भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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वह नर्मदा तट पर आ पहुंचा। आश्चर्यचकित संसार ने तात्या का जय-जयकार किया और तात्या टोपे ने अंततः नर्मदा को लांघ ही लिया। अब उसका प्रयाण दक्षिण की ओर हो रहा था। मैलसन ने लिखा है-‘तात्या ने जिस जिवट और हठ सहित अपनी योजना कार्यान्वित की उसकी प्रशंसा न करना असंभव है।’ इस संबंध में 17 जनवरी, 1859 के ‘लंदन टाइम्स’ का विवरण भी पठनीय है। उसने लिखा था-

”Our very remarkable friend, Tatia Tope is too troublesome and clever an enemy to be admired. Since last June he has kept central India in fervor. He has sacked stations, plundered treasuries, emptied arsenals, collected armies, lost them, fought battles, lost them, taken gunds from native prince, lost them; then, his motions were like forked lighting; and for weeks, he has marched 30 and 40 miles a day. He has crossed the Narmada to and fro. He has marched between our columns, behind them, and before them. Ariel was not more subtle aided by the best staged mechanism. Up mountains, over rivers, through ravines and vallies, amidst swamps, on he goes, backwards and forwards, sideways and zig-zag ways, now falling upon a post card and carrying off the Bombay mail, now looting a village, headed and burned yet evasive as proteus.” ”

अंततः मराठा सेना दक्षिण में जा पहुंची। होशंगाबाद के समीप नर्मदा नदी को पार कर तात्या नागपुर के समीप पहुंच गया है, यह समाचार प्राप्त होते ही केवल तीन प्रांतों में ही नहीं, इंग्लैंड मात्र में ही नहीं अपितु संपूर्ण यूरोप में एक ही स्वर निनादित हो उठा, “धन्य तात्या, धन्य-धन्य टोपे!” महाराष्ट्र तो उसके सान्निध्य की ही बाट जोह रहा था। हैदराबाद का निजाम, मद्रास का गवर्नर लॉर्ड हेरिस, बंबई का लॉर्ड एलफिंस्टन, कलकत्ता का लॉर्ड केनिंग तत्क्षण थर्रा उठे।175 तात्या ने रणचंडी का ऐसा अपूर्व पासा फेंका था, किंतु अब तो समय हाथ से निकल चुका था। यदि एक वर्ष पूर्व ही वह नर्मदा पार हो गया होता तो दृश्य कुछ और ही होता। अब तो सन् 1858 के अक्तूबर मास के मध्य में उसकी यह रण-चपलता केवल कौतुक का ही कारण सिद्ध हुई, उपयोगी अथवा जय-प्रदायनी नहीं। यत्र-तत्र उठी क्रांति की ज्वाला पर पानी पड़ चुका था। अब तो

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175 मैलसन ने अपने ग्रंथ ‘इंडियन म्युटिनी’, खंड 5 में पृष्ठ 238-40 पर लिखा है-“यह बात नितांत ही उल्लेखनीय है कि उस व्यक्ति का भतीजा सेना सहित महाराष्ट्र की धरती पर आ पहुंचा था, जिसे मराठों द्वारा अंतिम पेशवा का वास्तविक उत्तराधिकारी माना जाता था। निजाम राजनिष्ठ था; किंतु स्थिति बड़ी विचित्र थी। इससे पूर्व भी ऐसी घटनाएं हो चुकी थीं जिनका एक उदाहरण सिंधिया के मामले में उपलब्ध हुआ था। जब सर्वोच्च शासक ने राष्ट्र-भावनाओं को रोकने के प्रयास किए तो लोगों ने उसके विरूद्ध भ विद्रोह कर दिया। अतः यह असंभव ही था कि यह भय उत्पन्न न हो कि तात्या की सेना संपूर्ण महाराष्ट्र की जनता को उभार दे और तब शस्त्र-सज्ज लोगों का यह विद्रोह संपूर्ण दक्षिण की जनता को ही प्रभावित कर दे।”