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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

संपूर्ण राष्ट्र भयंकर रक्तस्राव के उपरांत शिथिलगात्र व संज्ञाविमूढ होकर रह गया था। यद्यपि अभी भी उत्तरी हिंदुस्थान और राजस्थान में तात्या और उसकी सेना को ग्राम-ग्राम में लोग रसद और धन-धान्य अर्पित करते थे, वह वहां देशभक्त के रूप में पूजित और वंदनीय था, परंतु नागपुर में स्वयं मराठों के प्रदेश में लोग उसका योग देने में भय का अनुभव करते थे। किसी ने भी उसके महान् कार्य में योगदान नहीं दिया। हां, कुलकलंकिनी बाकाबाई की राजनिष्ठा के बीज से और कौन सी फसल उत्पन्न हो सकती थी। तब भी तात्या ने से संपूर्ण विपरीत स्थिति के बावजूद वहां ठहरने का निश्चय कर लिया। अब तात्या के समक्ष निजाम का राज्य था। वहां भी क्रांतिकारी थे जो स्वातंत्र्य युद्ध की ज्वाला को धधकाने की बाट जोह रहे थे, इधर पूना और खानदेश से भी अंग्रेजी सेनाएं चढ़ दौड़ी। मेलघाट, असीरगढ़, खानदेश, गुजरात, नागपुर आदि सभी दिशाओं से अनेक अंग्रेजी सेनाएं दक्षिण का द्वार बंद कर देने के लिए बढ़ रही थीं। किंतु ऐसी स्थिति में भी तात्या ने अपने अपूर्व धैर्य का परिचय देते हुए अपनी रणनीति का चमत्कार दिखाया। उसने अपना पीछा करनेवाली तथा घेरनेवाली सेनाओं को रोकथाम कर नर्मदा के उद्गम स्थल तक अपना रण-कौशल दिखाया, क्योंकि अब उसकी दृष्टि बड़ौदा पर गड़ी हुई थी। आगरा रोड से होकर अंग्रेजों की डाक-गाड़ियों को लूटता, तारयंत्रों को तोड़ता और अंग्रेज सेनाओं को झांसा देता हुआ तात्या नर्मदा की ओर बढ़ता रहा। नर्मदा के सभी घाटों पर शत्रु सेना के दल बादल-से मंडरा रहे थे, नदी के दोनों घाटों पर शत्रु सेना डटी हुई थी, किंतु नर्मदा को पार करने को उत्कट लगनेवाले तात्या का उत्साह मंद नहीं हुआ और वह करगूण नामक ग्राम में जा पहुंचा। वहां उसका अंग्रेज सेनापति मेजर संडरलैंड से डटकर संघर्ष हुआ। युद्ध अब अपने पूर्ण बीभत्स रूप को ग्रहण कर रहा था। उसी समय तात्या ने अपनी सेनाओं को आदेश दिया कि तत्काल गोली वर्षा बंद कर दो और नर्मदा में कूद पड़ो। उसका आदेश मिलते ही तात्या के सैनिक नर्मदा में कूद पड़े। अभी अंग्रेज यह विचारने में ही लगे हुए थे कि यह क्या हो रहा है और दूसरी ओर तात्या अपने अनुयायियों सहित नर्मदा को पार कर गया। यह प्रसंग आज तक भी युद्धों के इतिहास में एक अतुलनीय एवं नवीन आश्चर्यजनक घटना के रूप में स्मरण किया जाता है। मैलसन ने तो स्पष्ट रूप से लिखा है-“उनकी तोपें छीन ली गई थीं, किंतु तात्या के सैनिकों ने नितांत शीघ्रता सहित मार्ग तय करने का अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया। इस कला में इन देशी सिपाहियों का कोई भी मुकाबला नहीं कर पाएगी। इस स्थित में भी तात्या ने बड़ौदा की ओर बढ़ने जाने का अपना लक्ष्य नहीं छोड़ा था। बड़ौदा के राजदरबार तथा सेना में भी नाना साहब के 1857 का स्वातंत्र्य समर - 412

पक्ष के अनेक लोग थे। अतः वे तो तात्या के आगमन की बाट जोह रहे थे। तात्या राजपुर पहुंचा, जहां उसे घोड़े और धन भी मिला। दूसरे दिन उसने छोटा उदयपुर में प्रवेश किया, वहां से बड़ौदा केवल पचास मील की दूर रह गया था।'' अब यद्यपि बड़ौदा केवल पचास मील की ही दूरी पर रह गया था, किंतु अंग्रेजों की सेनाएं भी तो तात्या का निरंतर पीछा कर रही थीं। तात्या को चारों ओर से ही अंग्रेजी सेनाएं घेरने का प्रयास कर रही थीं। तात्या का पीछा करते हुए पार्क छोटा उदयपुर भी जा पहुंचा था। अतः तात्या को भी अब बड़ौदा की ओर बढ़ने का अपना विचार त्याग देना पड़ा और उसने अपनी सेना सहित उत्तर की ओर बढ़ते हुए बांसवाड़ा के जंगलों में प्रवेश किया। किंतु उसी समय ब्रिटेन की महारानी की घोषणा सुनकर बांदा के नवाब ने आत्मसमर्पण कर दिया। तात्या और राव साहब के समक्ष अब ऐसी विचित्र और कठिन परिस्थिति पैदा हो गई थी कि उससे निकल पाना भी असंभव-सा ही प्रतीत हो रहा था। दक्षिण में नर्मदा, पश्चिम में