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१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

DevanagariHindipublished418 पृष्ठ

भंग हुए शरीर का कष्ट सहन करता रहा। उसने जैकब की ओर घृणा से देखते हुए कहा, “विद्रोह मैंने ही किया है।” दूसरे एक क्रांतिकारी ने तोप दगने से पूर्व भूल से एक नेता का स्मरण कर लिया। किंतु गोरे अधिकारी उस नेता को बंदी बना पाते, इसके पूर्व ही वह सुशिक्षित नेता कोल्हापुर के बाहर निकल गया। चिमा सहाब ने भी अंग्रेजों को उसक कोई सूत्र नहीं दिया । इस प्रकार के पारस्परिक विश्वास के कारण ही क्रांतिकारी एकता के महान् सूत्र में आबद्ध हुए थे। इसी पद्धति के कारण उनमें कोई भी आपसी मनमुटाव उत्पन्न न हो पाता था। इसी के कारण वे षड्यंत्रों का सफलतापूर्वक निर्वाह करते थे।165 कोल्हापुर में यदि इस प्रकार विद्रोह की अग्नि प्रज्वलित हुई थी तो बेलगांव में भी 10 अगस्त से ही क्रांति का रंग मुखरित होने लगा गया था। किंतु विद्रोही सिपाहियों के एक नेता ठाकुर सिंह तथा मुसलमान एवं अन्य नागरिकों के नेता एक साहसी मुंशी के बंदी बना लिये जाने से बेल गांव और धारवाड़ में शांति ही बनी रही, क्योंकि अंग्रेजी सेना भी तत्काल वहां आ पहुंची थी। मुंशी एक सरकारी कर्मचारी था, अतः उसके द्वारा क्रांति के संबंध में पूना और कोल्हापुर आदि के सैनिकों को लिखे गए पत्रों के पकड़ लिये जाने के कारण अंग्रेजों ने उसे तोप से उड़ा दिया। सतारा में रंगोली बापू पर तो पहले ही ब्रिटिश सरकार अपना क्रोध प्रदर्शित कर चुकी थी। इधर कोल्हापुर में क्रांति का संचार करने के आरोप में अंग्रेजों ने रंगोजी बापू के एक पुत्र को भी बंदी बना लिया था, उसे भी सतारा में लाकर विद्रोह के संशय में ही अन्य क्रांतिकारियों के साथ फांसी पर लटका दिया गया था। सतारा के दो राजपुत्रों को सीमा पार निष्कासित कर दिया गया था। जिस राजसिंहासन की सेवा करने में रंगोजी बापू ने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया था, उसकी ऐसी दुर्दशा देखकर उन्होंने भी तत्काल सतारा का परित्याग कर दिया था। उनके बंदी बनाने के लिए अंग्रेजों ने भारी मात्रा में इनाम देने की घोषणा की थी; किंतु अभी कोई ऐसा घृणित कार्य करनेवाला वहां नहीं जनमा था। शत्रुओं के हाथों से बच निकलने के उपरांत रंगोजी बापू का क्या हुआ, यह तो इतिहास आज तक भी नहीं बता पाया; किंतु उनके जाने के साथ-ही-साथ सतारा स्वतंत्रता से भी हाथ धो बैठी। उन दिनों बंबई क्षेत्र का गवर्नर लॉर्ड एलफिंस्टन नामक एक सुयोग्य अधिकारी को बनाया गया था। अपने प्रदेश में शांति स्थापित करने के साथ-ही-साथ उसने कुछ अंग्रेजी सेना राजस्थान भेज दी। किंतु बंबई में विद्रोहाग्नि का शमन करने में जो तत्परता प्रदर्शित की गई उसका श्रेय फॉरेस्ट नामक मुख्य पुलिस अधिकारी को था। बंबई तो उस समय आलसी, सुखभोगी और राष्ट्रद्रोहियों की नगरी ही बनकर रह गई थी। ऐसी स्थिति 1857 का स्वातंत्र्य समर – 387 165 सर जॉर्ज ले ग्रांड जैकब के.सी.एस.आई.सी.बी. कृत- 'वेस्टर्न इंडिया'।

