सदा-कदा उन्हें मारकर पलायन भी करना पड़ जाता था। इस आशा से ही वे ऐसा करते थे कि किसी अन्य मारकर पलायन भी करना पड़ जाता था। इस आशा से ही वे ऐसा करते थे कि किसी अन्य दिवस वे विजय के लिए संघर्ष करेंगे। अंततः लॉर्ड क्लाइव ने अवध पर एक प्रचंड बवंडर के समान अंतिम आक्रमण किया। शेष बचे सैनिकों को नेपाल के वनों में आश्रय ढूंढ़ने पर विवश होना पड़ा। वहां भी जो वीर बचे रह गए थे, उन्होंने आत्मसमर्पण करने के स्थान पर उपवास करते हुए आत्मार्पण करना वरेण्य माना। दीर्घकाल तक चले इस संघर्ष में जब उन्हें विजय की कोई आशा नहीं रही तो अवध के श्रमिकों, कृषको, तालुकेदारों, भूमिधरों और व्यापारियों ने पराजय स्वीकार कर ली।‘’172 1857 का स्वातंत्र्य समर - 403 172 मैलसन कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 5, पृष्ठ 207 ।

प्रकरण-2 पूर्णाहूति दिनांक 20 जून को ग्वालियर की रणभूमि में हुए घनघोर संग्राम में रणलक्ष्मी लक्ष्मीबाई की पराजय हो गई थी। इस कारण अंग्रेजों को अपने एक दृढ़ निश्चयी शत्रु से मुक्ति मिल गई थी। किंतु अभी रानी से भी अधिक एक दृढ़ निश्चयी शत्रु, जो रण-कौशल में लक्ष्मीबाई की अपेक्षा अधिक सिद्धहस्त था, रणभूमि से पलायन कर अंग्रेजों को झांसा दे गया था। ग्वालियर की रणभूमि में वह 20 मई को ओझल हुआ था तो जावरा और अलीपुर की रणभूमि से भी बच निकलने में सफल हो गया। यत्र-तत्र तात्या टोपे कुद ही दिनों में मध्य हिंदुस्थान के सभी वन, गुफाएं, ग्राम, नगर, पर्वत सभी से प्रचंड रण-गर्जनाएं होने लगीं और यत्र-तत्र 'तात्या टोपे! तात्या टोपे' का ही स्वर गूंज उठा। इसका कारण यह था कि शिकारी के भालों से घिरा हुआ यह मराठा सिंह अब विवश होकर मध्य भारत के जंगलों में घुस गया था। ग्वालियर की रणभूमि में रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान हो जाने के कारण मानो उसका दाहिना हाथ ही कट गया था। अनेक पराजयों के फलस्वरूप क्रांति दब-सी गई थी। श्रीमंत नाना साहब से तो सदा के लिए ही बिछुड़ चुका था। कुछ भारतीयों के ही विश्वासघात के कारण अब अंग्रेजी सत्ता अपने अजेय होने का दंभ भर रही थी। इधर तात्या के पास न तो उत्तम सेना थी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 404

और न ही तोपें तथा धन ही। उसके पास तो रसद का भी अभाव था। इसे तो इन साधनों के कहीं से उपलब्ध होने की भी आशा नहीं थी, किंतु इस सारी स्थिति में ही अंकुंठित धैर्य रखनेवाला तात्या टोपे, संपूर्ण आपदाओं और विपरीत परिस्थितियों में भी झुका नहीं और नह ही उसने स्वतंत्रता के प्रतीक भगवा ध्वज को ही झुकने दिया। शत्रु के समक्ष अपनी मत्ताका झुकाना-नहीं, यह महापाप कदापि नहीं होगा; क्योंकि भगवा ध्वज का दंड ही ऐसे वृक्ष से निर्मित हुआ है कि उसे कभी शत्रु तोड़ तो सकता है, किंतु वह शत्रुओं के आगे झुक कदापि नहीं सकता। ग्वालियर और जावरा तथा अलीपुर में मिली पराजयों के पश्चात् अपनी बची खुची सेनाओं को लेकर तात्या और राव साहब पेशवा सरमथुरा नामक ग्राम में चले गए। यहीं उन्होंने अपनी संपूर्ण युद्ध योजना के तीन महत्त्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए। प्रथम यह कि अब किसी भी स्थान पर प्रत्यक्ष युद्ध नहीं लड़ा जाएगा। दूसरा सिद्धांत यह निर्धारित किया कि चाहे कोई भी स्थिति क्यों न हो, प्रत्यक्ष युद्ध न करते हुए छापामार युद्ध का अनुगमन कर अंग्रेजी सेना को छकाया जाएगा। परंतु इन दोनों निर्धारित सिद्धांतों को कार्यान्वित करने के लिए भी तो रसद और शस्त्रों की प्राप्ति अनिवार्य थी। इस समस्या का निदान करने हेतु तात्या ने तीसरा सिद्धांत यह निर्धारित किया कि मार्ग में जो भी देशी रियासतें मिलेंगी उनसे उनकी इच्छा से अथवा कठोरता सहित शस्त्रास्त्र और धन प्राप्त किया जाएगा। उत्तर और मध्य भारत में तो पग-पग पर देशी रियासतें विद्यमान थीं। प्रत्येक राज्य में ही वर्ष भर के लिए सैनिकों के लिए रसद तथा आवश्यक शस्त्रास्त्र जमा रहते थे। उस रसद और उन शस्त्रास्त्रों को प्रदेश की रक्षा में लगाना ही तो इन नरेशों का प्राथमिक कर्तव्य था। परंतु सन् 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम में इस भूमि और उसमें निवास करनेवाली अपनी प्रजा की इच्छा एवं दृढ़ आशा को फलीभूत करने के स्थान पर इन नरेशों ने अपने व्यक्तिगत लाभ को ही महत्त्व दिया था। इसी कारण ये क्रांतिकारियों के साथ खुला सहयोग नहीं कर सके थे। अतः उनके पास इस समय भी रसद और शस्त्रास्त्र निरूपयोगी होकर पड़े हुए थे। वे अपने राज्यों में उत्पन्न हुए अन्न को भी दबाकर बैठे थे। वे व्यर्थ ही संग्रह किए हुए थे और दूसरी ओर देशभक्त और स्वतः देशमाता भी दरिद्रता में जीवनयापन कर रही थी। ऐसी स्थिति में इन विश्वासघाती जमाखोरों को उत्तम योजना बनाई। अपनी इस योजना के द्वारा उन्होंने स्वातंत्र्य सैनिकों के भोजन के लिए खाद्य सामग्री और युद्ध का कोई दबाव न पड़ेगा, अपितु इन नरेशों से युद्ध-कर की वसूली की जाएगी। इन नरेशों के पास तो नाममात्र के लिए ही सेना थी, अतः उनपर यह 'युद्ध-कर' लादना भी कोई कठिन कार्य सिद्ध न होगा। साथ ही इन देशी राज्यों के पास-पास स्थित होने के कारण खाद्य सामग्री को एक स्थान से ढोकर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 405