रॉबर्ट तथा उत्तर और पूर्व में अनुल्लंघनीय ढलान थी। इस विपरीत परिस्थिति में यदि राव साहब और तात्या टोपे आत्मसमर्पण भी कर देते तो उन्हें कौन दोषी ठहरा सकता था। किंतु वे वीर धन्य हैं, उन्होंने इस संकटापन्न अवस्था में भी आत्मसमर्पण की कायरतापूर्ण भावना को पास न फटकने दिया। एक अंग्रेज ग्रंथकार ने आश्चर्यचकित होकर इन वीरों का गुणगान करते हुए लिखा है-“किंतु ये दो ऐसे व्यक्ति थे जो इस घोर संकटपूर्ण परिस्थिति में भी नितांत शांति, वीरता और धैर्य सहित अपने जीवन के इस प्राणांतक संघर्ष का सामना करते रहे।'' किंतु तात्या ने कठिनाइयों के इस चक्रव्यूह को भी बेध डाला। वह 11 दिसंबर को जंगल से बाहर निकला और एक किलेदार से थोड़ी सी सहायता प्राप्त कर उदयपुर की दिशा में बढ़ चला। किंतु उसी समय कई अंग्रेजी सेनाओं ने भी उसपर आक्रमण कर दिया। अतः उसे पुनः वनखंड में शरण लेनी पड़ी। अब तात्या को एक सप्ताह से अधिक ठहरना असंभव ही हो गया था। यह स्पष्ट होता जा रहा था कि उसे शरण लेनी ही पड़ेगी। उसी समय क्रांतिकारी नेताओं में भी परस्पर यह चर्चा चलने लगी थी कि अब इस संघर्ष को समाप्त कर देना ही श्रेयस्कर होगा। अब तो वह वन भी वन नही रह गया था-वे चारों ओर से खदेड़कर उस स्थान पर बंद कर दिए गए-बल्कि महाराष्ट्र के सिंहों का पिंजरा ही बनकर रह गया। सभी दिशाओं से अंग्रेजों की सेनाओं के पाश मानो उसकी ग्रीवा को ही जकड़ते जा रहे थे। इस स्थिति में भी युद्ध को बंद कर देने का विचार इस मराठा वीर के मन में उत्पन्न नहीं हो पाया। एक दिन वह राव साहब के साथ प्रतापगढ़ की दिशा में बढ़ चला। अभी तात्या टोपे की सेनाएं वन प्रदेश से बाहर भी नहीं निकल सकी थीं कि मेजर रॉक ने उसका मार्ग अवरुद्ध कर दिया। तात्या ने किसी प्रकार की भी दुविधा में न पड़ते हुए उस पर आक्रमण कर दिया। यह आक्रमण 1857 का स्वातंत्र्य समर – 413

भी इतना प्रचंड था कि रॉक के सैनिक आश्चर्यचकित रह गए। इस भांति जंगला तोड़कर इस मराठा सिंह ने एक बार पुनः अंग्रेजों पर आघात किया। यह आघात ऐसा था कि अंग्रेज सेनापति भी लज्जा से सिर झुकाए और हाथ मलते ही रह गए। 25 दिसंबर को तात्या टोपे बांसवाड़ा के वनखंड से बाहर आया। उसी समय अवध का प्रख्यात वीर शहजादा फीरोजशाह भी अपनी सेना सहित तात्या की सहायता करने के लिए आ रहा था। स्थानाभाव के कारण यहां फीरोजशाह ने गंगा और यमुना को पार कर जिस प्रचंड शौर्य का प्रदर्शन किया उसका विवरण प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है। शिंदे के एक दरबारी मान सिंह, फीरोजशाह, तात्या एवं राव साहब की 13 जनवरी, 1849 को इंद्रगढ़ में भेंट हुई। इन चारों नेताओं ने यहां एकत्रित होकर आगामी कार्यक्रम पर विचार-विमर्श किया। अंग्रेजों की साधारण सी गतिविधियों की सूचना भी तात्या को मिलती रहती थी। जब उसे यह विदित हुआ कि अंग्रेज पुनः चारों ओर से घेरा डालते आ रहे हैं तो वह बड़ी निर्भीकता से मंजिल तय करता हुआ देवास जा निकला। किंतु वहां भी वह चारों दिशाओं से बढ़ी आ रही अंग्रेज सेनाओं के व्यूह में घिर गया। अब उसकी यश-प्राप्ति की आशा तो किंचित् मात्र भी नहीं रह गई थीं, अतः कोई साहसी योजना बनाने का विचार ही करना निरर्थक था। अब उसके लिए अपनी थकी हुई सेना को अंग्रेजों की इस व्यूह-रचना से निकाल पाना ही कठिन हो गया था। अंग्रेज सेनापति भी दंभ से अकड़े हुए यह घोषणा कर रहे थे कि "देखें, अब यह कैसे बचकर निकलता हैं" अब तो क्रांतिकारियों के चारों नेता फीरोजशाह, मान सिंह, तात्या टोपे और राव साहब पर अंग्रेजों ने अपना जाल पूर्णरूपेण कस दिया था। 16 जनवरी, 1849 को तात्या, राव साहब तथा फीरोजशाह आगामी योजना पर विचार-विमर्श कर ही रहे थे कि बाहर कुहराम मच गया। तात्या ने तत्काल अनुमान लगाया कि अब उन्हें अंग्रेजों ने पूर्णतः घेर लिया है। उसने बाहर आकर देखा कि संपूर्ण छावनी में गोरों ने कुहराम मचा दिया है। गोरे सैनिक आनंद से झूमते हुए चीख उठे, "तात्या ने तत्काल अनुमान लगाया कि अब उन्हें अंग्रेजों ने पूर्णतः घेर लिया है। उसने बाहर आकर देखा कि संपूर्ण छावनी में गोरों ने कुहराम मचा दिया है। गोरे सैनिक आनंद से झूमते हुए चीख उठे, "तात्या मिल गया! किंतु उनकी वह चिल्लाहट क्षण भर में ही लुप्त हो गई। वे यही कहते रह गए कि अभी-अभी तो वह यहां था, अब कहां खिसक गया? 