१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशंखनाद करने का स्वेच्छा सहित संकल्प व्यक्त कर रहे थे तो ऐसा कौन होगा जिसे तत्काल विप्लव का पुनीत प्रारंभ करने के संकोच की अनुभूति होगी? यह एक सुपरिचित तथ्य है कि किसी भी कार्य के आरंभ में ही अवरोध और बाधाएं उपस्थित होती हैं, उनपर विजय प्राप्त कर लिये जाने के पश्चात् संपूर्ण देश ही अपने आप उठ खड़ा होता है। इस दृष्टि से यह तथ्य सुस्पष्ट है कि क्रांतिकारियों के नेताओं ने किसी प्रकार के भी उतावलेपान का परिचय नहीं दिया था। वस्तुतः इतनी अनुकूल परिस्थिति में जो जाति खड़ी नहीं हो पाएगी वह तो कदापि विद्रोह नहीं कर सकेगी। परंतु अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि फिर यह क्रांति क्यों असफल हो गई? इस असफलता के छोटे-मोटे कारणों की चर्चा तो इस ग्रंथ में यथायोग्य स्थानों पर की ही जा चुकी है । किंतु इस महान् विप्लव की असफलता का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि यद्यपि क्रांति की पर्याप्त तैयारी की गई थी, किंतु तदुपरांत उत्पन्न होनेवाली परिस्थितियों का सामना कैसा किया जाएगा, इस संबंध में कोई आकर्षक और सुव्यवस्थित व्यवस्था नहीं की गई थी। अंग्रेज सत्ता को उखाड़कर नष्ट करने में तो सभी एकमत थे, किंतु उसके पश्चात् क्या होगा, इस संबंध में कोई सुनिश्चित योजना नहीं बनाई जा सकी थी। किंतु पहल के समान ही घातक मतभेदों और मुगलों तथा मराठों के पारस्परिक विवादों और वैरपूर्ण वायुमंडल के पुनः उद्भव का भय लोगों में व्याप्त था। इसलिए सर्वसाधारण में यह भावना व्याप्त हो गई थी कि व्यर्थ में ही अपना रक्त क्यों प्रवाहित किया जाए। उपर्युक्त आशंका के संदर्भ में ऐसी भावना का उत्पन्न हो जाना अस्वाभाविक भी तो नहीं था; क्योंकि इसी तानाशाही और अन्यायपूर्ण सत्ता से क्षुब्ध होकर तो जनता ने विदेशी शासन को पहले अपने ऊपर लादा था। क्रांति का प्रथम भाग अर्थात् विध्वंस का कार्य तो बड़ी सुगमता सहित पूर्ण हो गया; किंतु जब रचनात्मक और विधायक गतिविधियों का प्रारंभ होना था तो लोगों में पारस्परिक मतभेद और अविश्वास पुनः उभर आया। यदि जनता के अंतःकरण को आकर्षित करनेवाला और उसे प्रेरित करनेवाला कोई नवीन ध्येय और आदर्श उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाता तो क्रांति की प्रगति के समान ही उसका अंत भी उसके पुनीत प्रारंभ के समान ही यशस्वी और प्रभावशाली सिद्ध होता । यदि लोगों को इस तथ्य से पूर्णतः अवगत करा दिया जाता कि प्रलय के तुरंत पश्चात् ही पुनः नया सृजन और नवनिर्माण होता है तब क्रांति निश्चित रूप से ही सफलता प्राप्त करती। किंतु निर्माण तो दूर रहा, संहार कार्य भी तो हिंदुस्थान पूर्णरूप से नहीं कर पाया। इसका कारण क्या था? कारण यही था कि राष्ट्र का कंठ अपने व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु घोंटने की नीच प्रवृत्ति भारत से पूर्णरूप से नष्ट नहीं हो पाई थी। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि क्रांति की असफलता के मुख्यतः दो ही कारण थे। प्रथम यह कि अपनों के निकृष्टतम स्वराज्य की अपेक्षा अंग्रेजों का शांतिपूर्ण शासन भी स्वदेश के लिए अधिक हानिकारक है, इस तथ्य को भलीभांति न समझने के कारण ही अनेक मूर्खों द्वारा स्वदेश से द्रोह किया गया। क्रांति क असफलता का दूसरा प्रमुख कारण यह था कि 1857 का स्वातंत्र्य समर - 420