१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 413, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर अवर्णनीय कष्टों को सहन किया था, यही तात्या का एकमात्र दोष था। उसे इस देशभक्ति का पारितोषिक एक विश्वासघाती द्वारा उसके साथ किए गए विश्वासघात और नीचता के रूप में मिला था। अंग्रेजों ने उसे किसी रक्तपिपासु दस्यु के समान वधस्तंभ पर लटकाया था। है महावीर तात्या! तुमने इस अभागे देश में जन्म ही क्यों ग्रहण किया? इन विश्वासघाती नराधमों और महामूर्खों की स्वतंत्रता के लिए तुमने संघर्ष का आह्वान क्यों किया? तात्या टोपे, तुम्हारे लिए हमारे नेत्रों से जो अश्रुधाराएं प्रवाहित हो रही हैं, क्या तुम उन्हें देख रहे हो? हां, तुम्हें रक्तदान का प्रतिदान हम अभागे और निर्बल अश्रु बहाकर ही तो दे रहे हैं। हे नरवीर! तुमने भी यह कैसा घाटे का सौदा किया! तात्या की निष्प्राण देह को फांसी के फंदे से झूलता हुआ देखकर अपने पराक्रम पर समाधान व्यक्त करते हुए शूरवीर अंग्रेज अब वापस लौट रहे थे। तात्या की नश्वर काया इसी स्थिति में भगवान् सूर्यदेव के अस्ताचलगामी होने तक लटकती रही। वहां खड़े पहरेदार भी जब चले गए तब भीड़ को चीरते हुए यूरोपियन प्रेक्षक आगे बढ़े और उनमें इस महान् राष्ट्रभक्त के केशों के गुच्छे स्मृतिस्वरूप अपने पास रखने की पहल करने की होड़ लग गई। सन् 1857 के स्वातंत्र्य युद्ध के इस होमकुंड में तात्या के बलिदान के रूप में यह अंतिम आहूति पड़ गई थी। इस प्रकार वह भयंकर ज्वालामुखी जिसने अपने विस्तीर्ण मुख के क्रोध के आवेग में मांस, रक्त, लाखों, गड़गड़ाहटों और दग्ध लाल-लाल उष्ण लावा रस को उगला था, अब अपना मुख बंद कर रहा था। उसकी तलवार रूपी जीभें अब पुनः म्यान रूपी जबड़ों में समाती जा रही थीं। अब उसकी कड़कती बिजलियां और कर्णभेदी गड़गड़ाहट तथा गर्जनाएं, प्रचंड वेग और बवंडर व उग्रता सभी मदारी के पिटारे के समान वायुमंडल में विलुप्त हो रहे थे। ज्वालामुखी का मुख बंद हो गया। उसके धरातल पर पुनः हरियाली उगती दृष्टिगोचर होने लगी। उसपर पुनः कृषि-कार्य आरंभ हो गया। पुनः शांति, सुरक्षा और प्रेमभाव उभरने लगा। और अब इस ज्वालामुखी का पृष्ठभाग इतना सुकोमल और हरा-भरा दिखाई देने लगा कि कोई यह आशंका भी नहीं कर सकता कि उसके नीचे एक प्रचंड ज्वालामुखी विश्राम कर रहा है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 418