१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरे स्थान पर ले जाने की कठिनाई भी नहीं उठानी पड़ेगी। इन दोनों सेनानियों ने निश्चय कर लिया था कि यदि उनके आह्वान मात्र से ये देशी नरेश उनकी योजना को स्वीकार कर लें तो अच्छा है, अन्यथा उन्हें ऐसा करने के लिए विवश किया जाएगा। इन्हीं तीन सिद्धांतों के आधार पर तात्या ने अपने नितांत विस्मयकारक रण-तांडव की संपूर्ण रचना की थी। किंतु अंग्रेजों की यह सहज कल्पना थी कि ऐसी विपन्न अवस्था में किसी भी मनुष्य का बहुत दिनों तक प्रयत्न करते रहना असंभव है। यही समझकर उन्होंने यह धारणा भी बना ली कि अलीपुर में उनका दबाव पड़ने के कारण तात्या के पलायन करते ही वहां से विद्रोह समाप्त हो गया है। इसके साथ ही उन्होंने तात्या को चारों ओर से घेरकर एक-डेढ़ मास में ही आत्मसमर्पण कर देने का विवश बनाने के लिए अपनी सेनाएं भी भेज दीं। ग्वालियर, झांसी, शिवपुरी और गुना-सभी ओर ब्रिटिश सेना छा गई थी, तो राजस्थान में भी रॉबर्ट ने अपनी सेना डटा दी थी। इस प्रकार अंग्रेजों की सेनाओं ने चारों ओर से ही अपनी व्यूह में तात्या को घेर लिया था और अब देखना यह था कि तात्या इस व्यूह से किस प्रकार निकलता है! तात्या की प्रथम दृष्टि भरतपुर पर केंद्रित हुई थी। किंतु वहां अंग्रेजी सेना के पहुंच जाने का समाचार प्राप्त होते ही उसने जयपुर की दिशा में अपने पग बढ़ा दिए। जयपुर के राजदरबार में तात्या से सहानुभूति रखनेवाले अनेक व्यक्ति तो थे ही, साथ ही वहां की सेना और जनता का झुकाव भी तात्या क ओर था। अतः तात्या ने वहां अपना दूत भेजकर अपने शुभचिंतकों को सावधान और सन्नद्ध रहने का निर्देश दिया। किंतु यह सूचना अंग्रेजी सेना के हाथ भी लग गई, अतः उसने तत्काल ही नसीराबाद से जयपुर की ओर प्रस्थान कर दिया। जयपुर की यह स्थिति देखकर तात्या ने दक्षिण दिशा में प्रस्थान कर दिया। उसके पीछे कर्नल होम्स भी अपनी सेना सहित लगा ही हुआ था। यहां तात्या टोपे ने अपने प्रचंड बुद्धि-कौशल का परिचय देते हुए इस सेना को झांसा दिया और टौंक राज्य पर धावा बोल दिया। वा'के नवाब ने नगर के द्वार पर बंद करा दिए और तात्या का प्रतिरोध करने के लिए अपने कुछ सैनिकों को चार तोपों सहित नगर के बाहर भेज दिया। भयंकर संग्राम हो सकता था, किंतु टौंक के इन सैनिकों ने नितांत ही मैत्रीपूर्ण ढंग से तात्या के सैनिकों का अभिनंदन किया। उन्होंने अपनी चारों तोपें भी तात्या को समर्पित कर दीं। इस प्रकार इस नवीन सेना और नवीन तोपों को प्राप्त कर तात्या ने निश्चिंत होकर दक्षिण दिशा में प्रस्थान कर दिया। तात्या टोपे ने इंद्रगढ़ पहुंचकर वहां कुछ समय विश्राम किया। किंतु उसके पीछे ही होम्स की सेना तथा दूसरी ओर से रॉबर्ट की सेना भी आ रही थी। उन दिनों घनघोर वर्षा की झड़ी लगी हुई थी, इस कारण चंबल भी जल से लबालब भरी अपने रोद्र रूप का प्रदर्शन कर रही थी। तात्या के पीछे से शत्रु बढ़ा आ रहा था तो सामने थी बाढ़ से परिपूर्ण चंबल नदी। तात्या उत्तर-पूर्व की ओर मुड़कर बूंदी जा पहुंचा। वहां से बड़ी चतुराई और सफलता सहित शत्रुओं को 1857 का स्वातंत्र्य समर -406