दूसरे स्थान पर ले जाने की कठिनाई भी नहीं उठानी पड़ेगी। इन दोनों सेनानियों ने निश्चय कर लिया था कि यदि उनके आह्वान मात्र से ये देशी नरेश उनकी योजना को स्वीकार कर लें तो अच्छा है, अन्यथा उन्हें ऐसा करने के लिए विवश किया जाएगा। इन्हीं तीन सिद्धांतों के आधार पर तात्या ने अपने नितांत विस्मयकारक रण-तांडव की संपूर्ण रचना की थी। किंतु अंग्रेजों की यह सहज कल्पना थी कि ऐसी विपन्न अवस्था में किसी भी मनुष्य का बहुत दिनों तक प्रयत्न करते रहना असंभव है। यही समझकर उन्होंने यह धारणा भी बना ली कि अलीपुर में उनका दबाव पड़ने के कारण तात्या के पलायन करते ही वहां से विद्रोह समाप्त हो गया है। इसके साथ ही उन्होंने तात्या को चारों ओर से घेरकर एक-डेढ़ मास में ही आत्मसमर्पण कर देने का विवश बनाने के लिए अपनी सेनाएं भी भेज दीं। ग्वालियर, झांसी, शिवपुरी और गुना-सभी ओर ब्रिटिश सेना छा गई थी, तो राजस्थान में भी रॉबर्ट ने अपनी सेना डटा दी थी। इस प्रकार अंग्रेजों की सेनाओं ने चारों ओर से ही अपनी व्यूह में तात्या को घेर लिया था और अब देखना यह था कि तात्या इस व्यूह से किस प्रकार निकलता है! तात्या की प्रथम दृष्टि भरतपुर पर केंद्रित हुई थी। किंतु वहां अंग्रेजी सेना के पहुंच जाने का समाचार प्राप्त होते ही उसने जयपुर की दिशा में अपने पग बढ़ा दिए। जयपुर के राजदरबार में तात्या से सहानुभूति रखनेवाले अनेक व्यक्ति तो थे ही, साथ ही वहां की सेना और जनता का झुकाव भी तात्या क ओर था। अतः तात्या ने वहां अपना दूत भेजकर अपने शुभचिंतकों को सावधान और सन्नद्ध रहने का निर्देश दिया। किंतु यह सूचना अंग्रेजी सेना के हाथ भी लग गई, अतः उसने तत्काल ही नसीराबाद से जयपुर की ओर प्रस्थान कर दिया। जयपुर की यह स्थिति देखकर तात्या ने दक्षिण दिशा में प्रस्थान कर दिया। उसके पीछे कर्नल होम्स भी अपनी सेना सहित लगा ही हुआ था। यहां तात्या टोपे ने अपने प्रचंड बुद्धि-कौशल का परिचय देते हुए इस सेना को झांसा दिया और टौंक राज्य पर धावा बोल दिया। वा'के नवाब ने नगर के द्वार पर बंद करा दिए और तात्या का प्रतिरोध करने के लिए अपने कुछ सैनिकों को चार तोपों सहित नगर के बाहर भेज दिया। भयंकर संग्राम हो सकता था, किंतु टौंक के इन सैनिकों ने नितांत ही मैत्रीपूर्ण ढंग से तात्या के सैनिकों का अभिनंदन किया। उन्होंने अपनी चारों तोपें भी तात्या को समर्पित कर दीं। इस प्रकार इस नवीन सेना और नवीन तोपों को प्राप्त कर तात्या ने निश्चिंत होकर दक्षिण दिशा में प्रस्थान कर दिया। तात्या टोपे ने इंद्रगढ़ पहुंचकर वहां कुछ समय विश्राम किया। किंतु उसके पीछे ही होम्स की सेना तथा दूसरी ओर से रॉबर्ट की सेना भी आ रही थी। उन दिनों घनघोर वर्षा की झड़ी लगी हुई थी, इस कारण चंबल भी जल से लबालब भरी अपने रोद्र रूप का प्रदर्शन कर रही थी। तात्या के पीछे से शत्रु बढ़ा आ रहा था तो सामने थी बाढ़ से परिपूर्ण चंबल नदी। तात्या उत्तर-पूर्व की ओर मुड़कर बूंदी जा पहुंचा। वहां से बड़ी चतुराई और सफलता सहित शत्रुओं को 1857 का स्वातंत्र्य समर -406

भूलभूलैया में डालता हुआ वह नीमच और नसीराबाद के मध्य स्थित प्रदेश में जा पहुंचा, जहां की जनता पहले से ही क्रांति-यज्ञ में योगदान दे रही थी। यहां उसने पुनः अंग्रेजों को छकाने में सफलता प्राप्त की। उसने उन्हें ऐसा भुलावा दिया कि तात्या दक्षिण की ओर बढ़ रहा है, किंतु वह भीलवाड़ा जा पहुंचा। यह समाचार प्राप्त होते ही रॉबर्ट सरवर नामक ग्राम से बढ़ा और उसने तात्या की सेना पर आक्रमण कर दिया। 7 अगस्त को अंग्रेजों की सेना ने धावा बोला, किंतु तात्या ने दिन भर इस सेना को रोके रखने में सफलता पाई और रात्रि में ही वह अपनी सेना और तोपों सहित सुरक्षित उदयपुर राज्य की सीमा में स्थित कोटरा नामक ग्राम में जा पहुंचा। वहां अपनी सेना को विश्राम करने का अवसर देकर तात्या टोपे समीप ही स्थित ‘नाथद्वारा’ नाम के हिंदू तीर्थ क्षेत्र में भगवान् श्रीकृष्ण की पावन प्रतिमा के दर्शन करने जा पहुंचा। जब वह वहां से मध्य रात्रि में वापस लौटा तो उसे विदित हुआ कि उसका पीछा करती हुई ब्रिटिश सेना भी समीप आ पहुंची है। अतः उसने वहां से अपनी सेना को प्रस्थान करने का आदेश दे दिया। परंतु सैनिक इतने अधिक थक गए थे कि पैदल सैनिकों ने स्पष्टतः कह दिया कि सतत प्रवास करने के कारण पैदल सेना अब आगे बढ़ने में समर्थ नहीं है, अश्वारोही चाहें तो आगे जा सकते हैं। ऐसी स्थिति में तो युद्ध करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प ही नहीं रह गया था। दूसरे दिन अर्थात् 14 अगस्त को यथाशीघ्र सूर्योदय से पूर्व ही उसने अपनी सेना की यथासंभव व्यूह-रचना कर ली। तात्या की सेनाओं ने रॉबर्ट की सेनाओं से जमकर संघर्ष किया, किंतु अंग्रेजों की सेना के समक्ष उसे पराजित होकर तितर-बितर होना पड़ा। तात्या की सेना तोपें भी छोड़कर रणभूमि से हट गई और हटते-हटते लगभग पंद्रह मील दूर चली गई। अब पुनः तात्या टोपे की सेना तोपों से वंचित हो गई थी। किंतु विजय के उन्माद से उन्मत्त शत्रु अभी भी तात्या टोपे की सेना तोपों से वंचित हो गई थी। किंतु विजय के उन्माद से उन्मत्त शत्रु अभी भी तात्या का पीछा कर ही रहे थे। फिर भी तात्या अंग्रेजों को झांसा देकर चंबल की ओर बढ़ने लगा; किंतु अंग्रेजी सेना के उसपर हमले भी जारी रहे और चंबल नदी पर एक और ही दृश्य उपस्थित हो गया, जब एक अंग्रेज कमांडर अपने चुने हुए सैनिकों सहित चंबल के किनारे पर ही आ धमका। किंतु बाधाओं को खेल समझनेवाले तात्या का हौसला मंद नहीं हुआ, अपितु उसने अंग्रेजों को भी आश्चर्य में डाल दिया। उसने एक अंग्रेज अधिकारी को पीछे हटा दिया तो दूसरे को वंचिका दी और उसकी आंखों में धूल झोंकता हुआ तात्या मंजिल-पर-मंजिल पार करता हुआ चंबल नदी पर जा पहुंचा। इतना ही नहीं, उसने चंबल को पार भी कर लिया और अंग्रेज उसका रास्ता ही ताकते रह गए। अब अंग्रेजों और तात्या की सेनाओं के मध्य चंबल बह रही थी। किंतु तात्या के पास न तोपें थीं, न खाद्य सामग्री और न धन ही। इस प्रकार तात्या टोपे का पूर्ण पराभव हुआ था। अतः अब उसे नर्मदा का मार्ग छोड़कर झालरापाटाण की ओर प्रस्थान करना पड़ा। उस राज्य का अंग्रेजनिष्ठ नरेश भी नामर्द तो नहीं था। उसने अपनी विश्वासपात्र 1857 का स्वातंत्र्य समर - 407