में केवल उन्हीं सैनिकों के हृदय राष्ट्र-प्रेम की पावन ज्वाला से दग्ध हो रहे थे जो वहां तैनात थे। इस स्थिति को समझकर ही फॉरेस्ट की दृष्टि निरंतर उनपर रहती थी। विद्रोह दीपावली के दिन निर्धारित हो चुका था। तदनुसार सैनिकों की गुप्त बैठकों का क्रम भी आरंभ हो चुका था। इन सभाओं में फॉरेस्ट ने अपने विशेष कृपापात्रों को भी घुसाने की भरसक चेष्टा की थी। किंतु सिपाहियों की दक्षता ने उसकी दाल न गलने दी। फॉरेस्ट कभी ब्राह्मण तो कभी अन्य कोई वेश बदलकर स्वयं भी सामूहित भोजों आदि में यदा कदा पहुंचने में सफल हो जाता था। अंततः उसे विदित हो गया कि गंगाप्रासाद नामक एक सज्जन का निवास-स्थान ही गुप्त बैठकों का केंद्र है। किसी-न-किसी प्रकार रौब और आतंक के सारे वह एक दिन गंगाप्रसाद के घर में प्रविष्ट होने में सफल भी हो गया। उसने एक दीवार के छेद से क्रांतिकारियों की पूरी बैठक का भी अवलोकन कर लिया। किंतु क्रांतिकारियों को वहां उसकी उपस्थिति का आभास तक नहीं हो पाया। इतना ही नहीं, वह कतिपय अंग्रेज अधिकारियों को भी एक दिन वहां ले गया और उसने उन्हें भी सबकुछ दिखा दिया। जब एक अंग्रेज अधिकारी ने देखा कि अपने जिन सैनिकों को वे परम राजभक्त समझते थे वे ही एक-एक करके उस बैठक में भाग लेने के लिए आ रहे हैं तो उसके मुख से हठात् निकल पड़ा, "हे मेरे भगवान! ये तो मेरे अपने ही आदमी हैं। क्या ऐसा होना भी संभव है?" इन सिपाहियों के विद्रोह की रूपरेखा सामान्यतः इस प्रकार थी कि पहले बंबई में विद्रोह किया जाए और तदुपरांत पूजा की ओर प्रस्थान किया जाए, और जब वहां अधिकार कर लिया जाए और तदुपरांत पूना की ओर प्रस्थान किया जाए, और जब वहां मराठों का झंडा पुनः फहरा दिया जाए।166 परंतु इस योजना के कार्यान्वित होने के पूर्व ही फॉरेस्ट द्वारा इस योजना का पता लगा लिये जाने के कारण दो विद्रोही नेता फांसी पर लटका दिए गए तथा अन्य छह को सीमा पार कर दिया गया। इस प्रकार वहां सन् 1857 के अक्टूबर मास में ही विद्रोह को पूर्णतः कुचल दिया गया। उन्हीं दिनों नागपुर और जबलपुर में भी क्रांति की चिंगारी फूटने की संभावनाएं प्रतीत होने लगी थी। नागपुर में विद्रोह के लिए सिपाहियों ने 13 जून, 1857 की तिथि निर्धारित की थी। इस योजना को सभी प्रमुख नागरिकों का भी समर्थन प्राप्त था। निर्धारित योजना के अनुसार 13 जून की रात्रि में ग्राम के लोगों को तीन प्रज्वलित आकाशद्वीप आकाश में उठाते थे। इन्हें ही सैनिकों के विद्रोह का संकेत वाक्य निर्धारित किया गया था। यहां क्रांतिकारियों के पक्ष में एक और भी बात थी कि नागपुर से जबलपुर तक के मध्य क्षेत्र में अंग्रेज एक भी गोरी पलन नहीं रख पाए थे। किंतु कुछ ही समय उपरांत मद्रास से गोरी पलटन आ पहुंची और उसने विद्रोह का दमन कर 1857 का स्वातंत्र्य समर – 388 166 फॉरेस्ट कृत-'रियल डेंजर इन इंडिया'।