'दौड़ो सैनिकों, दौड़ो और खोजो' की चीख ही सुनाई पड़ी, किंतु तात्या कहीं न मिला। अंग्रेज सैनिकों की पूर्ण सतर्कता भी तात्या टोपे की चाल के समक्ष निढाल हो गई। तात्या मानो पंख लगाकर उड़ गया और अंग्रेज सैनिक और सेनापति क्रोध से सिर पटककर ही रह गए। अब 21 जनवरी को राव साहब, फीरोजशाह और तात्या अपने अन्य सहयोगियों सहित अलवर के समीप सीकर नाम ग्राम में उपस्थित हुए। अंग्रेज पुनः पागल होकर उनका पीछा करने में लग गए। अंग्रेज सेनापति होम्स की सेनाओं और क्रांतिकारियों में मुठभेड़ हुई, जिसमें क्रांतिकारी पराजित हो गए। किंतु इस पराजय ने क्रांतिकारियों को 1857 का स्वातंत्र्य समर - 414

हताश नहीं किया, क्योंकि उनकी विजय की आशाएं तो पहले ही नष्ट हो चुकी थीं। किंतु अब उनमें प्रतिकार की शक्ति नहीं रह गई थी। नर्मदा को पार कर बड़ौदा पर आक्रमण करने की तात्या की योजना भी अब समाप्त ही हो गई थी। अब तात्या और राव साहब ने अपनी छापामार युद्धकला में कुछ सुधार करने के संबंध में विचार-विमर्श किया और कुछ निश्चय करने पश्चात् तात्या और राव साहब ने अपनी सेनाओं से विदाई ले ली। तात्या के साथ केवल दो अश्व, एक टट्टू, दो ब्राह्मण रसोदए और एक नौकर था। अपने इस परिवार के साथ वे ग्वालियर के सरदार मान सिंह के पास पहुंचे। सरदार मान सिंह उन दिनों पारौन के वनों में शरण ले रहा था। मान सिंह ने उनसे कहा, "तात्या, तुमने अपनी सेना को छोड़कर यहां आने में भूल की है।" तात्या ने उत्तर दिया, "चाहे अच्छा हुआ अथवा बुरा, मैं तो अब तुम्हारे साथ ही रहने का निश्चय करके आया हूं। अब मैं तो इन प्राणलेवा पलायनों से बहुत अधिक थक गया हूं।" अंग्रेजों को भी यह सूचना मिल गई कि तात्या टोपे मान सिंह के पास रह रहा है। अंग्रेज प्रत्यक्ष युद्ध में उसे बंदी बनाने में असफल हो चुके थे। अतः उन्होंने छल-कपट के नीच हथकंडों को अपनाने को योजना बनाई। उन्होंने अपना एक दूत भी मान सिंह के पास भेजा और उसके माध्यम से यह कहलवाया गया कि यदि मानसिंह तात्या को पकड़वा दे तथा आत्मसमर्पण कर दे तो उसे क्षमा प्रदान की जा सकती है। इतना ही नहीं, शिंदे से यह भी कहा जाएगा कि वह नरवर राज्य उसे दे दे। इसी मान सिंह ने पहले अपने चाचा को भी अंग्रेजों को सौंप देने की कायरता प्रदर्शित की थी। वह इस प्रलोभन में फंसकर अंग्रेजों को सौंप देने की कायरता प्रदर्शित की थी। वह इस प्रलोभन में फंसकर अंग्रेजों के झांसे में आ गया। उसने तात्या आत्मसमर्पण कर देने का आग्रह किया तो वीरवर तात्या ने उसके इस प्रस्ताव को घृणा सहित ठुकरा दिया। उसी समय फीरोजशाह का एक पत्र भी तात्या को मिला था, जिसमें उसने तात्या को अपनी छावनी में आ जाने का निमंत्रण दिया था। तात्या ने यह पत्र मान सिंह को दिखाया और उससे परामर्श किया कि "मैं वहां जाऊं अथवा नहीं, इस संबंध में तुम्हारे परामर्श के अनुसार ही कार्य करूंगा।" किंतु नीच मानसिंह ने उससे कहा कि "आपको अभी कुछ दिनों यहीं ठहरना चाहिए, फिर इस संबंध में निश्चय कर लिया जाएगा।" तात्या ने ताड़ लिया कि मान सिंह को अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण करना है; किंतु इसपर भी वह यह समझता था कि मेरे संबंध में मान सिंह की नीयत में कोई अंतर नहीं आ पाया है। मान सिंह ने उससे कहा कि "मेरे वापस लौटने तक आप उस स्थान पर रहो जहां मेरा एक व्यक्ति आपको ले जाएगा।" उसके द्वारा बताए गए स्थान को सुरक्षित समझकर तात्या टोपे तीन दिन तक वहां रहा।" तीसरा दिन हुआ और सहस्त्रों युद्धों में शत्रु को नाकों चने चबवानेवाला वीर मराठा सेनानी, जो अब तक अनेक प्राणघातक संकटों और कष्टों 1857 का स्वातंत्र्य समर - 415