सेना और जंगी तोपखाने सहित तात्या की सेना पर टूट पड़ने की ‘वीरता’ दिखाई। किंतु यह भी क्या चमत्कार था कि त्यों ही तात्या और अंग्रेजों के चाटुकार उस राजा की सेना के सैनिकों की आंखें चार हुईं, वे तात्या को ही ‘स्वामी’ कहकर उसका अभिवादन करने लगे। इस प्रकार वहां भी तात्या को पर्याप्त संख्या में घोड़े, गाड़ियां तथा रसद अर्पित कर दी गई। तात्या वहां खाली हाथ पहुंचा था, किंतु अब उसके पास बत्तीस तोपें हो गई थीं। राव साहब पेशवा का ओदश मिला कि झालरापाटण नरेश से पच्चीस लाख रूपए जुर्माने के रूप में वसूल किए जाएं। किंतु उसके अत्यधिक अनुनय-विनय करने पर पंद्रह लाख रूपए पर समझौता हो गया। तात्या टोपे वहां पांच दिन ठहरा और उसने अश्वारोही सैनिकों को तीस रूपए तथा पैदल सैनिकों को बीस रूपए मासिक के हिसाब से वेतन चुका दिया। अब तात्या, राव साहब और बांदा के नवाब ने दक्षिण की ओर बढ़ने के संबंध में विचार-विमर्श किया। पेशवा की इस सेना का प्रमुख लक्ष्य था नर्मदा नदी को पार कर दक्षिण भारत में प्रवेश। अंग्रेजों ने भी तात्या की योजना को असफल बनाने हेतु अपनी सेना की कुशलतापूर्ण और सुदृढ़ व्यूह-रचना करने में कोई कसर न छोड़ी। उन्होंने तात्या के आगे बढ़ सकने के सभी मार्गों को अवरुद्ध कर दिया। किंतु अब तो तात्या के पास भी तोपखाना था और साथ ही वह तो प्रत्येक आपदा और बाधा से टकराने को बहुत पहले से ही संकल्पबद्ध था। अतः उसने अपने सहयोगियों को आह्वान दिया-“चलो साथियों, इंदौर की ओर प्रस्थान करो।” यह कल्पना तात्या के साहसी स्वभाव के सर्वथा अनुरूप ही थी। जिस तात्या टोपे ने ग्वालियर की रणभूमि में अपने अद्भुत नाटक का प्रदर्शन किया था, उसके लिए इंदौर में होल्कर के सिंहासन को हिला देना कौन सा असंभव कार्य था! होल्कर उसके इस साहसपूर्ण कार्य में उसकी सहायता करता, यही उसका कर्तव्य था। किंतु उसने तो अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया था। अतः पेशवा अब इंदौर से ऐसा कराने के लिए ही तो जा रहा था। इंदौर की सेना गुप्त रूप से तात्या के साथ थी। होल्कर का राजदरबार भी तात्या का समर्थक था। इसलिए महान् धैर्यवान् तात्या ने इंदौर प्रस्थान करने की योजना बनाई थी। अब तात्या ने तत्काल ही झालरापाटण से दक्षिण की ओर बढ़कर मालवा में प्रवेश किया और वह राजगढ़ ग्राम के पास खड़ा हुआ दृष्टिगोचर हुआ। अब तात्या का पीछा करते हुए रॉबर्ट, होम्स, पार्क, मिचेल, होप, लॉक, हॉर्ट आदि अंग्रेज सेनापतियों के नेतृत्व में अंग्रेजी सेनाएं चारों दिशाओं से बढ़ती आ रही थीं। तात्या के इंदौर पर आक्रमण करने के लिए बढ़ने के समाचार से ही उनके हृदय प्रकंपित हो उठे थे। कोई उज्जयिनी से बढ़ा तो कोई राजगढ़ की ओर से आ निकला, कोई मऊ की ओर से सरका तो कोई तलखेड़ की ओर से चढ़ दौड़ा। मिचेल ज्यों ही एक पहाड़ी चढ़ा तो उसकी दृष्टि दूसरी ओर पहाड़ी से उतरते हुए तात्या पर पड़ी। किंतु अब 1857 का स्वातंत्र्य समर -408

अंग्रेजी सेना भी थककर इतनी चूर हो गई थी कि उसके लिए एक पग भी आगे रखना असंभव हो गया था। उसका दम फूल चुका था। तात्या ने अंग्रेजी सेना की इस हताश अवस्था का पूर्ण लाभ उठाया और वह आगे निकल गया। प्रातःकाल ही मिचेल पुनः उसके पीछे आ धमका। अब क्रांतिकारी थके हुए थे; किंतु फिर भी उन्हें युद्ध के लिए सिद्ध होना ही पड़ा। उस समय उनकी संख्या लगभग पांच-छह हजार थी और उनके पास उत्तम श्रेणी की तीस के लगभग तोपें भी थीं। नितांत ही आश्चर्य की बात है कि अंग्रेजी सेना के एक-डेढ़ हजार सैनिकों के धावा बोलते ही क्रांतिकारी अपनी तोपों का भी छोड़कर भागते हुए ही दिखाई दिए। यहीं पर तो तात्या टोपे और कुंवर सिंह की छापामार युद्धकला का उत्कृष्ट रहस्य मुखरित हो उठता है। अंग्रेजी सेना से खुले मैदान में युद्ध न करने के अपने निर्णीत सिद्धांत को भंग न होने देने के लिए हो तो तात्या की सेना ने हाथ में आए अपने निर्णीत सिद्धांत को भंग न होने देने के लिए ही तो तात्या की सेना ने हाथ में आए अनेक अवसर भी इच्छा सहित ही जाने दिए थे। अब तात्या की सेनाएं मैदान से हटकर बेतवा नदी के समीप स्थित वनखंड में जा घुसी थीं और दूसरी ओर सिरोजनगर के पास आ निकलीं थीं। सिरोज में पुनः तात्या टोपे को चार तोपें प्राप्त हो गई थीं। इसी समय वर्षा अपने पूर्ण भयंकर रूप का प्रदर्शन भी करने लग गई थी। अतः तात्या की सेनाओं को भी विश्राम करने का पूर्ण अवसर उपलब्ध हो गया था। आठ दिन के उपरांत तात्या ने उत्तर की ओर प्रस्थान किया; किंतु शिंदे के राज्य में स्थित ईसागढ़ ग्राम ने उसे रसद देना अस्वीकार कर दिया; अतः उसे वहां से बलात् रसद लेनी पड़ी और आठ तोपें भी उसके हाथ लग गईं। परंतु अब नर्मदा को पार करना तो दिन-प्रतिदिन पीछे हटता जा रहा था, क्योंकि तात्या और नर्मदा में अंतर बढ़ता ही जा रहा था। परंतु जब इतनी अंग्रेजी सेनाएं अकेले तात्या के पीछे ही लगी हुई हों तो फिर नर्मदा पार करने का ध्यान ही कैसे आ सकता है। 173 1857 का स्वातंत्र्य समर – 409 173 एक अंग्रेज लेखक कहता है-"फिर पीछे हटने का वह अनोखा क्रम आरंभ हो गया, जो दस मास तक चलता रहा। किंतु तात्या टोपे भी पराजय का उपहास उड़ाता जाता था और अब उसका नाम यूरोप भर में अनेक एंग्लो-इंडियन सेनापतियों की अपेक्षा अधिक प्रसिद्ध हो गया था। उसके समक्ष कोई साधारण समस्या तो विद्यमान नहीं थी। उसे पराजित एशियावासियों की सेना को संगठन-सूत्र में आबद्ध करना था, जिसका उससे कोई व्यक्तिगत संबंध भी नहीं था। और परस्पर भी तो वे सैनिक एक ही आधार पर एकता के सूत्र में आबद्ध थे। वह सूत्र था-समान द्वेष और समान भय। अंग्रेजों के नाम से द्वेष और उनके द्वारा फांसी के फंदों पर लटका दिए जाने की आशंका। ऐसी अस्त-व्यस्त सेना को भी एकता के सूत्र में पिरोकर उसे येन-केन प्रकारेण आगे बढ़ना पड़ता था। और वह भी इतनी तीव्र गति से कि उससे केवल उसका पीछा करनेवाले शत्रु ही स्तंभित नहीं रह जाते थे अपितु तात्या के प्रस्थान की रेखा से समकोण करके दौड़ लगानेवालों को भी दांतों तले उंगली दबानी पड़ती थी। अपने इस अर्द्ध संगठित गिरोह को उन्मादियों के तुल्य दौड़ते रखने के साथ ही तात्या को

