१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 400, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंऔर न ही तोपें तथा धन ही। उसके पास तो रसद का भी अभाव था। इसे तो इन साधनों के कहीं से उपलब्ध होने की भी आशा नहीं थी, किंतु इस सारी स्थिति में ही अंकुंठित धैर्य रखनेवाला तात्या टोपे, संपूर्ण आपदाओं और विपरीत परिस्थितियों में भी झुका नहीं और नह ही उसने स्वतंत्रता के प्रतीक भगवा ध्वज को ही झुकने दिया। शत्रु के समक्ष अपनी मत्ताका झुकाना-नहीं, यह महापाप कदापि नहीं होगा; क्योंकि भगवा ध्वज का दंड ही ऐसे वृक्ष से निर्मित हुआ है कि उसे कभी शत्रु तोड़ तो सकता है, किंतु वह शत्रुओं के आगे झुक कदापि नहीं सकता। ग्वालियर और जावरा तथा अलीपुर में मिली पराजयों के पश्चात् अपनी बची खुची सेनाओं को लेकर तात्या और राव साहब पेशवा सरमथुरा नामक ग्राम में चले गए। यहीं उन्होंने अपनी संपूर्ण युद्ध योजना के तीन महत्त्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए। प्रथम यह कि अब किसी भी स्थान पर प्रत्यक्ष युद्ध नहीं लड़ा जाएगा। दूसरा सिद्धांत यह निर्धारित किया कि चाहे कोई भी स्थिति क्यों न हो, प्रत्यक्ष युद्ध न करते हुए छापामार युद्ध का अनुगमन कर अंग्रेजी सेना को छकाया जाएगा। परंतु इन दोनों निर्धारित सिद्धांतों को कार्यान्वित करने के लिए भी तो रसद और शस्त्रों की प्राप्ति अनिवार्य थी। इस समस्या का निदान करने हेतु तात्या ने तीसरा सिद्धांत यह निर्धारित किया कि मार्ग में जो भी देशी रियासतें मिलेंगी उनसे उनकी इच्छा से अथवा कठोरता सहित शस्त्रास्त्र और धन प्राप्त किया जाएगा। उत्तर और मध्य भारत में तो पग-पग पर देशी रियासतें विद्यमान थीं। प्रत्येक राज्य में ही वर्ष भर के लिए सैनिकों के लिए रसद तथा आवश्यक शस्त्रास्त्र जमा रहते थे। उस रसद और उन शस्त्रास्त्रों को प्रदेश की रक्षा में लगाना ही तो इन नरेशों का प्राथमिक कर्तव्य था। परंतु सन् 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम में इस भूमि और उसमें निवास करनेवाली अपनी प्रजा की इच्छा एवं दृढ़ आशा को फलीभूत करने के स्थान पर इन नरेशों ने अपने व्यक्तिगत लाभ को ही महत्त्व दिया था। इसी कारण ये क्रांतिकारियों के साथ खुला सहयोग नहीं कर सके थे। अतः उनके पास इस समय भी रसद और शस्त्रास्त्र निरूपयोगी होकर पड़े हुए थे। वे अपने राज्यों में उत्पन्न हुए अन्न को भी दबाकर बैठे थे। वे व्यर्थ ही संग्रह किए हुए थे और दूसरी ओर देशभक्त और स्वतः देशमाता भी दरिद्रता में जीवनयापन कर रही थी। ऐसी स्थिति में इन विश्वासघाती जमाखोरों को उत्तम योजना बनाई। अपनी इस योजना के द्वारा उन्होंने स्वातंत्र्य सैनिकों के भोजन के लिए खाद्य सामग्री और युद्ध का कोई दबाव न पड़ेगा, अपितु इन नरेशों से युद्ध-कर की वसूली की जाएगी। इन नरेशों के पास तो नाममात्र के लिए ही सेना थी, अतः उनपर यह 'युद्ध-कर' लादना भी कोई कठिन कार्य सिद्ध न होगा। साथ ही इन देशी राज्यों के पास-पास स्थित होने के कारण खाद्य सामग्री को एक स्थान से ढोकर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 405