१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरण-3 समारोप अब यह ज्वालामुखी कुछ समय के लिए तो शांत हो ही गया है। फिर भी मैं समझता हूं कि पाठकों को यह जानने की इच्छा अवश्य होगी कि फीरोजशाह और राव साहब का तात्या के इस आत्मार्पण के उपरांत क्या बना? तात्या के विदा ले जाने के एक मास पश्चात् तक भी राव साहब पूर्ण वीरता सहित लड़ते रहे और जब कोई अन्य विकल्प न रह गया तो वे गुप्त रूप से जंगल की ओर निकल गए। किंतु तीन वर्ष के अज्ञातवास के पश्चात् वे बंदी बना लिये गए और उन्हें मृत्युदंड सुनाकर 20 अगस्त, 1862 को फांसी पर चढ़ा दिया गया। केवल फीरोजशाह ही अब वेश बदलकर घूमता रहा और सुदैव से वह भी हिंदुस्थान से बाहर निकल जाने में सफल हो गया। वह ईरान पहुंचा तथा करबला में जाकर रहने लगा। अब तक हम सन् 1857 के क्रांति-युद्ध का बारंबार उल्लेख करते रहे हैं। उससे अनेक प्रश्न भी हमारे समक्ष आ खड़े होते हैं। इनमें से भी एक प्रमुख प्रश्न यह है कि क्या क्रांति-युद्ध की संपूर्ण सिद्धता होने से पूर्व ही अकस्मात् इसका विस्फोट हो गया था? इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर है-नहीं। सन् 1857 की इस क्रांति के लिए जितनी तैयारियां और सिद्धताएं की गई थीं उतनी तो बड़ी-बड़ी शक्तिशाली सामंत और राजा-महाराजा, उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारी ही नहीं, अपितु नगर-के-नगर ही क्रांति 419