अब क्रांतिकारियों ने भी अपनी सेना दो भागों में विभाजित कर दी। एक का नेतृत्व राव साहब पेशवा कर रहे थे तो दुसरे का तात्या टोपे। दोनों सेनाएं पृथक्-पृथक् दिशाओं में प्रस्थान भले ही करती थीं, किंतु उनकी युद्ध पद्धति में कोई अंतर नहीं था। शत्रुओं को धोखे में डालती, यदा-कदा अपनी ही तोपें गंवातीं, मंग्रोली, छिंदवाड़ा आदि में संग्राम को धोखे में डालती, यदा-कदा अपनी ही तोपें गंवातीं, छिंदवाड़ा आदि में संग्राम करती और हटती हुई ये दोनों सेनाएं अंत में ललितपुर में जाकर मिल गईं। परंतु नर्मदा की लहरें तो अभी भी बड़ी दूर थीं। अब ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी कि अंग्रेजों की प्रसन्नता का कोई पारावार ही न रहा। दक्षिण की ओर से मिचले, पूर्व और उत्तर की दिशा से कर्नल लिडेल और पश्चिम दिशा से कर्नल पार्क तथा चंबल की ओर से रॉबर्ट आगे बढ़ता आ रहा था और इस प्रकार तात्या टोपे शत्रु के व्यूह-पाश में चारों ओर से घिर गया। अब तात्या और राव साहब पेशवा में विचार-विमर्श हुआ। तदनुसार वे तत्काल कजूरी जा पहुंचे। वहां उन्हें पता लगा कि अंग्रेज सेना विद्यमान है। अतः उन्होंने पुनः वनखंड में प्रेशव किया और वे उत्तर में स्थित तालवेहट तक जा पहुंचे। अंग्रेजों ने समझा कि अब तात्या ने दक्षिण जाने का अपना विचार बदल दिया है। किंतु वहीं से तात्या और राव साहब ने बड़ी ही त्वरित गति से बेतवा को पार किया। कजूरी और रायगढ़ में अंग्रेजों को अपने हाथ दिखाते हुए, कभी खुलकर लोहा लेते हुए छिपकर दक्षिण की ओर बढ़ते रहे। तात्या के इस साहसपूर्ण कृत्य से अंग्रेज दुविधा में पड़ गए। अब वे उसे रोकने के लिए चारों ओर से आगे बढ़े। किंतु अपनी विचित्र गतिविधि से शत्रु को चकमा देकर इस नरपुंगव ने विद्युत् वेग से घाटियां लांघी और सरिताएं पार कीं, वन-प्रांतरों को चीरा और दक्षिण की ओर बढ़ता रहा। उसपर एक ओर से पार्क दृष्टि गड़ा रहा था और सामने से मिचेल आ धमका। इसपर भी तात्या टोपे का दक्षिण की ओर बढ़ना जारी रहा। अंततः 174 1857 का स्वातंत्र्य समर - 410 174 -अनेक नगरों पर अपनी विजय पताका फहरानी पड़ी, अनेक स्थानों से रसद आदि जुटानी पड़ी, नई तोपों को हथियाना पड़ता था तो जनता में से ही नए स्वयंसेवक भी अपने साथ लगाने पड़ते थे, जिन बेचारों के भाग्य में प्रतिदिन ही साठ मील की दौड़ लगाना लिखा गया था। इन सभी कार्यों को यथा उपलब्ध साधनों के बलबूते पर पूर्ण करने में ही तात्या की असाधारण क्षमता प्रकट होती है। अपने विद्रोही शत्रु के नाते हम भले ही उसको सम्मान न दें, किंतु यह सत्य है कि वह हैदर अली के समक्ष था। यदि वह अपनी योजना पूर्णतः कार्यान्वित करने में सफलता प्राप्त कर लेता और नागपुर से घुसकर मद्रास की ओर निकल जाता तो वह भी हैदर अली के सदृश ही बीभत्स शत्रु बन जाता। नेपोलियन को जिस प्रकार इंगलिश चैनल ने रोक दिया था उसी प्रकार नर्मदा ने तात्या को रोक लिया था। नर्मदा पार कर पाने के अतिरिक्त वह और तो सभी कुछ कर लेने में सफल हो गया। अंग्रेजी सेनाएं पहले तो अपने स्वभाव के अनुरूप आगे बढ़ती रहीं और अंततः जब उन्हें वेग से बढ़ना आ ही गया तब भी ब्रिगेडियर पार्क और कर्नल नेपियर तात्या की आधी गति को ही प्राप्त कर पाए। इसपर भी वह बच निकला और सर्दी, गर्मी तथा वर्षा से टकराता हुआ भागता ही रहा-कभी दो हजार सैनिकों के साथ तो कभी पंद्रह हजार सैनिकों के साथ। -फ्रेंड्स ऑफ इंडिया'।

वह नर्मदा तट पर आ पहुंचा। आश्चर्यचकित संसार ने तात्या का जय-जयकार किया और तात्या टोपे ने अंततः नर्मदा को लांघ ही लिया। अब उसका प्रयाण दक्षिण की ओर हो रहा था। मैलसन ने लिखा है-‘तात्या ने जिस जिवट और हठ सहित अपनी योजना कार्यान्वित की उसकी प्रशंसा न करना असंभव है।’ इस संबंध में 17 जनवरी, 1859 के ‘लंदन टाइम्स’ का विवरण भी पठनीय है। उसने लिखा था-

”Our very remarkable friend, Tatia Tope is too troublesome and clever an enemy to be admired. Since last June he has kept central India in fervor. He has sacked stations, plundered treasuries, emptied arsenals, collected armies, lost them, fought battles, lost them, taken gunds from native prince, lost them; then, his motions were like forked lighting; and for weeks, he has marched 30 and 40 miles a day. He has crossed the Narmada to and fro. He has marched between our columns, behind them, and before them. Ariel was not more subtle aided by the best staged mechanism. Up mountains, over rivers, through ravines and vallies, amidst swamps, on he goes, backwards and forwards, sideways and zig-zag ways, now falling upon a post card and carrying off the Bombay mail, now looting a village, headed and burned yet evasive as proteus.” ”

अंततः मराठा सेना दक्षिण में जा पहुंची। होशंगाबाद के समीप नर्मदा नदी को पार कर तात्या नागपुर के समीप पहुंच गया है, यह समाचार प्राप्त होते ही केवल तीन प्रांतों में ही नहीं, इंग्लैंड मात्र में ही नहीं अपितु संपूर्ण यूरोप में एक ही स्वर निनादित हो उठा, “धन्य तात्या, धन्य-धन्य टोपे!” महाराष्ट्र तो उसके सान्निध्य की ही बाट जोह रहा था। हैदराबाद का निजाम, मद्रास का गवर्नर लॉर्ड हेरिस, बंबई का लॉर्ड एलफिंस्टन, कलकत्ता का लॉर्ड केनिंग तत्क्षण थर्रा उठे।175 तात्या ने रणचंडी का ऐसा अपूर्व पासा फेंका था, किंतु अब तो समय हाथ से निकल चुका था। यदि एक वर्ष पूर्व ही वह नर्मदा पार हो गया होता तो दृश्य कुछ और ही होता। अब तो सन् 1858 के अक्तूबर मास के मध्य में उसकी यह रण-चपलता केवल कौतुक का ही कारण सिद्ध हुई, उपयोगी अथवा जय-प्रदायनी नहीं। यत्र-तत्र उठी क्रांति की ज्वाला पर पानी पड़ चुका था। अब तो

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175 मैलसन ने अपने ग्रंथ ‘इंडियन म्युटिनी’, खंड 5 में पृष्ठ 238-40 पर लिखा है-“यह बात नितांत ही उल्लेखनीय है कि उस व्यक्ति का भतीजा सेना सहित महाराष्ट्र की धरती पर आ पहुंचा था, जिसे मराठों द्वारा अंतिम पेशवा का वास्तविक उत्तराधिकारी माना जाता था। निजाम राजनिष्ठ था; किंतु स्थिति बड़ी विचित्र थी। इससे पूर्व भी ऐसी घटनाएं हो चुकी थीं जिनका एक उदाहरण सिंधिया के मामले में उपलब्ध हुआ था। जब सर्वोच्च शासक ने राष्ट्र-भावनाओं को रोकने के प्रयास किए तो लोगों ने उसके विरूद्ध भ विद्रोह कर दिया। अतः यह असंभव ही था कि यह भय उत्पन्न न हो कि तात्या की सेना संपूर्ण महाराष्ट्र की जनता को उभार दे और तब शस्त्र-सज्ज लोगों का यह विद्रोह संपूर्ण दक्षिण की जनता को ही प्रभावित कर दे।”

