१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
स्वदेशवासियों के विरूद्ध विदेशी शत्रुओं को किंचित् मात्र भी सहायता न देने की प्रेरणा प्रदान करनेवाली प्रामाणिकता भी लोगों में नहीं थी। इस कारण भी उन्होंने स्वदेश बंधुओं से ही विश्वासघात भी किया।¹⁷⁶ इस प्रकार क्रांति की असफलता का संपूर्ण पाप उन देशद्रोहियों के ही सिर पर आ जाता है। यदि अधिक स्पष्ट, अधिक सरल, अधिक आकर्षक आदर्श उस समय जनता के समक्ष होता तो ये विद्रोही ही देशभक्त के रूप में परिणत हो जाते; क्योंकि यदि देशभक्ति ही लाभदायक और स्वार्थ की पूर्ति में साधक सिद्ध हो तो जान-बूझकर देशद्रोह का कलंकपूर्ण कृत्य कौन करेगा? वास्तव में महान् यश के भागीदार वे हैं जिन वीरों ने इस तथ्य को हृदयंगम कर स्वातंत्र्य समर में भाग लिया था कि अपने निकृष्ट स्वशासन से भी विदेशी सत्ता और शासन निकृष्टतम होती है, फिर चाहे वह स्वराज्य गणतंत्र हो अथवा एकतंत्र, राजतंत्र हो अथवा अराजकतापूर्ण। स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखने का एकमात्र उद्देश्य अपने देश को समृद्ध करना मात्र ही नहीं होता अपितु स्वतंत्रता में ही आत्मिक सुख की उपलब्धि होती है और लाभ अथवा हानि की अपेक्षा आत्मसम्मान ही अधिक महत्त्वपूर्ण है। पराधीनता के स्वर्णिम पिंजरे की अपेक्षा स्वतंत्रता का वन भी सहस्र गुना श्रेष्ठ है। जिन्होंने इन सिद्धांतों को भलीभांति समझ लिया, अपने देश और धर्म के प्रति अपने कर्तव्य का पूर्णतः पालन किया, स्वधर्म और स्वराज्य के लिए अपने हाथों में प्रति अपने कर्तव्य का पूर्णतः पालन किया, स्वधर्म और स्वराज्य के लिए अपने हाथों में शस्त्र ग्रहण किया, यश के लिए नहीं अपितु केवल कर्तव्य-पूर्ति के हेतु मृत्यु को भी आलिंगन करना श्रेयस्कर समझा, उनके पावन नामों का सदैव ही गौरव सहित स्मरण किया जाता रहेगा। हमारा देश उन लोगों के नाम कदापि स्मरण नहीं करेगा जिन्होंने संकोच अथवा लापरवाही के कारण स्वतंत्रता के युद्ध में सहयोग नहीं दिया अथवा जो शत्रुओं से जा मिले और जिन्होंने अपने ही देशबंधुओं के
1857 का स्वातंत्र्य समर – 421
¹⁷⁶ Yet it must be admitted that, with all their courage, they (the British) would have been quite exterminated if the natives have been all altogether hostile to them. The desperate defences made by the garrisons were no doubt heroic, but the natives shared their glory, and the y their aid and presence rendered the defence possible. Our sieze of Delhi would have been quite impossible, if the Rajas of Patiala and Jhind had not been friends and if the Sikhs had not recruited in our battalions and remained quite in the Punjab. The Sikhs at Lucknow did good service, and in all cases our garrisons were helped, fed and served by the natives, as our armies were attended and strengthened by them in the field. Look at us all, here in campt at this and grooming them, feeding the elephants ] managing at transports, supplying the commissariat which feeds us, cooking our soldier’s food, cleaning their camp, pitching and carrying their tents, waiting on our officers, and even lending us their money. The soldier who acts as my amanuensis declared that his regiment could not have lived a week but for the regimental servants, Doli bearers, hospital men, and other dependants. Gurkha guides did good service at Delhi and Bengal artillerymen were as much exposed as the Europeans. - Russell’s, ‘my diary in India’