में भी अपनी चतुरता और रण-कौशल के कारण शत्रुओं के हाथ में नहीं आ पाया था, उस विश्वासघाती मान सिंह द्वारा ही बंदी नवा दिया गया। मान सिंह तात्या को वहां रहने का परामर्श देकर सीधी अंग्रेजों की शरण में गया था। उन्होंने तात्या को बंदी बनाने के लिए बंबई की अंग्रेजी सेना को इस विश्वासघाती के साथ भेजा था, तात्या के प्रति प्रत्येक भारतीय के मन में जो महान् आदर भावना विद्यमान थी, उसके कारण अंग्रेज किसी भारतीय पर विश्वास नहीं कर पाते थे। अतः बंबई के इन सैनिकों को केवल इतना निर्देश दिया गया था कि "मान सिंह जिस अभियुक्त को बंदी बनाने का निर्देश दे, उसे तुम्हें बंदी बनाकर ले आना होगा।" मान सिंह उन सैनिकों सहित पारौन के वनखंड में जा पहुंचा। तात्या को उसने तीन दिन पश्चात् ही वापस आने की बात कही थी और वह अपने कथनानुसार ठीक समय पर वापस आ पहुंचा था। जिस स्थान पर मान सिंह द्वारा भेजे गए आदमी द्वारा तात्या को ले जाया गया था, तात्या वहां विश्राम कर रहा था और जिस समय मान सिंह वहां पहुंचा उस समय वह प्रगाड़ निद्रा में लीन था। नराधम मान सिंह ने अपने साथ लाए हुए शिकारी कुत्तों को इस नर केसरी पर छोड़ दिया था। तात्या के नेत्र जब खुले तो उसने अपने आपको अंग्रेजों के बंदी के रूप में पड़ा हुआ देखा। यह घटना 7 अप्रैल, 1849 को अर्धरात्रि में घटित हुई। दूसरे दिन प्रातः काल ही उसे शिवपुरी में जनरल मीड की छावनी में कड़े पहरे के बीच ले जाया गया। यहां सैनिक न्यायलय लगा और उसमें तात्या के विरूद्ध ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध विद्रोह करने का आरोप लगाया गया। बुधवार को इन आरोपों का उत्तर देते हुए तात्या ने कहा- "मैंने जो भी कार्य किया है, अपने स्वामी के निर्देशानुसार किया है। कालपी तक मैंने नाना साहब के आदेशों के अनुसार ही आचरण किया। तदुपरांत मैंने राव साहब का आदेश माना। न्याय के अनुसार लड़े गये युद्धों अथवा मुठभेड़ों को छोड़कर मैंने अथवा नाना साहब ने एक भी यूरोपियन पुरूष, स्त्री अथवा बालक की निरर्थक हत्या नहीं की और न ही किसी को फांसीपर ही लटकाया। इससे अधिक मैं इस न्यायालय के समक्ष अन्य कोई भी बात कहने को तैयार नहीं हूं।" अंग्रेज के विशेष अनुरोध पर तात्या ने क्रांति के पुनीत प्रारंभ से लेकर उस दिन तक ही घटनाओं का प्रतिदिन का वृत्त भी संक्षेप में बता दिया। लिपिक ने उसके द्वारा दिए गए संपूर्ण विवरण को लिपिबद्ध कर लिया। तदुपरांत इस दैनिक कार्यक्रम और वक्तव्य को उसे पढ़कर सुनाया गया और उसे सुनने के पश्चात् तात्या टोपे ने उसके नीचे सुंदर रोमन अक्षरों में लिख-दिया TATIA TOPE । किंतु अंग्रेजों द्वारा उससे जो प्रश्न पूछे गए उनका उत्तर में उससे कोई प्रश्न पूछते थे तो वह बड़ी ही शांतिपूर्ण मुद्रा में उत्तर देता था, "मुझे पता नहीं।" 1857 का स्वातंत्र्य समर - 416

तीन दिन तक तात्या से इसी प्रकार पूछताछ की जाती रही। भारतीयों के झुंड-के-झुंड इस महान् वीर के दर्शनार्थ एकत्र होते थे, किंतु उन्हें दर्शन करने से वंचित रखा जाता था। जिनको उसे दर्शन करने की अनुमति प्राप्त हो जाती थी वे बड़े ही आदर सहित नतमस्तक होकर उसका अभिवादन करते थे। जिस समय अंग्रेजों ने तात्या को सूचित किया कि सैनिक न्यायालय उसके मामले में निर्णय देगा तो उसी समय उन्होंने यह भी कहा था कि वह अपने बचाव के लिए आवश्यक प्रमाण संगृहीत कर ले। उसी समय इस महा वीर क्रांति योद्धा ने अंग्रेजों को एक ही उत्तर दिया, "मैंने अंग्रेजों के विरूद्ध युद्ध किया है और मैं भलीभांति जानता हूं कि मुझे आत्माहुति देने के लिए तत्पर रहना चाहिए। मुझे तुम्हारे न्यायालय के निर्णय अथवा जांच से कोई सरोकार नहीं हैं।'" इस वीर मराठा के हाथों में बेड़ियां पड़ी हुई थीं, किंतु इस पर भी अपने हाथों को ऊंचा करते हुए इस महान् योद्धा ने घोषणा की-‘इन हथकड़ियों से मुक्त होने की मुझे एकमात्र आशा यही है कि तोप का गोला या फांसी का फंदा चूमते ही ये दूर हो जाएंगी। परंतु मैं तुम्हें एक बात बता देना चाहता हूं कि ग्वालियर में मेरा परिवार रह रहा है और उसका मेरे इन कार्यों से तनिक सा भी संबंध नहीं है। अतः मेरे कार्यों के बदले मेरे पिताजी अथवा पारिवारिक जनों को तनिक सा भी त्रास देना उचित नहीं होगा।