भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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में केवल उन्हीं सैनिकों के हृदय राष्ट्र-प्रेम की पावन ज्वाला से दग्ध हो रहे थे जो वहां तैनात थे। इस स्थिति को समझकर ही फॉरेस्ट की दृष्टि निरंतर उनपर रहती थी। विद्रोह दीपावली के दिन निर्धारित हो चुका था। तदनुसार सैनिकों की गुप्त बैठकों का क्रम भी आरंभ हो चुका था। इन सभाओं में फॉरेस्ट ने अपने विशेष कृपापात्रों को भी घुसाने की भरसक चेष्टा की थी। किंतु सिपाहियों की दक्षता ने उसकी दाल न गलने दी। फॉरेस्ट कभी ब्राह्मण तो कभी अन्य कोई वेश बदलकर स्वयं भी सामूहित भोजों आदि में यदा कदा पहुंचने में सफल हो जाता था। अंततः उसे विदित हो गया कि गंगाप्रासाद नामक एक सज्जन का निवास-स्थान ही गुप्त बैठकों का केंद्र है। किसी-न-किसी प्रकार रौब और आतंक के सारे वह एक दिन गंगाप्रसाद के घर में प्रविष्ट होने में सफल भी हो गया। उसने एक दीवार के छेद से क्रांतिकारियों की पूरी बैठक का भी अवलोकन कर लिया। किंतु क्रांतिकारियों को वहां उसकी उपस्थिति का आभास तक नहीं हो पाया। इतना ही नहीं, वह कतिपय अंग्रेज अधिकारियों को भी एक दिन वहां ले गया और उसने उन्हें भी सबकुछ दिखा दिया। जब एक अंग्रेज अधिकारी ने देखा कि अपने जिन सैनिकों को वे परम राजभक्त समझते थे वे ही एक-एक करके उस बैठक में भाग लेने के लिए आ रहे हैं तो उसके मुख से हठात् निकल पड़ा, "हे मेरे भगवान! ये तो मेरे अपने ही आदमी हैं। क्या ऐसा होना भी संभव है?" इन सिपाहियों के विद्रोह की रूपरेखा सामान्यतः इस प्रकार थी कि पहले बंबई में विद्रोह किया जाए और तदुपरांत पूजा की ओर प्रस्थान किया जाए, और जब वहां अधिकार कर लिया जाए और तदुपरांत पूना की ओर प्रस्थान किया जाए, और जब वहां मराठों का झंडा पुनः फहरा दिया जाए।166 परंतु इस योजना के कार्यान्वित होने के पूर्व ही फॉरेस्ट द्वारा इस योजना का पता लगा लिये जाने के कारण दो विद्रोही नेता फांसी पर लटका दिए गए तथा अन्य छह को सीमा पार कर दिया गया। इस प्रकार वहां सन् 1857 के अक्टूबर मास में ही विद्रोह को पूर्णतः कुचल दिया गया। उन्हीं दिनों नागपुर और जबलपुर में भी क्रांति की चिंगारी फूटने की संभावनाएं प्रतीत होने लगी थी। नागपुर में विद्रोह के लिए सिपाहियों ने 13 जून, 1857 की तिथि निर्धारित की थी। इस योजना को सभी प्रमुख नागरिकों का भी समर्थन प्राप्त था। निर्धारित योजना के अनुसार 13 जून की रात्रि में ग्राम के लोगों को तीन प्रज्वलित आकाशद्वीप आकाश में उठाते थे। इन्हें ही सैनिकों के विद्रोह का संकेत वाक्य निर्धारित किया गया था। यहां क्रांतिकारियों के पक्ष में एक और भी बात थी कि नागपुर से जबलपुर तक के मध्य क्षेत्र में अंग्रेज एक भी गोरी पलन नहीं रख पाए थे। किंतु कुछ ही समय उपरांत मद्रास से गोरी पलटन आ पहुंची और उसने विद्रोह का दमन कर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 388 166 फॉरेस्ट कृत-'रियल डेंजर इन इंडिया'।