दिया। जबलपुर में गोंड जाति के राजा शंकर सिंह और उनके पुत्र द्वारा सर्वत्र क्रांति की ज्वाला धधकाई जा रही थी। जब उन्हें अंग्रेजों द्वारा बंदी बना लिया गया तो उनके पास से एक रेशमी बस्ता भी मिला, जिसमें वह प्रातः स्मरण की श्लोक पंक्ति भी एक कागज पर लिखी मिली, जिसका राजा शंकर सिंह प्रतिदिन पाठ करते थे। उसके अंग्रेजी भाषांतर का हिंदी रूपांतर संक्षेप में इस प्रकार है- साधुओं से छल और दुष्कृत्य कर रहे नित्य, दुष्ट दलन हेतु धाओ त्वरित, आओ देवि चंडिके। शत्रुओं का दलन करो, धम्न संस्थापन करो, भक्त की पुकार सुनो, ध्याओ शीघ्र मातृके। आंग्ल दुष्ट संहार करो, धरती का त्रास हरो, शत्रु रक्त पी अघाओ, आओ शत्रु संहारके! राजा शंकर सिंह ने 52वीं रेजिमेंट को भी अपने साथ विद्रोह में सम्मिलित करने का प्रयास किया था। इस आरोप में उनको पुत्र सहित 18 सितंबर, 1857 को तोप से उड़ा दिया गया। किंतु इस समाचार ने निराश होने के स्थान पर 52वीं पलटने ने विद्रोह का शंखनाद ही कर दिया। उन्होंने रणभूमि में कूदकर एक अंग्रेज अधिकारी येक ग्रेगर को यमलोक ही पठा दिया। इसी भांति धार राज्य में भी विद्रोह की ज्वालाएं दहकी थीं तो दिल्ली के राजपुत्र वीर फीरोजशाह के द्वारा किए गए प्रयासों के फलस्वरूप महिदपुर और गौरेया में भी क्रांति का विस्फोट हुआ था, जिसका विवरण हम यहां विस्तार के भय से प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं। किंतु इन सभी स्थानों की अपेक्षा ब्रिटिश सत्ता का मर्मस्थान तो हैदराबाद के निजाम के हाथों में ही था। इस राज्य के सिंहासन पर मई 1857 के मध्य में अफजल उलउद्दौला सिंहासनासीन हुआ था। सर सालारजंग नामक व्यक्ति उसके दीवान पद का भार वहन कर रहा था। इस सालारगंज में अपने इशारे मात्र पर ही संपूर्ण दक्षिण को उठाने की क्षमता थी। यदि हैदराबाद का निजाम विद्रोह में शामिल हो जाता तो यह सुनिश्चित था कि संपूर्ण दक्षिण प्रदेश ही एक व्यक्ति के समान उठ खड़ा होता । फिर उत्तर में हुए विद्रोह के कारण पड़नेवाले दबाव से कसमसाकर टूटने की स्थिति में आई हुई ब्रिटिश साम्राज्य की आयु की डोरी दक्षिण का भी दबाव पड़ने से निश्चित रूप से कड़कड़ाकर टूक-टूक हो जाती। यह भी कैसे कहा जाए कि अंग्रेजों के विरूद्ध प्रारंभ किए गए इस स्वातंत्र्य संग्राम के सिद्धांतों से किसी ने सालारजंग को अवगत नहीं कराया होगा। यही मानना होगा कि सर सालारजंग के अंतःकरण में इतनी प्रचंड 'राजभक्ति' विद्यमान थी कि उसने स्वधर्म, स्वराज्य और स्वतंत्रता के प्रति प्रेम की एक भी तरंग से 1857 का स्वातंत्र्य समर - 389

उसके हृदय को तरंगित नहीं होने दिया। किंतु इतने पर भी उसे क्रांति के संघर्ष में योगदान देने के लिए प्रेरित करने में हैदाराबाद की जनता ने कोई कसर न उठा रखी थी। किंतु सालारजंग अविचल ही रहा। तब हैदराबाद में 12 जून को प्रातः काल ही अत्यधिक उत्तेजना परिलक्षित हुई। उस दिन एक लब्धप्रतिष्ठ मौलवी के हस्ताक्षरों से युक्त भित्तिपत्रक यत्र-तत्र दीवारों पर चिपके हुए दृष्टिगोचर हुए। क्रांतिकारी हस्तपत्रकों के तो अंबार ही लग गए थे। मसजिदों में मुसलमानों की विशाल सभाएं भी आयोजित हुईं, जहां उत्तेजित भाषण होते थे और लोगों से ये प्रतिज्ञाएं कराई जाती थीं कि फिरंगी काफिरों को भारत से निष्कासित करके ही चैन की सांस ली जाएगी। किंतु सालारजंग पर तो इन सभी घटनाओं का विपरीत प्रभाव पड़ा। उसने कुछ क्रांतिकारी