१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमें भी अपनी चतुरता और रण-कौशल के कारण शत्रुओं के हाथ में नहीं आ पाया था, उस विश्वासघाती मान सिंह द्वारा ही बंदी नवा दिया गया। मान सिंह तात्या को वहां रहने का परामर्श देकर सीधी अंग्रेजों की शरण में गया था। उन्होंने तात्या को बंदी बनाने के लिए बंबई की अंग्रेजी सेना को इस विश्वासघाती के साथ भेजा था, तात्या के प्रति प्रत्येक भारतीय के मन में जो महान् आदर भावना विद्यमान थी, उसके कारण अंग्रेज किसी भारतीय पर विश्वास नहीं कर पाते थे। अतः बंबई के इन सैनिकों को केवल इतना निर्देश दिया गया था कि "मान सिंह जिस अभियुक्त को बंदी बनाने का निर्देश दे, उसे तुम्हें बंदी बनाकर ले आना होगा।" मान सिंह उन सैनिकों सहित पारौन के वनखंड में जा पहुंचा। तात्या को उसने तीन दिन पश्चात् ही वापस आने की बात कही थी और वह अपने कथनानुसार ठीक समय पर वापस आ पहुंचा था। जिस स्थान पर मान सिंह द्वारा भेजे गए आदमी द्वारा तात्या को ले जाया गया था, तात्या वहां विश्राम कर रहा था और जिस समय मान सिंह वहां पहुंचा उस समय वह प्रगाड़ निद्रा में लीन था। नराधम मान सिंह ने अपने साथ लाए हुए शिकारी कुत्तों को इस नर केसरी पर छोड़ दिया था। तात्या के नेत्र जब खुले तो उसने अपने आपको अंग्रेजों के बंदी के रूप में पड़ा हुआ देखा। यह घटना 7 अप्रैल, 1849 को अर्धरात्रि में घटित हुई। दूसरे दिन प्रातः काल ही उसे शिवपुरी में जनरल मीड की छावनी में कड़े पहरे के बीच ले जाया गया। यहां सैनिक न्यायलय लगा और उसमें तात्या के विरूद्ध ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध विद्रोह करने का आरोप लगाया गया। बुधवार को इन आरोपों का उत्तर देते हुए तात्या ने कहा- "मैंने जो भी कार्य किया है, अपने स्वामी के निर्देशानुसार किया है। कालपी तक मैंने नाना साहब के आदेशों के अनुसार ही आचरण किया। तदुपरांत मैंने राव साहब का आदेश माना। न्याय के अनुसार लड़े गये युद्धों अथवा मुठभेड़ों को छोड़कर मैंने अथवा नाना साहब ने एक भी यूरोपियन पुरूष, स्त्री अथवा बालक की निरर्थक हत्या नहीं की और न ही किसी को फांसीपर ही लटकाया। इससे अधिक मैं इस न्यायालय के समक्ष अन्य कोई भी बात कहने को तैयार नहीं हूं।" अंग्रेज के विशेष अनुरोध पर तात्या ने क्रांति के पुनीत प्रारंभ से लेकर उस दिन तक ही घटनाओं का प्रतिदिन का वृत्त भी संक्षेप में बता दिया। लिपिक ने उसके द्वारा दिए गए संपूर्ण विवरण को लिपिबद्ध कर लिया। तदुपरांत इस दैनिक कार्यक्रम और वक्तव्य को उसे पढ़कर सुनाया गया और उसे सुनने के पश्चात् तात्या टोपे ने उसके नीचे सुंदर रोमन अक्षरों में लिख-दिया TATIA TOPE । किंतु अंग्रेजों द्वारा उससे जो प्रश्न पूछे गए उनका उत्तर में उससे कोई प्रश्न पूछते थे तो वह बड़ी ही शांतिपूर्ण मुद्रा में उत्तर देता था, "मुझे पता नहीं।" 1857 का स्वातंत्र्य समर - 416