१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशिवाजी के अंतिम उत्तराधिकारी के योग्य, सुदृढ़, न्यायपूर्ण, आत्मभिमान और शान की शोभ बढ़ानेवाले ही ये शब्द हैं। बाजीराव द्वितीय की नपुंसकता के कलंक को रक्त ही शत्-शत् धाराओ से नहलाकर निष्कलंक कर दिया गया था और पेशवा का वह विशुद्ध राजसिंह चित्तौड़ की राजपूतानियों के समान लड़ते, झगड़ते, जलते तथा देदीप्यमान अग्नि ज्वालामालाओं को विस्फारित करते हुए विश्व के रंगमंच से विलुप्त हो गया। उनकी अंतिम आह इन्हीं शब्दों से निकली थी-‘'परकीय हिंदुस्थान के राजा और हम हिंदू-भूमि के ही पुत्र हिंदुस्थान में चोर बना दिए गए हैं।'' इस पत्र के लिखने के पश्चात् नाना साहब का क्या हुआ, इस संबंध में इतिहास मौन है। स्वेच्छा सहित अंगीकृत दरिद्रता में ही बाला साहब का इन्हीं दिनों वनों में ही स्वर्गवास हो गया। तदुपरांत अवध की बेगम और तरूण राजकुमार को नेपाल में अनुमति प्रदान कर दी गई। महान् हुतात्मा गजराज सिंह नामक एक अन्य क्रांतिकारी नेता भी बाद में हुए एक संघर्ष में देवलोकगामी हुआ। इस प्रकार अवध में क्रांतियुद्ध की इतिश्री हो गई। अपनी स्वतंत्रता हेतु अवध ने कितनी वीरता सहित संघर्ष किया था, इसका विवरण शत्रु द्वारा प्रस्तुत किए गए विवरण से ही पढ़ना उचित होगा। स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए इतने महान् हठ और पराक्रम सहित क्या विश्व के किसी अन्य देश ने संघर्ष किया होगा? मैलसन ने लिखा है-‘'सिपाहियों ने स्वतंत्रता के लिए जिस क्रांतियुद्ध का श्रीगणेश किया था उसमें अवध की प्रजा ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था। वे स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए जूझ पड़े। वे कितनी वीरता सहित संग्राम कर रहे थे, इसका विवरण हम प्रस्तुत कर चुके हैं। किंतु कितने दीर्घकाल तक अवध की जनता संग्राम करती रही उतनी वीरता से हिंदुस्थान के अन्य किसी भी अंचल में संग्राम नहीं हुआ था। सन् 1856 के मध्य से ही उनपर जो अत्याचार और अन्याय हुए थे, इससे उनका अंतःकरण इस्पात के समान कठोर हो गया था और उन्होंने सुदृढ़ संकल्प भी ग्रहण कर लिया था। सदा-कदा उन्हें मारकर पलायन भी करना पड़ जाता था। इस आशा से ही वे ऐसा करते थे कि किसी अन्य मारकर पलायन भी करना पड़ जाता था। इस आशा से ही वे ऐसा करते थे कि किसी अन्य दिवस वे विजय के लिए संघर्ष करेंगे। अंततः लॉर्ड क्लाइव ने अवध पर एक प्रचंड बवंडर के समान अंतिम आक्रमण किया। शेष बचे सैनिकों को नेपाल के वनों में आश्रय ढूंढ़ने पर विवश होना पड़ा। वहां भी जो वीर बचे रह गए थे, उन्होंने आत्मसमर्पण करने के स्थान पर उपवास करते हुए आत्मार्पण करना वरेण्य माना। दीर्घकाल तक चले इस संघर्ष में जब उन्हें विजय की कोई आशा नहीं रही तो अवध के श्रमिकों, कृषको, तालुकेदारों, भूमिधरों और व्यापारियों ने पराजय स्वीकार कर ली।‘’172 1857 का स्वातंत्र्य समर - 403 172 मैलसन कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 5, पृष्ठ 207 ।