१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतीन दिन तक तात्या से इसी प्रकार पूछताछ की जाती रही। भारतीयों के झुंड-के-झुंड इस महान् वीर के दर्शनार्थ एकत्र होते थे, किंतु उन्हें दर्शन करने से वंचित रखा जाता था। जिनको उसे दर्शन करने की अनुमति प्राप्त हो जाती थी वे बड़े ही आदर सहित नतमस्तक होकर उसका अभिवादन करते थे। जिस समय अंग्रेजों ने तात्या को सूचित किया कि सैनिक न्यायालय उसके मामले में निर्णय देगा तो उसी समय उन्होंने यह भी कहा था कि वह अपने बचाव के लिए आवश्यक प्रमाण संगृहीत कर ले। उसी समय इस महा वीर क्रांति योद्धा ने अंग्रेजों को एक ही उत्तर दिया, "मैंने अंग्रेजों के विरूद्ध युद्ध किया है और मैं भलीभांति जानता हूं कि मुझे आत्माहुति देने के लिए तत्पर रहना चाहिए। मुझे तुम्हारे न्यायालय के निर्णय अथवा जांच से कोई सरोकार नहीं हैं।'" इस वीर मराठा के हाथों में बेड़ियां पड़ी हुई थीं, किंतु इस पर भी अपने हाथों को ऊंचा करते हुए इस महान् योद्धा ने घोषणा की-‘इन हथकड़ियों से मुक्त होने की मुझे एकमात्र आशा यही है कि तोप का गोला या फांसी का फंदा चूमते ही ये दूर हो जाएंगी। परंतु मैं तुम्हें एक बात बता देना चाहता हूं कि ग्वालियर में मेरा परिवार रह रहा है और उसका मेरे इन कार्यों से तनिक सा भी संबंध नहीं है। अतः मेरे कार्यों के बदले मेरे पिताजी अथवा पारिवारिक जनों को तनिक सा भी त्रास देना उचित नहीं होगा।‘’ जांच-पड़ताल और पूछताछ का नाटक समाप्त हो गया। तात्या टोपे को फांसी का दंड सुना दिया गया। दोपहर के चार बजे थे कि उसे तीसरी बंगाल गोरी सेना के कड़े पहरे में वध-स्तंभ के समीप लाया गया। फांसी के तख्ते के समीप आने पर सैनिकों ने व्यूह बनाकर इस महान् सेनानी को चारों ओर से घेर लिया। इस अवसर पर भारतीय पैदल सैनिक, अश्वारोही तथा अन्य दर्शकों की एक भारी भीड़ वहां एकत्र हो गई थी। तात्या ने अंग्रेजों से पुनः एक बार आग्रह किया कि उसके वृद्ध पिताजी को किसी प्रकार से भी त्रस्त न किया जाए। तात्या को दंड सुना दिया गया। तात्या के पैरों में पड़ी बेड़ियां काट दी गईं। वह नरपुंगव निस्संकोच होकर धीरे-धीरे वध-स्तंभ तक पहुंचा और बड़ी ही तीव्र गति से सीढ़ियों पर जा चढ़ा। नियमानुसार अब वधिक उसके हाथ-पैर बांधने के लिए वहां पहुंचे। उस समय तात्या ने हंसते हुए उन्हें कहा, "ऐसा करने की किंचित मात्र भी आवश्यकता नहीं है।" यह कहकर उसने स्वयं फांसी के फंदे को हार के समान अपने गले में पहन लिया। फंदा कसा गया और एक झटके के साथ तख्ता गिर पड़ा। और इस प्रकार पेशवा का राजनिष्ठ सेवक, सन् 1857 के स्वातंत्र्य समर का महान् नायक, हिंदुस्थान का निर्भीक वीर, धर्मरक्षक, देशाभिमानी और कुशल सेनापति तात्या टोपे का निर्जीव शरीर अंग्रेजों द्वारा निर्मित फांसी की टिकटिकी पर झूलता दृष्टिगोचर हुआ। वध मंच रक्त से सराबोर हो गया तो संपूर्ण देश के नेत्रों से अश्रुधाराएं प्रवाहित हो उठीं। समग्र हिंदुस्थान ही अश्रुओं से भीग गया। स्वदेश की सेवा के लिए उसने महान् 1857 का स्वातंत्र्य समर - 417