१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपक्ष के अनेक लोग थे। अतः वे तो तात्या के आगमन की बाट जोह रहे थे। तात्या राजपुर पहुंचा, जहां उसे घोड़े और धन भी मिला। दूसरे दिन उसने छोटा उदयपुर में प्रवेश किया, वहां से बड़ौदा केवल पचास मील की दूर रह गया था।'' अब यद्यपि बड़ौदा केवल पचास मील की ही दूरी पर रह गया था, किंतु अंग्रेजों की सेनाएं भी तो तात्या का निरंतर पीछा कर रही थीं। तात्या को चारों ओर से ही अंग्रेजी सेनाएं घेरने का प्रयास कर रही थीं। तात्या का पीछा करते हुए पार्क छोटा उदयपुर भी जा पहुंचा था। अतः तात्या को भी अब बड़ौदा की ओर बढ़ने का अपना विचार त्याग देना पड़ा और उसने अपनी सेना सहित उत्तर की ओर बढ़ते हुए बांसवाड़ा के जंगलों में प्रवेश किया। किंतु उसी समय ब्रिटेन की महारानी की घोषणा सुनकर बांदा के नवाब ने आत्मसमर्पण कर दिया। तात्या और राव साहब के समक्ष अब ऐसी विचित्र और कठिन परिस्थिति पैदा हो गई थी कि उससे निकल पाना भी असंभव-सा ही प्रतीत हो रहा था। दक्षिण में नर्मदा, पश्चिम में रॉबर्ट तथा उत्तर और पूर्व में अनुल्लंघनीय ढलान थी। इस विपरीत परिस्थिति में यदि राव साहब और तात्या टोपे आत्मसमर्पण भी कर देते तो उन्हें कौन दोषी ठहरा सकता था। किंतु वे वीर धन्य हैं, उन्होंने इस संकटापन्न अवस्था में भी आत्मसमर्पण की कायरतापूर्ण भावना को पास न फटकने दिया। एक अंग्रेज ग्रंथकार ने आश्चर्यचकित होकर इन वीरों का गुणगान करते हुए लिखा है-“किंतु ये दो ऐसे व्यक्ति थे जो इस घोर संकटपूर्ण परिस्थिति में भी नितांत शांति, वीरता और धैर्य सहित अपने जीवन के इस प्राणांतक संघर्ष का सामना करते रहे।'' किंतु तात्या ने कठिनाइयों के इस चक्रव्यूह को भी बेध डाला। वह 11 दिसंबर को जंगल से बाहर निकला और एक किलेदार से थोड़ी सी सहायता प्राप्त कर उदयपुर की दिशा में बढ़ चला। किंतु उसी समय कई अंग्रेजी सेनाओं ने भी उसपर आक्रमण कर दिया। अतः उसे पुनः वनखंड में शरण लेनी पड़ी। अब तात्या को एक सप्ताह से अधिक ठहरना असंभव ही हो गया था। यह स्पष्ट होता जा रहा था कि उसे शरण लेनी ही पड़ेगी। उसी समय क्रांतिकारी नेताओं में भी परस्पर यह चर्चा चलने लगी थी कि अब इस संघर्ष को समाप्त कर देना ही श्रेयस्कर होगा। अब तो वह वन भी वन नही रह गया था-वे चारों ओर से खदेड़कर उस स्थान पर बंद कर दिए गए-बल्कि महाराष्ट्र के सिंहों का पिंजरा ही बनकर रह गया। सभी दिशाओं से अंग्रेजों की सेनाओं के पाश मानो उसकी ग्रीवा को ही जकड़ते जा रहे थे। इस स्थिति में भी युद्ध को बंद कर देने का विचार इस मराठा वीर के मन में उत्पन्न नहीं हो पाया। एक दिन वह राव साहब के साथ प्रतापगढ़ की दिशा में बढ़ चला। अभी तात्या टोपे की सेनाएं वन प्रदेश से बाहर भी नहीं निकल सकी थीं कि मेजर रॉक ने उसका मार्ग अवरुद्ध कर दिया। तात्या ने किसी प्रकार की भी दुविधा में न पड़ते हुए उस पर आक्रमण कर दिया। यह आक्रमण 1857 का स्वातंत्र्य समर – 413