भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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भंग हुए शरीर का कष्ट सहन करता रहा। उसने जैकब की ओर घृणा से देखते हुए कहा, “विद्रोह मैंने ही किया है।” दूसरे एक क्रांतिकारी ने तोप दगने से पूर्व भूल से एक नेता का स्मरण कर लिया। किंतु गोरे अधिकारी उस नेता को बंदी बना पाते, इसके पूर्व ही वह सुशिक्षित नेता कोल्हापुर के बाहर निकल गया। चिमा सहाब ने भी अंग्रेजों को उसक कोई सूत्र नहीं दिया । इस प्रकार के पारस्परिक विश्वास के कारण ही क्रांतिकारी एकता के महान् सूत्र में आबद्ध हुए थे। इसी पद्धति के कारण उनमें कोई भी आपसी मनमुटाव उत्पन्न न हो पाता था। इसी के कारण वे षड्यंत्रों का सफलतापूर्वक निर्वाह करते थे।165 कोल्हापुर में यदि इस प्रकार विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित हुई थी तो बेलगांव में भी 10 अगस्त से ही क्रांति का रंग मुखरित होने लगा गया था। किंतु विद्रोही सिपाहियों के एक नेता ठाकुर सिंह तथा मुसलमान एवं अन्य नागरिकों के नेता एक साहसी मुंशी के बंदी बना लिये जाने से बेल गांव और धारवाड़ में शांति ही बनी रही, क्योंकि अंग्रेजी सेना भी तत्काल वहां आ पहुंची थी। मुंशी एक सरकारी कर्मचारी था, अतः उसके द्वारा क्रांति के संबंध में पूना और कोल्हापुर आदि के सैनिकों को लिखे गए पत्रों के पकड़ लिये जाने के कारण अंग्रेजों ने उसे तोप से उड़ा दिया। सतारा में रंगोली बापू पर तो पहले ही ब्रिटिश सरकार अपना क्रोध प्रदर्शित कर चुकी थी। इधर कोल्हापुर में क्रांति का संचार करने के आरोप में अंग्रेजों ने रंगोजी बापू के एक पुत्र को भी बंदी बना लिया था, उसे भी सतारा में लाकर विद्रोह के संशय में ही अन्य क्रांतिकारियों के साथ फांसी पर लटका दिया गया था। सतारा के दो राजपुत्रों को सीमा पार निष्कासित कर दिया गया था। जिस राजसिंहासन की सेवा करने में रंगोजी बापू ने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया था, उसकी ऐसी दुर्दशा देखकर उन्होंने भी तत्काल सतारा का परित्याग कर दिया था। उनके बंदी बनाने के लिए अंग्रेजों ने भारी मात्रा में इनाम देने की घोषणा की थी; किंतु अभी कोई ऐसा घृणित कार्य करनेवाला वहां नहीं जनमा था। शत्रुओं के हाथों से बच निकलने के उपरांत रंगोजी बापू का क्या हुआ, यह तो इतिहास आज तक भी नहीं बता पाया; किंतु उनके जाने के साथ-ही-साथ सतारा स्वतंत्रता से भी हाथ धो बैठी। उन दिनों बंबई क्षेत्र का गवर्नर लॉर्ड एलफिंस्टन नामक एक सुयोग्य अधिकारी को बनाया गया था। अपने प्रदेश में शांति स्थापित करने के साथ-ही-साथ उसने कुछ अंग्रेजी सेना राजस्थान भेज दी। किंतु बंबई में विद्रोहाग्नि का शमन करने में जो तत्परता प्रदर्शित की गई उसका श्रेय फॉरेस्ट नामक मुख्य पुलिस अधिकारी को था। बंबई तो उस समय आलसी, सुखभोगी और राष्ट्रद्रोहियों की नगरी ही बनकर रह गई थी। ऐसी स्थिति 1857 का स्वातंत्र्य समर – 387 165 सर जॉर्ज ले ग्रांड जैकब के.सी.एस.आई.सी.बी. कृत- 'वेस्टर्न इंडिया'।