भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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हताश नहीं किया, क्योंकि उनकी विजय की आशाएं तो पहले ही नष्ट हो चुकी थीं। किंतु अब उनमें प्रतिकार की शक्ति नहीं रह गई थी। नर्मदा को पार कर बड़ौदा पर आक्रमण करने की तात्या की योजना भी अब समाप्त ही हो गई थी। अब तात्या और राव साहब ने अपनी छापामार युद्धकला में कुछ सुधार करने के संबंध में विचार-विमर्श किया और कुछ निश्चय करने पश्चात् तात्या और राव साहब ने अपनी सेनाओं से विदाई ले ली। तात्या के साथ केवल दो अश्व, एक टट्टू, दो ब्राह्मण रसोदए और एक नौकर था। अपने इस परिवार के साथ वे ग्वालियर के सरदार मान सिंह के पास पहुंचे। सरदार मान सिंह उन दिनों पारौन के वनों में शरण ले रहा था। मान सिंह ने उनसे कहा, "तात्या, तुमने अपनी सेना को छोड़कर यहां आने में भूल की है।" तात्या ने उत्तर दिया, "चाहे अच्छा हुआ अथवा बुरा, मैं तो अब तुम्हारे साथ ही रहने का निश्चय करके आया हूं। अब मैं तो इन प्राणलेवा पलायनों से बहुत अधिक थक गया हूं।" अंग्रेजों को भी यह सूचना मिल गई कि तात्या टोपे मान सिंह के पास रह रहा है। अंग्रेज प्रत्यक्ष युद्ध में उसे बंदी बनाने में असफल हो चुके थे। अतः उन्होंने छल-कपट के नीच हथकंडों को अपनाने को योजना बनाई। उन्होंने अपना एक दूत भी मान सिंह के पास भेजा और उसके माध्यम से यह कहलवाया गया कि यदि मानसिंह तात्या को पकड़वा दे तथा आत्मसमर्पण कर दे तो उसे क्षमा प्रदान की जा सकती है। इतना ही नहीं, शिंदे से यह भी कहा जाएगा कि वह नरवर राज्य उसे दे दे। इसी मान सिंह ने पहले अपने चाचा को भी अंग्रेजों को सौंप देने की कायरता प्रदर्शित की थी। वह इस प्रलोभन में फंसकर अंग्रेजों को सौंप देने की कायरता प्रदर्शित की थी। वह इस प्रलोभन में फंसकर अंग्रेजों के झांसे में आ गया। उसने तात्या आत्मसमर्पण कर देने का आग्रह किया तो वीरवर तात्या ने उसके इस प्रस्ताव को घृणा सहित ठुकरा दिया। उसी समय फीरोजशाह का एक पत्र भी तात्या को मिला था, जिसमें उसने तात्या को अपनी छावनी में आ जाने का निमंत्रण दिया था। तात्या ने यह पत्र मान सिंह को दिखाया और उससे परामर्श किया कि "मैं वहां जाऊं अथवा नहीं, इस संबंध में तुम्हारे परामर्श के अनुसार ही कार्य करूंगा।" किंतु नीच मानसिंह ने उससे कहा कि "आपको अभी कुछ दिनों यहीं ठहरना चाहिए, फिर इस संबंध में निश्चय कर लिया जाएगा।" तात्या ने ताड़ लिया कि मान सिंह को अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण करना है; किंतु इसपर भी वह यह समझता था कि मेरे संबंध में मान सिंह की नीयत में कोई अंतर नहीं आ पाया है। मान सिंह ने उससे कहा कि "मेरे वापस लौटने तक आप उस स्थान पर रहो जहां मेरा एक व्यक्ति आपको ले जाएगा।" उसके द्वारा बताए गए स्थान को सुरक्षित समझकर तात्या टोपे तीन दिन तक वहां रहा।" तीसरा दिन हुआ और सहस्त्रों युद्धों में शत्रु को नाकों चने चबवानेवाला वीर मराठा सेनानी, जो अब तक अनेक प्राणघातक संकटों और कष्टों 1857 का स्वातंत्र्य समर - 415