‘’ जांच-पड़ताल और पूछताछ का नाटक समाप्त हो गया। तात्या टोपे को फांसी का दंड सुना दिया गया। दोपहर के चार बजे थे कि उसे तीसरी बंगाल गोरी सेना के कड़े पहरे में वध-स्तंभ के समीप लाया गया। फांसी के तख्ते के समीप आने पर सैनिकों ने व्यूह बनाकर इस महान् सेनानी को चारों ओर से घेर लिया। इस अवसर पर भारतीय पैदल सैनिक, अश्वारोही तथा अन्य दर्शकों की एक भारी भीड़ वहां एकत्र हो गई थी। तात्या ने अंग्रेजों से पुनः एक बार आग्रह किया कि उसके वृद्ध पिताजी को किसी प्रकार से भी त्रस्त न किया जाए। तात्या को दंड सुना दिया गया। तात्या के पैरों में पड़ी बेड़ियां काट दी गईं। वह नरपुंगव निस्संकोच होकर धीरे-धीरे वध-स्तंभ तक पहुंचा और बड़ी ही तीव्र गति से सीढ़ियों पर जा चढ़ा। नियमानुसार अब वधिक उसके हाथ-पैर बांधने के लिए वहां पहुंचे। उस समय तात्या ने हंसते हुए उन्हें कहा, "ऐसा करने की किंचित मात्र भी आवश्यकता नहीं है।" यह कहकर उसने स्वयं फांसी के फंदे को हार के समान अपने गले में पहन लिया। फंदा कसा गया और एक झटके के साथ तख्ता गिर पड़ा। और इस प्रकार पेशवा का राजनिष्ठ सेवक, सन् 1857 के स्वातंत्र्य समर का महान् नायक, हिंदुस्थान का निर्भीक वीर, धर्मरक्षक, देशाभिमानी और कुशल सेनापति तात्या टोपे का निर्जीव शरीर अंग्रेजों द्वारा निर्मित फांसी की टिकटिकी पर झूलता दृष्टिगोचर हुआ। वध मंच रक्त से सराबोर हो गया तो संपूर्ण देश के नेत्रों से अश्रुधाराएं प्रवाहित हो उठीं। समग्र हिंदुस्थान ही अश्रुओं से भीग गया। स्वदेश की सेवा के लिए उसने महान् 1857 का स्वातंत्र्य समर - 417

और अवर्णनीय कष्टों को सहन किया था, यही तात्या का एकमात्र दोष था। उसे इस देशभक्ति का पारितोषिक एक विश्वासघाती द्वारा उसके साथ किए गए विश्वासघात और नीचता के रूप में मिला था। अंग्रेजों ने उसे किसी रक्तपिपासु दस्यु के समान वधस्तंभ पर लटकाया था। है महावीर तात्या! तुमने इस अभागे देश में जन्म ही क्यों ग्रहण किया? इन विश्वासघाती नराधमों और महामूर्खों की स्वतंत्रता के लिए तुमने संघर्ष का आह्वान क्यों किया? तात्या टोपे, तुम्हारे लिए हमारे नेत्रों से जो अश्रुधाराएं प्रवाहित हो रही हैं, क्या तुम उन्हें देख रहे हो? हां, तुम्हें रक्तदान का प्रतिदान हम अभागे और निर्बल अश्रु बहाकर ही तो दे रहे हैं। हे नरवीर! तुमने भी यह कैसा घाटे का सौदा किया! तात्या की निष्प्राण देह को फांसी के फंदे से झूलता हुआ देखकर अपने पराक्रम पर समाधान व्यक्त करते हुए शूरवीर अंग्रेज अब वापस लौट रहे थे। तात्या की नश्वर काया इसी स्थिति में भगवान् सूर्यदेव के अस्ताचलगामी होने तक लटकती रही। वहां खड़े पहरेदार भी जब चले गए तब भीड़ को चीरते हुए यूरोपियन प्रेक्षक आगे बढ़े और उनमें इस महान् राष्ट्रभक्त के केशों के गुच्छे स्मृतिस्वरूप अपने पास रखने की पहल करने की होड़ लग गई। सन् 1857 के स्वातंत्र्य युद्ध के इस होमकुंड में तात्या के बलिदान के रूप में यह अंतिम आहूति पड़ गई थी। इस प्रकार वह भयंकर ज्वालामुखी जिसने अपने विस्तीर्ण मुख के क्रोध के आवेग में मांस, रक्त, लाखों, गड़गड़ाहटों और दग्ध लाल-लाल उष्ण लावा रस को उगला था, अब अपना मुख बंद कर रहा था। उसकी तलवार रूपी जीभें अब पुनः म्यान रूपी जबड़ों में समाती जा रही थीं। अब उसकी कड़कती बिजलियां और कर्णभेदी गड़गड़ाहट तथा गर्जनाएं, प्रचंड वेग और बवंडर व उग्रता सभी मदारी के पिटारे के समान वायुमंडल में विलुप्त हो रहे थे। ज्वालामुखी का मुख बंद हो गया। उसके धरातल पर पुनः हरियाली उगती दृष्टिगोचर होने लगी। उसपर पुनः कृषि-कार्य आरंभ हो गया। पुनः शांति, सुरक्षा और प्रेमभाव उभरने लगा। और अब इस ज्वालामुखी का पृष्ठभाग इतना सुकोमल और हरा-भरा दिखाई देने लगा कि कोई यह आशंका भी नहीं कर सकता कि उसके नीचे एक प्रचंड ज्वालामुखी विश्राम कर रहा है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 418

