भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 418 में से

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पृष्ठ 404

अंग्रेजी सेना भी थककर इतनी चूर हो गई थी कि उसके लिए एक पग भी आगे रखना असंभव हो गया था। उसका दम फूल चुका था। तात्या ने अंग्रेजी सेना की इस हताश अवस्था का पूर्ण लाभ उठाया और वह आगे निकल गया। प्रातःकाल ही मिचेल पुनः उसके पीछे आ धमका। अब क्रांतिकारी थके हुए थे; किंतु फिर भी उन्हें युद्ध के लिए सिद्ध होना ही पड़ा। उस समय उनकी संख्या लगभग पांच-छह हजार थी और उनके पास उत्तम श्रेणी की तीस के लगभग तोपें भी थीं। नितांत ही आश्चर्य की बात है कि अंग्रेजी सेना के एक-डेढ़ हजार सैनिकों के धावा बोलते ही क्रांतिकारी अपनी तोपों का भी छोड़कर भागते हुए ही दिखाई दिए। यहीं पर तो तात्या टोपे और कुंवर सिंह की छापामार युद्धकला का उत्कृष्ट रहस्य मुखरित हो उठता है। अंग्रेजी सेना से खुले मैदान में युद्ध न करने के अपने निर्णीत सिद्धांत को भंग न होने देने के लिए हो तो तात्या की सेना ने हाथ में आए अपने निर्णीत सिद्धांत को भंग न होने देने के लिए ही तो तात्या की सेना ने हाथ में आए अनेक अवसर भी इच्छा सहित ही जाने दिए थे। अब तात्या की सेनाएं मैदान से हटकर बेतवा नदी के समीप स्थित वनखंड में जा घुसी थीं और दूसरी ओर सिरोजनगर के पास आ निकलीं थीं। सिरोज में पुनः तात्या टोपे को चार तोपें प्राप्त हो गई थीं। इसी समय वर्षा अपने पूर्ण भयंकर रूप का प्रदर्शन भी करने लग गई थी। अतः तात्या की सेनाओं को भी विश्राम करने का पूर्ण अवसर उपलब्ध हो गया था। आठ दिन के उपरांत तात्या ने उत्तर की ओर प्रस्थान किया; किंतु शिंदे के राज्य में स्थित ईसागढ़ ग्राम ने उसे रसद देना अस्वीकार कर दिया; अतः उसे वहां से बलात् रसद लेनी पड़ी और आठ तोपें भी उसके हाथ लग गईं। परंतु अब नर्मदा को पार करना तो दिन-प्रतिदिन पीछे हटता जा रहा था, क्योंकि तात्या और नर्मदा में अंतर बढ़ता ही जा रहा था। परंतु जब इतनी अंग्रेजी सेनाएं अकेले तात्या के पीछे ही लगी हुई हों तो फिर नर्मदा पार करने का ध्यान ही कैसे आ सकता है। 173 1857 का स्वातंत्र्य समर – 409 173 एक अंग्रेज लेखक कहता है-"फिर पीछे हटने का वह अनोखा क्रम आरंभ हो गया, जो दस मास तक चलता रहा। किंतु तात्या टोपे भी पराजय का उपहास उड़ाता जाता था और अब उसका नाम यूरोप भर में अनेक एंग्लो-इंडियन सेनापतियों की अपेक्षा अधिक प्रसिद्ध हो गया था। उसके समक्ष कोई साधारण समस्या तो विद्यमान नहीं थी। उसे पराजित एशियावासियों की सेना को संगठन-सूत्र में आबद्ध करना था, जिसका उससे कोई व्यक्तिगत संबंध भी नहीं था। और परस्पर भी तो वे सैनिक एक ही आधार पर एकता के सूत्र में आबद्ध थे। वह सूत्र था-समान द्वेष और समान भय। अंग्रेजों के नाम से द्वेष और उनके द्वारा फांसी के फंदों पर लटका दिए जाने की आशंका। ऐसी अस्त-व्यस्त सेना को भी एकता के सूत्र में पिरोकर उसे येन-केन प्रकारेण आगे बढ़ना पड़ता था। और वह भी इतनी तीव्र गति से कि उससे केवल उसका पीछा करनेवाले शत्रु ही स्तंभित नहीं रह जाते थे अपितु तात्या के प्रस्थान की रेखा से समकोण करके दौड़ लगानेवालों को भी दांतों तले उंगली दबानी पड़ती थी। अपने इस अर्द्ध संगठित गिरोह को उन्मादियों के तुल्य दौड़ते रखने के साथ ही तात्या को

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