विरुद्ध संघर्ष कर अपने नाम को कलंकित कर दिया। सन् 1857 की क्रांति से हिंदुस्थान की एकता, स्वतंत्रता व जनशक्ति तथा जागृति की दिशा में कितनी प्रगति हुई है, इसका यह मापदंड थी।¹⁷⁷ सन् 1857 की क्रांति की असफलता के लिए दोषी वे हैं जिन्होंने अपने आलस्य और प्रमाद तथा स्वार्थपरता और विश्वासघात से इसपर मर्मांतक प्रहार किया। उन महान् वीरों को इसकी सफलता के लिए दोषी सिद्ध करने का दुःसाहस किसी को नहीं करना चाहिए, जिन्होंने अपना ही उष्ण रक्त प्रवाहित करनेवाली तलवारों को उठाकर उस महान् पूर्व प्रयोग के हेतु क्रांति के अग्निमय रंगमंच पर प्रवेश किया था और जो प्रत्यक्ष मृत्यु का भी आलिंगन कर आनंद से झूम उठते थे। वे न तो उन्मादी थे और न ही विक्षिप्त, न ही वे विचारहीन थे और न ही पराजय में हाथ बंटानेवाले। उन्हें कोई भी दोष देना उसके साथ अन्याय करना है। वस्तुतः उन्हीं की पावन प्रेरणा से भारत माता की गहन निद्रा भंग हुई थी और पराधीनता की श्रृंखलाओं को टूक-टूक कर देने के लिए संपूर्ण हिंदुस्थान जागृत् हो उठा था। किंतु विधि की विडंबना कि जहां उसका एक हाथ अत्याचारियों के सिर पर मर्मांतक प्रहार कर रहा था वहां दूसरा हाथ स्वयं माता के वक्षस्थल में छुरा घोंपने का कलंकित कृत्य करने में संलग्न था। घायल भारत माता एक बार पुनः तड़प उठी और भू-लुंठित हो गई। इन दोनों श्रेणी के पुत्रों में से कौन क्रूर, विश्वासघाती तथा तिरस्कार योग्य है और कौन वीर, साहसी, देशभक्त तथा सम्माननीय-यह सुस्पष्ट ही हैं। दिल्ली का सम्राट् बहादुरशाह एक महान् कवि भी था। क्रांतियुद्ध के रंगमंच पर प्रवेश करने के पूर्व ही उसने एक गज़ल की रचना की थी। उसने स्वतः यह प्रश्न किया था- दमदमे में दम नहीं अब खैर मांगो जान की। ऐ ज़फ़र! ठंडी हुई शमशीर हिंदुस्थान की।। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 422
177 “भारतीय क्रांति से इतिहासकारों को अनेक शिक्षाएं मिल सकती है; किंतु उसमें इससे बढ़कर कोई अन्य महत्त्वपूर्ण शिक्षा नहीं है कि भारत में ब्राह्मण और शूद्र, हिंदू और मुसलमान हमारे (अंग्रेजों के) विरुद्ध संगठित होकर क्रांति कर सकते हैं और हमारे अधिराज्य के संबंध में यह मानना धोखे से खाली नहीं है कि विभिन्न धार्मिक रीति-रिवाजों का परिपालन करनेवाली जातियों से जब तक यह देश परिपूर्ण है तब तक हमारा यह राज्य शांतिपूर्ण और स्थिर बना रहेगा; क्योंकि ये लोग एक-दूसरे के रहन-सहन, रीति रिवाज और व्यवहारों को भलीभांति समझते ही नहीं बल्कि उनके प्रति आदर-भावना रखकर उनमें सहयोग भी प्रदान करते हैं। सन् 1857 की इस क्रांति ने हमें यह स्मरण करा दिया है कि हमारा आधिपत्य एक पतली परत पर आधारित है और समाज-सुधार तथा धार्मिक क्रांति के विस्फोटों से यह परत किसी भी समय नष्ट हो सकती है।” .फॉरेस्ट के ग्रंथ की भूमिका से
(-प्रतिदिन ही तुम थकते चले जा रहे हो। हे सम्राट्! तुम अपने प्राणों की रक्षा के लिए प्रार्थना करो (अंग्रेजों से), क्योंकि अब भारत की तलवार सदैव के लिए टूक-टूक हो गई हैं।) उन्होंने इस प्रश्न का उत्तर भी इन शब्दों में दिया- ग़ाजियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की। तख्ते लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्थान की।। (-हमारे वीरों के अंतःकरण में जब तक आत्मविश्वास और देशभक्ति की भावना विद्यमान है तब तक हिंदुस्थान की पावन कृपाण लंदन तक भी वार करती रहेगी।)