१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसेना और जंगी तोपखाने सहित तात्या की सेना पर टूट पड़ने की ‘वीरता’ दिखाई। किंतु यह भी क्या चमत्कार था कि त्यों ही तात्या और अंग्रेजों के चाटुकार उस राजा की सेना के सैनिकों की आंखें चार हुईं, वे तात्या को ही ‘स्वामी’ कहकर उसका अभिवादन करने लगे। इस प्रकार वहां भी तात्या को पर्याप्त संख्या में घोड़े, गाड़ियां तथा रसद अर्पित कर दी गई। तात्या वहां खाली हाथ पहुंचा था, किंतु अब उसके पास बत्तीस तोपें हो गई थीं। राव साहब पेशवा का ओदश मिला कि झालरापाटण नरेश से पच्चीस लाख रूपए जुर्माने के रूप में वसूल किए जाएं। किंतु उसके अत्यधिक अनुनय-विनय करने पर पंद्रह लाख रूपए पर समझौता हो गया। तात्या टोपे वहां पांच दिन ठहरा और उसने अश्वारोही सैनिकों को तीस रूपए तथा पैदल सैनिकों को बीस रूपए मासिक के हिसाब से वेतन चुका दिया। अब तात्या, राव साहब और बांदा के नवाब ने दक्षिण की ओर बढ़ने के संबंध में विचार-विमर्श किया। पेशवा की इस सेना का प्रमुख लक्ष्य था नर्मदा नदी को पार कर दक्षिण भारत में प्रवेश। अंग्रेजों ने भी तात्या की योजना को असफल बनाने हेतु अपनी सेना की कुशलतापूर्ण और सुदृढ़ व्यूह-रचना करने में कोई कसर न छोड़ी। उन्होंने तात्या के आगे बढ़ सकने के सभी मार्गों को अवरुद्ध कर दिया। किंतु अब तो तात्या के पास भी तोपखाना था और साथ ही वह तो प्रत्येक आपदा और बाधा से टकराने को बहुत पहले से ही संकल्पबद्ध था। अतः उसने अपने सहयोगियों को आह्वान दिया-“चलो साथियों, इंदौर की ओर प्रस्थान करो।” यह कल्पना तात्या के साहसी स्वभाव के सर्वथा अनुरूप ही थी। जिस तात्या टोपे ने ग्वालियर की रणभूमि में अपने अद्भुत नाटक का प्रदर्शन किया था, उसके लिए इंदौर में होल्कर के सिंहासन को हिला देना कौन सा असंभव कार्य था! होल्कर उसके इस साहसपूर्ण कार्य में उसकी सहायता करता, यही उसका कर्तव्य था। किंतु उसने तो अपने कर्तव्य का पालन नहीं किया था। अतः पेशवा अब इंदौर से ऐसा कराने के लिए ही तो जा रहा था। इंदौर की सेना गुप्त रूप से तात्या के साथ थी। होल्कर का राजदरबार भी तात्या का समर्थक था। इसलिए महान् धैर्यवान् तात्या ने इंदौर प्रस्थान करने की योजना बनाई थी। अब तात्या ने तत्काल ही झालरापाटण से दक्षिण की ओर बढ़कर मालवा में प्रवेश किया और वह राजगढ़ ग्राम के पास खड़ा हुआ दृष्टिगोचर हुआ। अब तात्या का पीछा करते हुए रॉबर्ट, होम्स, पार्क, मिचेल, होप, लॉक, हॉर्ट आदि अंग्रेज सेनापतियों के नेतृत्व में अंग्रेजी सेनाएं चारों दिशाओं से बढ़ती आ रही थीं। तात्या के इंदौर पर आक्रमण करने के लिए बढ़ने के समाचार से ही उनके हृदय प्रकंपित हो उठे थे। कोई उज्जयिनी से बढ़ा तो कोई राजगढ़ की ओर से आ निकला, कोई मऊ की ओर से सरका तो कोई तलखेड़ की ओर से चढ़ दौड़ा। मिचेल ज्यों ही एक पहाड़ी चढ़ा तो उसकी दृष्टि दूसरी ओर पहाड़ी से उतरते हुए तात्या पर पड़ी। किंतु अब 1857 का स्वातंत्र्य समर -408