संपूर्ण राष्ट्र भयंकर रक्तस्राव के उपरांत शिथिलगात्र व संज्ञाविमूढ होकर रह गया था। यद्यपि अभी भी उत्तरी हिंदुस्थान और राजस्थान में तात्या और उसकी सेना को ग्राम-ग्राम में लोग रसद और धन-धान्य अर्पित करते थे, वह वहां देशभक्त के रूप में पूजित और वंदनीय था, परंतु नागपुर में स्वयं मराठों के प्रदेश में लोग उसका योग देने में भय का अनुभव करते थे। किसी ने भी उसके महान् कार्य में योगदान नहीं दिया। हां, कुलकलंकिनी बाकाबाई की राजनिष्ठा के बीज से और कौन सी फसल उत्पन्न हो सकती थी। तब भी तात्या ने से संपूर्ण विपरीत स्थिति के बावजूद वहां ठहरने का निश्चय कर लिया। अब तात्या के समक्ष निजाम का राज्य था। वहां भी क्रांतिकारी थे जो स्वातंत्र्य युद्ध की ज्वाला को धधकाने की बाट जोह रहे थे, इधर पूना और खानदेश से भी अंग्रेजी सेनाएं चढ़ दौड़ी। मेलघाट, असीरगढ़, खानदेश, गुजरात, नागपुर आदि सभी दिशाओं से अनेक अंग्रेजी सेनाएं दक्षिण का द्वार बंद कर देने के लिए बढ़ रही थीं। किंतु ऐसी स्थिति में भी तात्या ने अपने अपूर्व धैर्य का परिचय देते हुए अपनी रणनीति का चमत्कार दिखाया। उसने अपना पीछा करनेवाली तथा घेरनेवाली सेनाओं को रोकथाम कर नर्मदा के उद्गम स्थल तक अपना रण-कौशल दिखाया, क्योंकि अब उसकी दृष्टि बड़ौदा पर गड़ी हुई थी। आगरा रोड से होकर अंग्रेजों की डाक-गाड़ियों को लूटता, तारयंत्रों को तोड़ता और अंग्रेज सेनाओं को झांसा देता हुआ तात्या नर्मदा की ओर बढ़ता रहा। नर्मदा के सभी घाटों पर शत्रु सेना के दल बादल-से मंडरा रहे थे, नदी के दोनों घाटों पर शत्रु सेना डटी हुई थी, किंतु नर्मदा को पार करने को उत्कट लगनेवाले तात्या का उत्साह मंद नहीं हुआ और वह करगूण नामक ग्राम में जा पहुंचा। वहां उसका अंग्रेज सेनापति मेजर संडरलैंड से डटकर संघर्ष हुआ। युद्ध अब अपने पूर्ण बीभत्स रूप को ग्रहण कर रहा था। उसी समय तात्या ने अपनी सेनाओं को आदेश दिया कि तत्काल गोली वर्षा बंद कर दो और नर्मदा में कूद पड़ो। उसका आदेश मिलते ही तात्या के सैनिक नर्मदा में कूद पड़े। अभी अंग्रेज यह विचारने में ही लगे हुए थे कि यह क्या हो रहा है और दूसरी ओर तात्या अपने अनुयायियों सहित नर्मदा को पार कर गया। यह प्रसंग आज तक भी युद्धों के इतिहास में एक अतुलनीय एवं नवीन आश्चर्यजनक घटना के रूप में स्मरण किया जाता है। मैलसन ने तो स्पष्ट रूप से लिखा है-“उनकी तोपें छीन ली गई थीं, किंतु तात्या के सैनिकों ने नितांत शीघ्रता सहित मार्ग तय करने का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया। इस कला में इन देशी सिपाहियों का कोई भी मुकाबला नहीं कर पाएगी। इस स्थित में भी तात्या ने बड़ौदा की ओर बढ़ने जाने का अपना लक्ष्य नहीं छोड़ा था। बड़ौदा के राजदरबार तथा सेना में भी नाना साहब के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 412

पक्ष के अनेक लोग थे। अतः वे तो तात्या के आगमन की बाट जोह रहे थे। तात्या राजपुर पहुंचा, जहां उसे घोड़े और धन भी मिला। दूसरे दिन उसने छोटा उदयपुर में प्रवेश किया, वहां से बड़ौदा केवल पचास मील की दूर रह गया था।'' अब यद्यपि बड़ौदा केवल पचास मील की ही दूरी पर रह गया था, किंतु अंग्रेजों की सेनाएं भी तो तात्या का निरंतर पीछा कर रही थीं। तात्या को चारों ओर से ही अंग्रेजी सेनाएं घेरने का प्रयास कर रही थीं। तात्या का पीछा करते हुए पार्क छोटा उदयपुर भी जा पहुंचा था। अतः तात्या को भी अब बड़ौदा की ओर बढ़ने का अपना विचार त्याग देना पड़ा और उसने अपनी सेना सहित उत्तर की ओर बढ़ते हुए बांसवाड़ा के जंगलों में प्रवेश किया। किंतु उसी समय ब्रिटेन की महारानी की घोषणा सुनकर बांदा के नवाब ने आत्मसमर्पण कर दिया। तात्या और राव साहब के समक्ष अब ऐसी विचित्र और कठिन परिस्थिति पैदा हो गई थी कि उससे निकल पाना भी असंभव-सा ही प्रतीत हो रहा था। दक्षिण में नर्मदा, पश्चिम में रॉबर्ट तथा उत्तर और पूर्व में अनुल्लंघनीय ढलान थी। इस विपरीत परिस्थिति में यदि राव साहब और तात्या टोपे आत्मसमर्पण भी कर देते तो उन्हें कौन दोषी ठहरा सकता था। किंतु वे वीर धन्य हैं, उन्होंने इस संकटापन्न अवस्था में भी आत्मसमर्पण की कायरतापूर्ण भावना को पास न फटकने दिया। एक अंग्रेज ग्रंथकार ने आश्चर्यचकित होकर इन वीरों का गुणगान करते हुए लिखा है-“किंतु ये दो ऐसे व्यक्ति थे जो इस घोर संकटपूर्ण परिस्थिति में भी नितांत शांति, वीरता और धैर्य सहित अपने जीवन के इस प्राणांतक संघर्ष का सामना करते रहे।'' किंतु तात्या ने कठिनाइयों के इस चक्रव्यूह को भी बेध डाला। वह 11 दिसंबर को जंगल से बाहर निकला और एक किलेदार से थोड़ी सी सहायता प्राप्त कर उदयपुर की दिशा में बढ़ चला। किंतु उसी समय कई अंग्रेजी सेनाओं ने भी उसपर आक्रमण कर दिया। अतः उसे पुनः वनखंड में शरण लेनी पड़ी। अब तात्या को एक सप्ताह से अधिक ठहरना असंभव ही हो गया था। यह स्पष्ट होता जा रहा था कि उसे शरण लेनी ही पड़ेगी। उसी समय क्रांतिकारी नेताओं में भी परस्पर यह चर्चा चलने लगी थी कि अब इस संघर्ष को समाप्त कर देना ही श्रेयस्कर होगा। अब तो वह वन भी वन नही रह गया था-वे चारों ओर से खदेड़कर उस स्थान पर बंद कर दिए गए-बल्कि महाराष्ट्र के सिंहों का पिंजरा ही बनकर रह गया। सभी दिशाओं से अंग्रेजों की सेनाओं के पाश मानो उसकी ग्रीवा को ही जकड़ते जा रहे थे। इस स्थिति में भी युद्ध को बंद कर देने का विचार इस मराठा वीर के मन में उत्पन्न नहीं हो पाया। एक दिन वह राव साहब के साथ प्रतापगढ़ की दिशा में बढ़ चला। अभी तात्या टोपे की सेनाएं वन प्रदेश से बाहर भी नहीं निकल सकी थीं कि मेजर रॉक ने उसका मार्ग अवरुद्ध कर दिया। तात्या ने किसी प्रकार की भी दुविधा में न पड़ते हुए उस पर आक्रमण कर दिया। यह आक्रमण 1857 का स्वातंत्र्य समर – 413

