१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूलभूलैया में डालता हुआ वह नीमच और नसीराबाद के मध्य स्थित प्रदेश में जा पहुंचा, जहां की जनता पहले से ही क्रांति-यज्ञ में योगदान दे रही थी। यहां उसने पुनः अंग्रेजों को छकाने में सफलता प्राप्त की। उसने उन्हें ऐसा भुलावा दिया कि तात्या दक्षिण की ओर बढ़ रहा है, किंतु वह भीलवाड़ा जा पहुंचा। यह समाचार प्राप्त होते ही रॉबर्ट सरवर नामक ग्राम से बढ़ा और उसने तात्या की सेना पर आक्रमण कर दिया। 7 अगस्त को अंग्रेजों की सेना ने धावा बोला, किंतु तात्या ने दिन भर इस सेना को रोके रखने में सफलता पाई और रात्रि में ही वह अपनी सेना और तोपों सहित सुरक्षित उदयपुर राज्य की सीमा में स्थित कोटरा नामक ग्राम में जा पहुंचा। वहां अपनी सेना को विश्राम करने का अवसर देकर तात्या टोपे समीप ही स्थित ‘नाथद्वारा’ नाम के हिंदू तीर्थ क्षेत्र में भगवान् श्रीकृष्ण की पावन प्रतिमा के दर्शन करने जा पहुंचा। जब वह वहां से मध्य रात्रि में वापस लौटा तो उसे विदित हुआ कि उसका पीछा करती हुई ब्रिटिश सेना भी समीप आ पहुंची है। अतः उसने वहां से अपनी सेना को प्रस्थान करने का आदेश दे दिया। परंतु सैनिक इतने अधिक थक गए थे कि पैदल सैनिकों ने स्पष्टतः कह दिया कि सतत प्रवास करने के कारण पैदल सेना अब आगे बढ़ने में समर्थ नहीं है, अश्वारोही चाहें तो आगे जा सकते हैं। ऐसी स्थिति में तो युद्ध करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प ही नहीं रह गया था। दूसरे दिन अर्थात् 14 अगस्त को यथाशीघ्र सूर्योदय से पूर्व ही उसने अपनी सेना की यथासंभव व्यूह-रचना कर ली। तात्या की सेनाओं ने रॉबर्ट की सेनाओं से जमकर संघर्ष किया, किंतु अंग्रेजों की सेना के समक्ष उसे पराजित होकर तितर-बितर होना पड़ा। तात्या की सेना तोपें भी छोड़कर रणभूमि से हट गई और हटते-हटते लगभग पंद्रह मील दूर चली गई। अब पुनः तात्या टोपे की सेना तोपों से वंचित हो गई थी। किंतु विजय के उन्माद से उन्मत्त शत्रु अभी भी तात्या टोपे की सेना तोपों से वंचित हो गई थी। किंतु विजय के उन्माद से उन्मत्त शत्रु अभी भी तात्या का पीछा कर ही रहे थे। फिर भी तात्या अंग्रेजों को झांसा देकर चंबल की ओर बढ़ने लगा; किंतु अंग्रेजी सेना के उसपर हमले भी जारी रहे और चंबल नदी पर एक और ही दृश्य उपस्थित हो गया, जब एक अंग्रेज कमांडर अपने चुने हुए सैनिकों सहित चंबल के किनारे पर ही आ धमका। किंतु बाधाओं को खेल समझनेवाले तात्या का हौसला मंद नहीं हुआ, अपितु उसने अंग्रेजों को भी आश्चर्य में डाल दिया। उसने एक अंग्रेज अधिकारी को पीछे हटा दिया तो दूसरे को वंचिका दी और उसकी आंखों में धूल झोंकता हुआ तात्या मंजिल-पर-मंजिल पार करता हुआ चंबल नदी पर जा पहुंचा। इतना ही नहीं, उसने चंबल को पार भी कर लिया और अंग्रेज उसका रास्ता ही ताकते रह गए। अब अंग्रेजों और तात्या की सेनाओं के मध्य चंबल बह रही थी। किंतु तात्या के पास न तोपें थीं, न खाद्य सामग्री और न धन ही। इस प्रकार तात्या टोपे का पूर्ण पराभव हुआ था। अतः अब उसे नर्मदा का मार्ग छोड़कर झालरापाटाण की ओर प्रस्थान करना पड़ा। उस राज्य का अंग्रेजनिष्ठ नरेश भी नामर्द तो नहीं था। उसने अपनी विश्वासपात्र 1857 का स्वातंत्र्य समर - 407