१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
पृष्ठ 407, कुल 418 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंपूर्ण राष्ट्र भयंकर रक्तस्राव के उपरांत शिथिलगात्र व संज्ञाविमूढ होकर रह गया था। यद्यपि अभी भी उत्तरी हिंदुस्थान और राजस्थान में तात्या और उसकी सेना को ग्राम-ग्राम में लोग रसद और धन-धान्य अर्पित करते थे, वह वहां देशभक्त के रूप में पूजित और वंदनीय था, परंतु नागपुर में स्वयं मराठों के प्रदेश में लोग उसका योग देने में भय का अनुभव करते थे। किसी ने भी उसके महान् कार्य में योगदान नहीं दिया। हां, कुलकलंकिनी बाकाबाई की राजनिष्ठा के बीज से और कौन सी फसल उत्पन्न हो सकती थी। तब भी तात्या ने से संपूर्ण विपरीत स्थिति के बावजूद वहां ठहरने का निश्चय कर लिया। अब तात्या के समक्ष निजाम का राज्य था। वहां भी क्रांतिकारी थे जो स्वातंत्र्य युद्ध की ज्वाला को धधकाने की बाट जोह रहे थे, इधर पूना और खानदेश से भी अंग्रेजी सेनाएं चढ़ दौड़ी। मेलघाट, असीरगढ़, खानदेश, गुजरात, नागपुर आदि सभी दिशाओं से अनेक अंग्रेजी सेनाएं दक्षिण का द्वार बंद कर देने के लिए बढ़ रही थीं। किंतु ऐसी स्थिति में भी तात्या ने अपने अपूर्व धैर्य का परिचय देते हुए अपनी रणनीति का चमत्कार दिखाया। उसने अपना पीछा करनेवाली तथा घेरनेवाली सेनाओं को रोकथाम कर नर्मदा के उद्गम स्थल तक अपना रण-कौशल दिखाया, क्योंकि अब उसकी दृष्टि बड़ौदा पर गड़ी हुई थी। आगरा रोड से होकर अंग्रेजों की डाक-गाड़ियों को लूटता, तारयंत्रों को तोड़ता और अंग्रेज सेनाओं को झांसा देता हुआ तात्या नर्मदा की ओर बढ़ता रहा। नर्मदा के सभी घाटों पर शत्रु सेना के दल बादल-से मंडरा रहे थे, नदी के दोनों घाटों पर शत्रु सेना डटी हुई थी, किंतु नर्मदा को पार करने को उत्कट लगनेवाले तात्या का उत्साह मंद नहीं हुआ और वह करगूण नामक ग्राम में जा पहुंचा। वहां उसका अंग्रेज सेनापति मेजर संडरलैंड से डटकर संघर्ष हुआ। युद्ध अब अपने पूर्ण बीभत्स रूप को ग्रहण कर रहा था। उसी समय तात्या ने अपनी सेनाओं को आदेश दिया कि तत्काल गोली वर्षा बंद कर दो और नर्मदा में कूद पड़ो। उसका आदेश मिलते ही तात्या के सैनिक नर्मदा में कूद पड़े। अभी अंग्रेज यह विचारने में ही लगे हुए थे कि यह क्या हो रहा है और दूसरी ओर तात्या अपने अनुयायियों सहित नर्मदा को पार कर गया। यह प्रसंग आज तक भी युद्धों के इतिहास में एक अतुलनीय एवं नवीन आश्चर्यजनक घटना के रूप में स्मरण किया जाता है। मैलसन ने तो स्पष्ट रूप से लिखा है-“उनकी तोपें छीन ली गई थीं, किंतु तात्या के सैनिकों ने नितांत शीघ्रता सहित मार्ग तय करने का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया। इस कला में इन देशी सिपाहियों का कोई भी मुकाबला नहीं कर पाएगी। इस स्थित में भी तात्या ने बड़ौदा की ओर बढ़ने जाने का अपना लक्ष्य नहीं छोड़ा था। बड़ौदा के राजदरबार तथा सेना में भी नाना साहब के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 412