भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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प्रकरण-2 पूर्णाहूति दिनांक 20 जून को ग्वालियर की रणभूमि में हुए घनघोर संग्राम में रणलक्ष्मी लक्ष्मीबाई की पराजय हो गई थी। इस कारण अंग्रेजों को अपने एक दृढ़ निश्चयी शत्रु से मुक्ति मिल गई थी। किंतु अभी रानी से भी अधिक एक दृढ़ निश्चयी शत्रु, जो रण-कौशल में लक्ष्मीबाई की अपेक्षा अधिक सिद्धहस्त था, रणभूमि से पलायन कर अंग्रेजों को झांसा दे गया था। ग्वालियर की रणभूमि में वह 20 मई को ओझल हुआ था तो जावरा और अलीपुर की रणभूमि से भी बच निकलने में सफल हो गया। यत्र-तत्र तात्या टोपे कुद ही दिनों में मध्य हिंदुस्थान के सभी वन, गुफाएं, ग्राम, नगर, पर्वत सभी से प्रचंड रण-गर्जनाएं होने लगीं और यत्र-तत्र 'तात्या टोपे! तात्या टोपे' का ही स्वर गूंज उठा। इसका कारण यह था कि शिकारी के भालों से घिरा हुआ यह मराठा सिंह अब विवश होकर मध्य भारत के जंगलों में घुस गया था। ग्वालियर की रणभूमि में रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान हो जाने के कारण मानो उसका दाहिना हाथ ही कट गया था। अनेक पराजयों के फलस्वरूप क्रांति दब-सी गई थी। श्रीमंत नाना साहब से तो सदा के लिए ही बिछुड़ चुका था। कुछ भारतीयों के ही विश्वासघात के कारण अब अंग्रेजी सत्ता अपने अजेय होने का दंभ भर रही थी। इधर तात्या के पास न तो उत्तम सेना थी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 404