प्रकरण-3 समारोप अब यह ज्वालामुखी कुछ समय के लिए तो शांत हो ही गया है। फिर भी मैं समझता हूं कि पाठकों को यह जानने की इच्छा अवश्य होगी कि फीरोजशाह और राव साहब का तात्या के इस आत्मार्पण के उपरांत क्या बना? तात्या के विदा ले जाने के एक मास पश्चात् तक भी राव साहब पूर्ण वीरता सहित लड़ते रहे और जब कोई अन्य विकल्प न रह गया तो वे गुप्त रूप से जंगल की ओर निकल गए। किंतु तीन वर्ष के अज्ञातवास के पश्चात् वे बंदी बना लिये गए और उन्हें मृत्युदंड सुनाकर 20 अगस्त, 1862 को फांसी पर चढ़ा दिया गया। केवल फीरोजशाह ही अब वेश बदलकर घूमता रहा और सुदैव से वह भी हिंदुस्थान से बाहर निकल जाने में सफल हो गया। वह ईरान पहुंचा तथा करबला में जाकर रहने लगा। अब तक हम सन् 1857 के क्रांति-युद्ध का बारंबार उल्लेख करते रहे हैं। उससे अनेक प्रश्न भी हमारे समक्ष आ खड़े होते हैं। इनमें से भी एक प्रमुख प्रश्न यह है कि क्या क्रांति-युद्ध की संपूर्ण सिद्धता होने से पूर्व ही अकस्मात् इसका विस्फोट हो गया था? इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर है-नहीं। सन् 1857 की इस क्रांति के लिए जितनी तैयारियां और सिद्धताएं की गई थीं उतनी तो बड़ी-बड़ी शक्तिशाली सामंत और राजा-महाराजा, उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारी ही नहीं, अपितु नगर-के-नगर ही क्रांति 419

शंखनाद करने का स्वेच्छा सहित संकल्प व्यक्त कर रहे थे तो ऐसा कौन होगा जिसे तत्काल विप्लव का पुनीत प्रारंभ करने के संकोच की अनुभूति होगी? यह एक सुपरिचित तथ्य है कि किसी भी कार्य के आरंभ में ही अवरोध और बाधाएं उपस्थित होती हैं, उनपर विजय प्राप्त कर लिये जाने के पश्चात् संपूर्ण देश ही अपने आप उठ खड़ा होता है। इस दृष्टि से यह तथ्य सुस्पष्ट है कि क्रांतिकारियों के नेताओं ने किसी प्रकार के भी उतावलेपान का परिचय नहीं दिया था। वस्तुतः इतनी अनुकूल परिस्थिति में जो जाति खड़ी नहीं हो पाएगी वह तो कदापि विद्रोह नहीं कर सकेगी। परंतु अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि फिर यह क्रांति क्यों असफल हो गई? इस असफलता के छोटे-मोटे कारणों की चर्चा तो इस ग्रंथ में यथायोग्य स्थानों पर की ही जा चुकी है । किंतु इस महान् विप्लव की असफलता का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि यद्यपि क्रांति की पर्याप्त तैयारी की गई थी, किंतु तदुपरांत उत्पन्न होनेवाली परिस्थितियों का सामना कैसा किया जाएगा, इस संबंध में कोई आकर्षक और सुव्यवस्थित व्यवस्था नहीं की गई थी। अंग्रेज सत्ता को उखाड़कर नष्ट करने में तो सभी एकमत थे, किंतु उसके पश्चात् क्या होगा, इस संबंध में कोई सुनिश्चित योजना नहीं बनाई जा सकी थी। किंतु पहल के समान ही घातक मतभेदों और मुगलों तथा मराठों के पारस्परिक विवादों और वैरपूर्ण वायुमंडल के पुनः उद्भव का भय लोगों में व्याप्त था। इसलिए सर्वसाधारण में यह भावना व्याप्त हो गई थी कि व्यर्थ में ही अपना रक्त क्यों प्रवाहित किया जाए। उपर्युक्त आशंका के संदर्भ में ऐसी भावना का उत्पन्न हो जाना अस्वाभाविक भी तो नहीं था; क्योंकि इसी तानाशाही और अन्यायपूर्ण सत्ता से क्षुब्ध होकर तो जनता ने विदेशी शासन को पहले अपने ऊपर लादा था। क्रांति का प्रथम भाग अर्थात् विध्वंस का कार्य तो बड़ी सुगमता सहित पूर्ण हो गया; किंतु जब रचनात्मक और विधायक गतिविधियों का प्रारंभ होना था तो लोगों में पारस्परिक मतभेद और अविश्वास पुनः उभर आया। यदि जनता के अंतःकरण को आकर्षित करनेवाला और उसे प्रेरित करनेवाला कोई नवीन ध्येय और आदर्श उसके समक्ष प्रस्तुत किया जाता तो क्रांति की प्रगति के समान ही उसका अंत भी उसके पुनीत प्रारंभ के समान ही यशस्वी और प्रभावशाली सिद्ध होता । यदि लोगों को इस तथ्य से पूर्णतः अवगत करा दिया जाता कि प्रलय