भी इतना प्रचंड था कि रॉक के सैनिक आश्चर्यचकित रह गए। इस भांति जंगला तोड़कर इस मराठा सिंह ने एक बार पुनः अंग्रेजों पर आघात किया। यह आघात ऐसा था कि अंग्रेज सेनापति भी लज्जा से सिर झुकाए और हाथ मलते ही रह गए। 25 दिसंबर को तात्या टोपे बांसवाड़ा के वनखंड से बाहर आया। उसी समय अवध का प्रख्यात वीर शहजादा फीरोजशाह भी अपनी सेना सहित तात्या की सहायता करने के लिए आ रहा था। स्थानाभाव के कारण यहां फीरोजशाह ने गंगा और यमुना को पार कर जिस प्रचंड शौर्य का प्रदर्शन किया उसका विवरण प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है। शिंदे के एक दरबारी मान सिंह, फीरोजशाह, तात्या एवं राव साहब की 13 जनवरी, 1849 को इंद्रगढ़ में भेंट हुई। इन चारों नेताओं ने यहां एकत्रित होकर आगामी कार्यक्रम पर विचार-विमर्श किया। अंग्रेजों की साधारण सी गतिविधियों की सूचना भी तात्या को मिलती रहती थी। जब उसे यह विदित हुआ कि अंग्रेज पुनः चारों ओर से घेरा डालते आ रहे हैं तो वह बड़ी निर्भीकता से मंजिल तय करता हुआ देवास जा निकला। किंतु वहां भी वह चारों दिशाओं से बढ़ी आ रही अंग्रेज सेनाओं के व्यूह में घिर गया। अब उसकी यश-प्राप्ति की आशा तो किंचित् मात्र भी नहीं रह गई थीं, अतः कोई साहसी योजना बनाने का विचार ही करना निरर्थक था। अब उसके लिए अपनी थकी हुई सेना को अंग्रेजों की इस व्यूह-रचना से निकाल पाना ही कठिन हो गया था। अंग्रेज सेनापति भी दंभ से अकड़े हुए यह घोषणा कर रहे थे कि "देखें, अब यह कैसे बचकर निकलता हैं" अब तो क्रांतिकारियों के चारों नेता फीरोजशाह, मान सिंह, तात्या टोपे और राव साहब पर अंग्रेजों ने अपना जाल पूर्णरूपेण कस दिया था। 16 जनवरी, 1849 को तात्या, राव साहब तथा फीरोजशाह आगामी योजना पर विचार-विमर्श कर ही रहे थे कि बाहर कुहराम मच गया। तात्या ने तत्काल अनुमान लगाया कि अब उन्हें अंग्रेजों ने पूर्णतः घेर लिया है। उसने बाहर आकर देखा कि संपूर्ण छावनी में गोरों ने कुहराम मचा दिया है। गोरे सैनिक आनंद से झूमते हुए चीख उठे, "तात्या ने तत्काल अनुमान लगाया कि अब उन्हें अंग्रेजों ने पूर्णतः घेर लिया है। उसने बाहर आकर देखा कि संपूर्ण छावनी में गोरों ने कुहराम मचा दिया है। गोरे सैनिक आनंद से झूमते हुए चीख उठे, "तात्या मिल गया! किंतु उनकी वह चिल्लाहट क्षण भर में ही लुप्त हो गई। वे यही कहते रह गए कि अभी-अभी तो वह यहां था, अब कहां खिसक गया? 'दौड़ो सैनिकों, दौड़ो और खोजो' की चीख ही सुनाई पड़ी, किंतु तात्या कहीं न मिला। अंग्रेज सैनिकों की पूर्ण सतर्कता भी तात्या टोपे की चाल के समक्ष निढाल हो गई। तात्या मानो पंख लगाकर उड़ गया और अंग्रेज सैनिक और सेनापति क्रोध से सिर पटककर ही रह गए। अब 21 जनवरी को राव साहब, फीरोजशाह और तात्या अपने अन्य सहयोगियों सहित अलवर के समीप सीकर नाम ग्राम में उपस्थित हुए। अंग्रेज पुनः पागल होकर उनका पीछा करने में लग गए। अंग्रेज सेनापति होम्स की सेनाओं और क्रांतिकारियों में मुठभेड़ हुई, जिसमें क्रांतिकारी पराजित हो गए। किंतु इस पराजय ने क्रांतिकारियों को 1857 का स्वातंत्र्य समर - 414

हताश नहीं किया, क्योंकि उनकी विजय की आशाएं तो पहले ही नष्ट हो चुकी थीं। किंतु अब उनमें प्रतिकार की शक्ति नहीं रह गई थी। नर्मदा को पार कर बड़ौदा पर आक्रमण करने की तात्या की योजना भी अब समाप्त ही हो गई थी। अब तात्या और राव साहब ने अपनी छापामार युद्धकला में कुछ सुधार करने के संबंध में विचार-विमर्श किया और कुछ निश्चय करने पश्चात् तात्या और राव साहब ने अपनी सेनाओं से विदाई ले ली। तात्या के साथ केवल दो अश्व, एक टट्टू, दो ब्राह्मण रसोदए और एक नौकर था। अपने इस परिवार के साथ वे ग्वालियर के सरदार मान सिंह के पास पहुंचे। सरदार मान सिंह उन दिनों पारौन के वनों में शरण ले रहा था। मान सिंह ने उनसे कहा, "तात्या, तुमने अपनी सेना को छोड़कर यहां आने में भूल की है।" तात्या ने उत्तर दिया, "चाहे अच्छा हुआ अथवा बुरा, मैं तो अब तुम्हारे साथ ही रहने का निश्चय करके आया हूं। अब मैं तो इन प्राणलेवा पलायनों से बहुत अधिक थक गया हूं।" अंग्रेजों को भी यह सूचना मिल गई कि तात्या टोपे मान सिंह के पास रह रहा है। अंग्रेज प्रत्यक्ष युद्ध में उसे बंदी बनाने में असफल हो चुके थे। अतः उन्होंने छल-कपट के नीच हथकंडों को अपनाने को योजना बनाई। उन्होंने अपना एक दूत भी मान सिंह के पास भेजा और उसके माध्यम से यह कहलवाया गया कि यदि मानसिंह तात्या को पकड़वा दे तथा आत्मसमर्पण कर दे तो उसे क्षमा प्रदान की जा सकती है। इतना ही नहीं, शिंदे से यह भी कहा जाएगा कि वह नरवर राज्य उसे दे दे। इसी मान सिंह ने पहले अपने चाचा को भी अंग्रेजों को सौंप देने की कायरता प्रदर्शित की थी। वह इस प्रलोभन में फंसकर अंग्रेजों को सौंप देने की कायरता प्रदर्शित की थी। वह इस प्रलोभन में फंसकर अंग्रेजों के झांसे में आ गया। उसने तात्या आत्मसमर्पण कर देने का आग्रह किया तो वीरवर तात्या ने उसके इस प्रस्ताव को घृणा सहित ठुकरा दिया। उसी समय फीरोजशाह का एक पत्र भी तात्या को मिला था, जिसमें उसने तात्या को अपनी छावनी में आ जाने का निमंत्रण दिया था। तात्या ने यह पत्र मान सिंह को दिखाया और उससे परामर्श किया कि "मैं वहां जाऊं अथवा नहीं, इस संबंध में तुम्हारे परामर्श के अनुसार ही कार्य करूंगा।" किंतु नीच मानसिंह ने उससे कहा कि "आपको अभी कुछ दिनों यहीं ठहरना चाहिए, फिर इस संबंध में निश्चय कर लिया जाएगा।" तात्या ने ताड़ लिया कि मान सिंह को अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण करना है; किंतु इसपर भी वह यह समझता था कि मेरे संबंध में मान सिंह की नीयत में कोई अंतर नहीं आ पाया है। मान सिंह ने उससे कहा कि "मेरे वापस लौटने तक आप उस स्थान पर रहो जहां मेरा एक व्यक्ति आपको ले जाएगा।" उसके द्वारा बताए गए स्थान को सुरक्षित समझकर तात्या टोपे तीन दिन तक वहां रहा।" तीसरा दिन हुआ और सहस्त्रों युद्धों में शत्रु को नाकों चने चबवानेवाला वीर मराठा सेनानी, जो अब तक अनेक प्राणघातक संकटों और कष्टों 1857 का स्वातंत्र्य समर - 415

