भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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पर्याप्त विचार-विमर्श भी हुआ। विद्रोहियों से भेंट करने के लिए जब जंगबहादुर ने अपने एक सरदार कर्नल बलभद्र को भेजा तो उसे भी विद्रोहियों की सेना के प्रमुखों ने स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया कि "हम हिंदू धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। महाराज जंगबहादुर (नेपाल-नरेश) भी हिंदू ही हैं, अतः उन्हें हमारी सहायता अवश्य करनी चाहिए" तब उस सरदार ने उनसे प्रश्न किया कि "आपके कार्य करने का उद्देश्य क्या है?" इसके उत्तर में विद्रोही पक्ष के उस प्रतिनिधि ने उसे उत्तर दिया, "हमारे पास अभी भी साठ हजार लड़ाकू जवान हैं। जंगबहादुर ने अंग्रेजों को सहायता दी है; किंतु यदि वे हमें पचास लड़ाकू हजार गुरखा सैनिक दे दें तो मैं उन्हें अंग्रेजों की अपेक्षा दुगुना वेतन दे सकता हूं। यदि वे ऐसा न कर सकते हों तो हमें केवल अपने सुयोग्य सेनापति ही दे दें। मैं पुनः हिंदुस्थान में जाकर अंग्रेजों को कलकत्ता तक भगा सकता हूं और हम जो भी प्रदेश जीतेंगे, उसपर नेपाल राज्य का आधिपत्य होगा, और यदि हो सके तो उसके पश्चात् महाराज हमें अपने राज्य में आश्रय दे दें। हम उनके आज्ञाकारी बनकर वहां रहेंगे।" ये बातें सुनकर सरदार बलभद्र बोला, "किंतु ब्रिटिश सरकार तो कृपा-दृष्टि कर रही है, आप लोग उसके समक्ष आत्मसमर्पण क्यों नहीं कर देते?" इस पर क्रांतिकारी नेताओं ने उसे उत्तर दिया, "हमें अंग्रेजों की वह घोषणा सुन ली है। किंतु दूसरों को मृत्यु के मुख में धकेलकर हम अपनी जीवन-रक्षा करना नहीं चाहते। हम ब्रिटेन के समक्ष आत्मसमर्पण कदापि नहीं करेंगे।" इस प्रकार की अनेक वार्त्ताओं के उपरांत जंगबहादुर ने विद्रोहियों को स्पष्ट उत्तर दिया कि "यदि मुझे तुम्हारी सहायता ही करनी होती तो मैं लखनऊ में तुम लोगों की हत्या कराने हेतु अपनी सेनाएं ही क्यों भेजता?" इतना अधिक नीचतापूर्ण उत्तर देकर ही उसने बस नहीं की अपितु उसने अंग्रेजों को नेपाल में प्रवेश कर क्रांतिकारियों का शिकार करने की पूरी-पूरी छूट भी दे दी। अब सभी आरे से सर्वथा निराश होकर क्रांतिकारी सिपाही अपने-अपने शस्त्रास्त्र छिपाकर अपने घरों को जाने लगे। अब उन्हें उभारने में लाभ न होता देखकर अंग्रेजों ने भी उन्हें छेड़ने का प्रयास नहीं किया। जो क्रांतिकारी अपने घरों को न लौटे वे वन में ही उपवास कर आत्मार्पण करने लगे। इन्हीं दिनों नाना साहब ने प्रमुख ब्रिटिश सेनापति होप ग्रांट को भी एक पत्र लिखा था। अपने इस पत्र में उन्होंने ब्रिटिश कूटनीति की घोर भर्त्सना की तथा विस्तृत आलोचना करने के पश्चात् लिखा था-"What right have to occupy India and declare me an outlaw" (हिंदुस्थान पर राज्य करने का अधिकार तुम्हें किसने दिया है? तुम विदेशी हमारे राजा हो तो क्या मैं चोर हूं?) इतिहास ने नाना साहब के नाम पर ये ही अंतिम शब्द संगृहीत रखे हैं। ये शब्द क्या हैं, वस्तुतः बालाजी विश्वनाथ पेशवा के सिंहासन का अंतिम उच्छ्वास है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 402