के तुरंत पश्चात् ही पुनः नया सृजन और नवनिर्माण होता है तब क्रांति निश्चित रूप से ही सफलता प्राप्त करती। किंतु निर्माण तो दूर रहा, संहार कार्य भी तो हिंदुस्थान पूर्णरूप से नहीं कर पाया। इसका कारण क्या था? कारण यही था कि राष्ट्र का कंठ अपने व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु घोंटने की नीच प्रवृत्ति भारत से पूर्णरूप से नष्ट नहीं हो पाई थी। इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि क्रांति की असफलता के मुख्यतः दो ही कारण थे। प्रथम यह कि अपनों के निकृष्टतम स्वराज्य की अपेक्षा अंग्रेजों का शांतिपूर्ण शासन भी स्वदेश के लिए अधिक हानिकारक है, इस तथ्य को भलीभांति न समझने के कारण ही अनेक मूर्खों द्वारा स्वदेश से द्रोह किया गया। क्रांति क असफलता का दूसरा प्रमुख कारण यह था कि 1857 का स्वातंत्र्य समर - 420

स्वदेशवासियों के विरूद्ध विदेशी शत्रुओं को किंचित् मात्र भी सहायता न देने की प्रेरणा प्रदान करनेवाली प्रामाणिकता भी लोगों में नहीं थी। इस कारण भी उन्होंने स्वदेश बंधुओं से ही विश्वासघात भी किया।¹⁷⁶ इस प्रकार क्रांति की असफलता का संपूर्ण पाप उन देशद्रोहियों के ही सिर पर आ जाता है। यदि अधिक स्पष्ट, अधिक सरल, अधिक आकर्षक आदर्श उस समय जनता के समक्ष होता तो ये विद्रोही ही देशभक्त के रूप में परिणत हो जाते; क्योंकि यदि देशभक्ति ही लाभदायक और स्वार्थ की पूर्ति में साधक सिद्ध हो तो जान-बूझकर देशद्रोह का कलंकपूर्ण कृत्य कौन करेगा? वास्तव में महान् यश के भागीदार वे हैं जिन वीरों ने इस तथ्य को हृदयंगम कर स्वातंत्र्य समर में भाग लिया था कि अपने निकृष्ट स्वशासन से भी विदेशी सत्ता और शासन निकृष्टतम होती है, फिर चाहे वह स्वराज्य गणतंत्र हो अथवा एकतंत्र, राजतंत्र हो अथवा अराजकतापूर्ण। स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने का एकमात्र उद्देश्य अपने देश को समृद्ध करना मात्र ही नहीं होता अपितु स्वतंत्रता में ही आत्मिक सुख की उपलब्धि होती है और लाभ अथवा हानि की अपेक्षा आत्मसम्मान ही अधिक महत्त्वपूर्ण है। पराधीनता के स्वर्णिम पिंजरे की अपेक्षा स्वतंत्रता का वन भी सहस्र गुना श्रेष्ठ है। जिन्होंने इन सिद्धांतों को भलीभांति समझ लिया, अपने देश और धर्म के प्रति अपने कर्तव्य का पूर्णतः पालन किया, स्वधर्म और स्वराज्य के लिए अपने हाथों में प्रति अपने कर्तव्य का पूर्णतः पालन किया, स्वधर्म और स्वराज्य के लिए अपने हाथों में शस्त्र ग्रहण किया, यश के लिए नहीं अपितु केवल कर्तव्य-पूर्ति के हेतु मृत्यु को भी आलिंगन करना श्रेयस्कर समझा, उनके पावन नामों का सदैव ही गौरव सहित स्मरण किया जाता रहेगा। हमारा देश उन लोगों के नाम कदापि स्मरण नहीं करेगा जिन्होंने संकोच अथवा लापरवाही के कारण स्वतंत्रता के युद्ध में सहयोग नहीं दिया अथवा जो शत्रुओं से जा मिले और जिन्होंने अपने ही देशबंधुओं के

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¹⁷⁶ Yet it must be admitted that, with all their courage, they (the British) would have been quite exterminated if the natives have been all altogether hostile to them. The desperate defences made by the garrisons were no doubt heroic, but the natives shared their glory, and the y their aid and presence rendered the defence possible. Our sieze of Delhi would have been quite impossible, if the Rajas of Patiala and Jhind had not been friends and if the Sikhs had not recruited in our battalions and remained quite in the Punjab. The Sikhs at Lucknow did good service, and in all cases our garrisons were helped, fed and served by the natives, as our armies were attended and strengthened by them in the field. Look at us all, here in campt at this and grooming them, feeding the elephants ] managing at transports, supplying the commissariat which feeds us, cooking our soldier’s food, cleaning their camp, pitching and carrying their tents, waiting on our officers, and even lending us their money. The soldier who acts as my amanuensis declared that his regiment could not have lived a week but for the regimental servants, Doli bearers, hospital men, and other dependants. Gurkha guides did good service at Delhi and Bengal artillerymen were as much exposed as the Europeans. - Russell’s, ‘my diary in India’