में भी अपनी चतुरता और रण-कौशल के कारण शत्रुओं के हाथ में नहीं आ पाया था, उस विश्वासघाती मान सिंह द्वारा ही बंदी नवा दिया गया। मान सिंह तात्या को वहां रहने का परामर्श देकर सीधी अंग्रेजों की शरण में गया था। उन्होंने तात्या को बंदी बनाने के लिए बंबई की अंग्रेजी सेना को इस विश्वासघाती के साथ भेजा था, तात्या के प्रति प्रत्येक भारतीय के मन में जो महान् आदर भावना विद्यमान थी, उसके कारण अंग्रेज किसी भारतीय पर विश्वास नहीं कर पाते थे। अतः बंबई के इन सैनिकों को केवल इतना निर्देश दिया गया था कि "मान सिंह जिस अभियुक्त को बंदी बनाने का निर्देश दे, उसे तुम्हें बंदी बनाकर ले आना होगा।" मान सिंह उन सैनिकों सहित पारौन के वनखंड में जा पहुंचा। तात्या को उसने तीन दिन पश्चात् ही वापस आने की बात कही थी और वह अपने कथनानुसार ठीक समय पर वापस आ पहुंचा था। जिस स्थान पर मान सिंह द्वारा भेजे गए आदमी द्वारा तात्या को ले जाया गया था, तात्या वहां विश्राम कर रहा था और जिस समय मान सिंह वहां पहुंचा उस समय वह प्रगाड़ निद्रा में लीन था। नराधम मान सिंह ने अपने साथ लाए हुए शिकारी कुत्तों को इस नर केसरी पर छोड़ दिया था। तात्या के नेत्र जब खुले तो उसने अपने आपको अंग्रेजों के बंदी के रूप में पड़ा हुआ देखा। यह घटना 7 अप्रैल, 1849 को अर्धरात्रि में घटित हुई। दूसरे दिन प्रातः काल ही उसे शिवपुरी में जनरल मीड की छावनी में कड़े पहरे के बीच ले जाया गया। यहां सैनिक न्यायलय लगा और उसमें तात्या के विरूद्ध ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध विद्रोह करने का आरोप लगाया गया। बुधवार को इन आरोपों का उत्तर देते हुए तात्या ने कहा- "मैंने जो भी कार्य किया है, अपने स्वामी के निर्देशानुसार किया है। कालपी तक मैंने नाना साहब के आदेशों के अनुसार ही आचरण किया। तदुपरांत मैंने राव साहब का आदेश माना। न्याय के अनुसार लड़े गये युद्धों अथवा मुठभेड़ों को छोड़कर मैंने अथवा नाना साहब ने एक भी यूरोपियन पुरूष, स्त्री अथवा बालक की निरर्थक हत्या नहीं की और न ही किसी को फांसीपर ही लटकाया। इससे अधिक मैं इस न्यायालय के समक्ष अन्य कोई भी बात कहने को तैयार नहीं हूं।" अंग्रेज के विशेष अनुरोध पर तात्या ने क्रांति के पुनीत प्रारंभ से लेकर उस दिन तक ही घटनाओं का प्रतिदिन का वृत्त भी संक्षेप में बता दिया। लिपिक ने उसके द्वारा दिए गए संपूर्ण विवरण को लिपिबद्ध कर लिया। तदुपरांत इस दैनिक कार्यक्रम और वक्तव्य को उसे पढ़कर सुनाया गया और उसे सुनने के पश्चात् तात्या टोपे ने उसके नीचे सुंदर रोमन अक्षरों में लिख-दिया TATIA TOPE । किंतु अंग्रेजों द्वारा उससे जो प्रश्न पूछे गए उनका उत्तर में उससे कोई प्रश्न पूछते थे तो वह बड़ी ही शांतिपूर्ण मुद्रा में उत्तर देता था, "मुझे पता नहीं।" 1857 का स्वातंत्र्य समर - 416

तीन दिन तक तात्या से इसी प्रकार पूछताछ की जाती रही। भारतीयों के झुंड-के-झुंड इस महान् वीर के दर्शनार्थ एकत्र होते थे, किंतु उन्हें दर्शन करने से वंचित रखा जाता था। जिनको उसे दर्शन करने की अनुमति प्राप्त हो जाती थी वे बड़े ही आदर सहित नतमस्तक होकर उसका अभिवादन करते थे। जिस समय अंग्रेजों ने तात्या को सूचित किया कि सैनिक न्यायालय उसके मामले में निर्णय देगा तो उसी समय उन्होंने यह भी कहा था कि वह अपने बचाव के लिए आवश्यक प्रमाण संगृहीत कर ले। उसी समय इस महा वीर क्रांति योद्धा ने अंग्रेजों को एक ही उत्तर दिया, "मैंने अंग्रेजों के विरूद्ध युद्ध किया है और मैं भलीभांति जानता हूं कि मुझे आत्माहुति देने के लिए तत्पर रहना चाहिए। मुझे तुम्हारे न्यायालय के निर्णय अथवा जांच से कोई सरोकार नहीं हैं।'" इस वीर मराठा के हाथों में बेड़ियां पड़ी हुई थीं, किंतु इस पर भी अपने हाथों को ऊंचा करते हुए इस महान् योद्धा ने घोषणा की-‘इन हथकड़ियों से मुक्त होने की मुझे एकमात्र आशा यही है कि तोप का गोला या फांसी का फंदा चूमते ही ये दूर हो जाएंगी। परंतु मैं तुम्हें एक बात बता देना चाहता हूं कि ग्वालियर में मेरा परिवार रह रहा है और उसका मेरे इन कार्यों से तनिक सा भी संबंध नहीं है। अतः मेरे कार्यों के बदले मेरे पिताजी अथवा पारिवारिक जनों को तनिक सा भी त्रास देना उचित नहीं होगा।‘’ जांच-पड़ताल और पूछताछ का नाटक समाप्त हो गया। तात्या टोपे को फांसी का दंड सुना दिया गया। दोपहर के चार बजे थे कि उसे तीसरी बंगाल गोरी सेना के कड़े पहरे में वध-स्तंभ के समीप लाया गया। फांसी के तख्ते के समीप आने पर सैनिकों ने व्यूह बनाकर इस महान् सेनानी को चारों ओर से घेर लिया। इस अवसर पर भारतीय पैदल सैनिक, अश्वारोही तथा अन्य दर्शकों की एक भारी भीड़ वहां एकत्र हो गई थी। तात्या ने अंग्रेजों से पुनः एक बार आग्रह किया कि उसके वृद्ध पिताजी को किसी प्रकार से भी त्रस्त न किया जाए। तात्या को दंड सुना दिया गया। तात्या के पैरों में पड़ी बेड़ियां काट दी गईं। वह नरपुंगव निस्संकोच होकर धीरे-धीरे वध-स्तंभ तक पहुंचा और बड़ी ही तीव्र गति से सीढ़ियों पर जा चढ़ा। नियमानुसार अब वधिक उसके हाथ-पैर बांधने के लिए वहां पहुंचे। उस समय तात्या ने हंसते हुए उन्हें कहा, "ऐसा करने की किंचित मात्र भी आवश्यकता नहीं है।" यह कहकर उसने स्वयं फांसी के फंदे को हार के समान अपने गले में पहन लिया। फंदा कसा गया और एक झटके के साथ तख्ता गिर पड़ा। और इस प्रकार पेशवा का राजनिष्ठ सेवक, सन् 1857 के स्वातंत्र्य समर का महान् नायक, हिंदुस्थान का निर्भीक वीर, धर्मरक्षक, देशाभिमानी और कुशल सेनापति तात्या टोपे का निर्जीव शरीर अंग्रेजों द्वारा निर्मित फांसी की टिकटिकी पर झूलता दृष्टिगोचर हुआ। वध मंच रक्त से सराबोर हो गया तो संपूर्ण देश के नेत्रों से अश्रुधाराएं प्रवाहित हो उठीं। समग्र हिंदुस्थान ही अश्रुओं से भीग गया। स्वदेश की सेवा के लिए उसने महान् 1857 का स्वातंत्र्य समर - 417