विरुद्ध संघर्ष कर अपने नाम को कलंकित कर दिया। सन् 1857 की क्रांति से हिंदुस्थान की एकता, स्वतंत्रता व जनशक्ति तथा जागृति की दिशा में कितनी प्रगति हुई है, इसका यह मापदंड थी।¹⁷⁷ सन् 1857 की क्रांति की असफलता के लिए दोषी वे हैं जिन्होंने अपने आलस्य और प्रमाद तथा स्वार्थपरता और विश्वासघात से इसपर मर्मांतक प्रहार किया। उन महान् वीरों को इसकी सफलता के लिए दोषी सिद्ध करने का दुःसाहस किसी को नहीं करना चाहिए, जिन्होंने अपना ही उष्ण रक्त प्रवाहित करनेवाली तलवारों को उठाकर उस महान् पूर्व प्रयोग के हेतु क्रांति के अग्निमय रंगमंच पर प्रवेश किया था और जो प्रत्यक्ष मृत्यु का भी आलिंगन कर आनंद से झूम उठते थे। वे न तो उन्मादी थे और न ही विक्षिप्त, न ही वे विचारहीन थे और न ही पराजय में हाथ बंटानेवाले। उन्हें कोई भी दोष देना उसके साथ अन्याय करना है। वस्तुतः उन्हीं की पावन प्रेरणा से भारत माता की गहन निद्रा भंग हुई थी और पराधीनता की श्रृंखलाओं को टूक-टूक कर देने के लिए संपूर्ण हिंदुस्थान जागृत् हो उठा था। किंतु विधि की विडंबना कि जहां उसका एक हाथ अत्याचारियों के सिर पर मर्मांतक प्रहार कर रहा था वहां दूसरा हाथ स्वयं माता के वक्षस्थल में छुरा घोंपने का कलंकित कृत्य करने में संलग्न था। घायल भारत माता एक बार पुनः तड़प उठी और भू-लुंठित हो गई। इन दोनों श्रेणी के पुत्रों में से कौन क्रूर, विश्वासघाती तथा तिरस्कार योग्य है और कौन वीर, साहसी, देशभक्त तथा सम्माननीय-यह सुस्पष्ट ही हैं। दिल्ली का सम्राट् बहादुरशाह एक महान् कवि भी था। क्रांतियुद्ध के रंगमंच पर प्रवेश करने के पूर्व ही उसने एक गज़ल की रचना की थी। उसने स्वतः यह प्रश्न किया था- दमदमे में दम नहीं अब खैर मांगो जान की। ऐ ज़फ़र! ठंडी हुई शमशीर हिंदुस्थान की।। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 422


177 “भारतीय क्रांति से इतिहासकारों को अनेक शिक्षाएं मिल सकती है; किंतु उसमें इससे बढ़कर कोई अन्य महत्त्वपूर्ण शिक्षा नहीं है कि भारत में ब्राह्मण और शूद्र, हिंदू और मुसलमान हमारे (अंग्रेजों के) विरुद्ध संगठित होकर क्रांति कर सकते हैं और हमारे अधिराज्य के संबंध में यह मानना धोखे से खाली नहीं है कि विभिन्न धार्मिक रीति-रिवाजों का परिपालन करनेवाली जातियों से जब तक यह देश परिपूर्ण है तब तक हमारा यह राज्य शांतिपूर्ण और स्थिर बना रहेगा; क्योंकि ये लोग एक-दूसरे के रहन-सहन, रीति रिवाज और व्यवहारों को भलीभांति समझते ही नहीं बल्कि उनके प्रति आदर-भावना रखकर उनमें सहयोग भी प्रदान करते हैं। सन् 1857 की इस क्रांति ने हमें यह स्मरण करा दिया है कि हमारा आधिपत्य एक पतली परत पर आधारित है और समाज-सुधार तथा धार्मिक क्रांति के विस्फोटों से यह परत किसी भी समय नष्ट हो सकती है।” .फॉरेस्ट के ग्रंथ की भूमिका से

(-प्रतिदिन ही तुम थकते चले जा रहे हो। हे सम्राट्! तुम अपने प्राणों की रक्षा के लिए प्रार्थना करो (अंग्रेजों से), क्योंकि अब भारत की तलवार सदैव के लिए टूक-टूक हो गई हैं।) उन्होंने इस प्रश्न का उत्तर भी इन शब्दों में दिया- ग़ाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की। तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्थान की।। (-हमारे वीरों के अंतःकरण में जब तक आत्मविश्वास और देशभक्ति की भावना विद्यमान है तब तक हिंदुस्थान की पावन कृपाण लंदन तक भी वार करती रहेगी।)