और अवर्णनीय कष्टों को सहन किया था, यही तात्या का एकमात्र दोष था। उसे इस देशभक्ति का पारितोषिक एक विश्वासघाती द्वारा उसके साथ किए गए विश्वासघात और नीचता के रूप में मिला था। अंग्रेजों ने उसे किसी रक्तपिपासु दस्यु के समान वधस्तंभ पर लटकाया था। है महावीर तात्या! तुमने इस अभागे देश में जन्म ही क्यों ग्रहण किया? इन विश्वासघाती नराधमों और महामूर्खों की स्वतंत्रता के लिए तुमने संघर्ष का आह्वान क्यों किया? तात्या टोपे, तुम्हारे लिए हमारे नेत्रों से जो अश्रुधाराएं प्रवाहित हो रही हैं, क्या तुम उन्हें देख रहे हो? हां, तुम्हें रक्तदान का प्रतिदान हम अभागे और निर्बल अश्रु बहाकर ही तो दे रहे हैं। हे नरवीर! तुमने भी यह कैसा घाटे का सौदा किया! तात्या की निष्प्राण देह को फांसी के फंदे से झूलता हुआ देखकर अपने पराक्रम पर समाधान व्यक्त करते हुए शूरवीर अंग्रेज अब वापस लौट रहे थे। तात्या की नश्वर काया इसी स्थिति में भगवान् सूर्यदेव के अस्ताचलगामी होने तक लटकती रही। वहां खड़े पहरेदार भी जब चले गए तब भीड़ को चीरते हुए यूरोपियन प्रेक्षक आगे बढ़े और उनमें इस महान् राष्ट्रभक्त के केशों के गुच्छे स्मृतिस्वरूप अपने पास रखने की पहल करने की होड़ लग गई। सन् 1857 के स्वातंत्र्य युद्ध के इस होमकुंड में तात्या के बलिदान के रूप में यह अंतिम आहूति पड़ गई थी। इस प्रकार वह भयंकर ज्वालामुखी जिसने अपने विस्तीर्ण मुख के क्रोध के आवेग में मांस, रक्त, लाखों, गड़गड़ाहटों और दग्ध लाल-लाल उष्ण लावा रस को उगला था, अब अपना मुख बंद कर रहा था। उसकी तलवार रूपी जीभें अब पुनः म्यान रूपी जबड़ों में समाती जा रही थीं। अब उसकी कड़कती बिजलियां और कर्णभेदी गड़गड़ाहट तथा गर्जनाएं, प्रचंड वेग और बवंडर व उग्रता सभी मदारी के पिटारे के समान वायुमंडल में विलुप्त हो रहे थे। ज्वालामुखी का मुख बंद हो गया। उसके धरातल पर पुनः हरियाली उगती दृष्टिगोचर होने लगी। उसपर पुनः कृषि-कार्य आरंभ हो गया। पुनः शांति, सुरक्षा और प्रेमभाव उभरने लगा। और अब इस ज्वालामुखी का पृष्ठभाग इतना सुकोमल और हरा-भरा दिखाई देने लगा कि कोई यह आशंका भी नहीं कर सकता कि उसके नीचे एक प्रचंड ज्वालामुखी विश्राम कर रहा है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 418

प्रकरण-3 समारोप अब यह ज्वालामुखी कुछ समय के लिए तो शांत हो ही गया है। फिर भी मैं समझता हूं कि पाठकों को यह जानने की इच्छा अवश्य होगी कि फीरोजशाह और राव साहब का तात्या के इस आत्मार्पण के उपरांत क्या बना? तात्या के विदा ले जाने के एक मास पश्चात् तक भी राव साहब पूर्ण वीरता सहित लड़ते रहे और जब कोई अन्य विकल्प न रह गया तो वे गुप्त रूप से जंगल की ओर निकल गए। किंतु तीन वर्ष के अज्ञातवास के पश्चात् वे बंदी बना लिये गए और उन्हें मृत्युदंड सुनाकर 20 अगस्त, 1862 को फांसी पर चढ़ा दिया गया। केवल फीरोजशाह ही अब वेश बदलकर घूमता रहा और सुदैव से वह भी हिंदुस्थान से बाहर निकल जाने में सफल हो गया। वह ईरान पहुंचा तथा करबला में जाकर रहने लगा। अब तक हम सन् 1857 के क्रांति-युद्ध का बारंबार उल्लेख करते रहे हैं। उससे अनेक प्रश्न भी हमारे समक्ष आ खड़े होते हैं। इनमें से भी एक प्रमुख प्रश्न यह है कि क्या क्रांति-युद्ध की संपूर्ण सिद्धता होने से पूर्व ही अकस्मात् इसका विस्फोट हो गया था? इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर है-नहीं। सन् 1857 की इस क्रांति के लिए जितनी तैयारियां और सिद्धताएं की गई थीं उतनी तो बड़ी-बड़ी शक्तिशाली सामंत और राजा-महाराजा, उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारी ही नहीं, अपितु नगर-के-नगर ही क्रांति 419

शंखनाद करने का स्वेच्छा सहित संकल्प व्यक्त कर रहे थे तो ऐसा कौन होगा जिसे तत्काल विप्लव का पुनीत प्रारंभ करने के संकोच की अनुभूति होगी? यह एक सुपरिचित तथ्य है कि किसी भी कार्य के आरंभ में ही अवरोध और बाधाएं उपस्थित होती हैं, उनपर विजय प्राप्त कर लिये जाने के पश्चात् संपूर्ण देश ही अपने आप उठ खड़ा होता है। इस दृष्टि से यह तथ्य सुस्पष्ट है कि क्रांतिकारियों के नेताओं ने किसी प्रकार के भी उतावलेपान का परिचय नहीं दिया था। वस्तुतः इतनी अनुकूल परिस्थिति में जो जाति खड़ी नहीं हो पाएगी वह तो कदापि विद्रोह नहीं कर सकेगी। परंतु अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि फिर यह क्रांति क्यों असफल हो गई? इस असफलता के छोटे-मोटे कारणों की चर्चा तो इस ग्रंथ में यथायोग्य स्थानों पर की ही जा चुकी है । किंतु इस महान् विप्लव की असफलता का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि यद्यपि क्रांति की पर्याप्त तैयारी की गई थी, किंतु तदुपरांत उत्पन्न होनेवाली परिस्थितियों का सामना कैसा किया जाएगा, इस संबंध में कोई आकर्षक और सुव्यवस्थित व्यवस्था नहीं की गई थी। अंग्रेज सत्ता को उखाड़कर नष्ट करने में तो सभी एकमत थे, किंतु उसके पश्चात् क्या होगा, इस संबंध में कोई सुनिश्चित योजना नहीं बनाई जा सकी थी। किंतु पहल के समान ही घातक मतभेदों और मुगलों तथा मराठों के पारस्परिक विवादों और वैरपूर्ण वायुमंडल के पुनः उद्भव का भय लोगों में व्याप्त था। इसलिए सर्वसाधारण में यह भावना व्याप्त हो गई थी कि व्यर्थ में ही अपना रक्त क्यों प्रवाहित किया जाए। उपर्युक्त आशंका के संदर्भ में ऐसी भावना का उत्पन्न हो जाना अस्वाभाविक भी तो नहीं था; क्योंकि इसी तानाशाही और अन्यायपूर्ण सत्ता से क्षुब्ध होकर तो जनता ने विदेशी शासन को पहले अपने ऊपर लादा था। क्रांति का प्रथम भाग अर्थात् विध्वंस का कार्य तो बड़ी सुगमता सहित पूर्ण हो गया; किंतु जब रचनात्मक और विधायक गतिविधियों का प्रारंभ होना था तो लोगों में पारस्परिक मतभेद और अविश्वास पुनः उभर आया। यदि जनता के अंतःकरण को आकर्षित करनेवाला और उसे प्रेरित करनेवाला कोई नवीन ध्येय और आदर्श उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाता तो क्रांति की प्रगति के समान ही उसका अंत भी उसके पुनीत प्रारंभ के समान ही यशस्वी और प्रभावशाली सिद्ध होता । यदि लोगों को इस तथ्य से पूर्णतः अवगत करा दिया जाता कि प्रलय के तुरंत पश्चात् ही पुनः नया सृजन और नवनिर्माण होता है तब क्रांति निश्चित रूप से ही सफलता प्राप्त करती। किंतु निर्माण तो दूर रहा, संहार कार्य भी तो हिंदुस्थान पूर्णरूप से नहीं कर पाया। इसका कारण क्या था? कारण यही था कि राष्ट्र का कंठ अपने व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु घोंटने की नीच प्रवृत्ति भारत से पूर्णरूप से नष्ट नहीं हो पाई थी। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि क्रांति की असफलता के मुख्यतः दो ही कारण थे। प्रथम यह कि अपनों के निकृष्टतम स्वराज्य की अपेक्षा अंग्रेजों का शांतिपूर्ण शासन भी स्वदेश के लिए अधिक हानिकारक है, इस तथ्य को भलीभांति न समझने के कारण ही अनेक मूर्खों द्वारा स्वदेश से द्रोह किया गया। क्रांति क असफलता का दूसरा प्रमुख कारण यह था कि 1857 का स्वातंत्र्य समर - 420