नेताओं को बंदी बनाकर अंग्रेजों को सौंप दिया। किंतु इसपर भी 17 जुलाई को हैदराबाद में विद्रोह का शंखनाद गूंज उठा और क्रांतिकारी नारों की गूंज सर्वत्र सुनाई पड़ने लगी। क्रांति की पताका फहराते हुए लोग अपने नेताओं को मुक्त कराने के लिए ब्रिटिश रेजिडेंसी में प्रविष्ट हो गए। सर्वप्रथम निजाम की सेना के ही रूहेलों ने विद्रोह की पताका फहराई थी और लगभग पांच सौ नागरिक भी इसमें सम्मिलित हुए थे। ब्रिदोहियों को आशा थी कि सालारगंज खुलकर भले ही उनकी सहायता न करे, किंतु गुप्त रूप से तो उनकी सहायता करेगा ही और यदि उसने ऐसा भी न किया तो वह कम-से-कम तटस्थ तो अवश्य ही रहेगा; किंतु उसने तो सभी की आशाओं पर तुषारपात कर दिया। वह उनसे न मिलकर शांत ही नहीं बैठा रहा, अपितु उसने तो ब्रिटिश अधिकारियों से हाथ मिलाकर अपने ही सैनिकों की हत्या करने में भी संकोच नहीं किया। एक मुठभेड़ में क्रांतिकारी नेता तोराबाज खां मारे गए तो अलाउद्दीन नामक एक अन्य नेता शत्रुओं द्वारा बंदी बना लिया गया। उसे तत्काल ही अंडमान भेज दिया गया। इस प्रकार हैदराबाद में हुआ क्रांति का प्रयत्न असफल हो गया। एक अंग्रेज इतिहासकार ने स्पष्टतः इन शब्दों में वस्तुस्थिति को स्वीकार किया है- “तीन मास तक संपूर्ण भारत का भाग्य निजाम अफजलउद्दौला और सालारगंज के ही हाथों में था। उनकी बुद्धिमत्तापूर्ण नीति से यह सिद्ध होता है कि उन्होंने विद्रोही सिपाहियों के प्रयासों से दिल्ली के राजसिंहासन के पुनः प्रतिष्ठित होने की आशा पर संदिग्ध अवस्था में पड़े रहकर अवलंबित रहने के स्थान पर अंग्रेजों की छत्रच्छाया में मांडलिक बनकर रहना ही श्रेष्ठ समझा।‘' सालारजंग की इस अस्पृहणीय कारस्तानी के कारण इतिहास उसकी सदैव ही निंदा करता रहेगा। इस प्रकार जहां दक्षिण मं निजाम क्रांति का विनाश करने में तल्लीन था वहां उसी के राज्य के समीप स्थित जोहरापुर के तरूण हिंदू राजा ने अपना सर्वस्व स्वातंत्र्य संग्राम में समर्पित कर देने का सत्संकल्प ग्रहण किया था। तदनुसार उसने अरब, रूहेलों, पठानों 1857 का स्वातंत्र्य समर - 390

तथा डोगरों की एक सेना का गठन किया था। उन्हीं दिनों उसके पास नाना साहब के दूत भी पहुंचे थे और उन्होंने उसको नाना साहब के पक्ष में उठ खड़े होने के लिए प्रेरित किया था। रायचूर और अर्काट के भी कुछ ब्राह्मणों और मौलवियों ने उसे प्रेरित किया। किंतु इन सबके प्रोत्साहित करने पर भी ज बवह अंग्रेजों के विरुद्ध उठकर खड़े होने में टालमटोल कर रहा था तो उसकी प्रजा ने ही उसे कायर कहकर ताने देने आरंभ कर दिए। तब उसने पेशवा के नाम पर अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह प्रारंभ कर दिया। किंतु निजाम और अंग्रेज इन दोनों की शक्ति के विरूद्ध उस अकेले की पर न बसी। अतः सन् 1858 के फरवरी मास में यह वीर नरेश अपनी सेनाओं के पराभव के उपरांत हैदराबाद में आ गया। ज बवह वहां के बाजारों में टहल रहा था तो उसे सालारगंज ने बंदी बना लिया। अंग्रेज अधिकारी मेडोज टेलर को ही भेजा गया। किंतु गुप्त संगठन और उसमें योगदान के संबंध में जब राजा से टेलर ने प्रश्न किया तो उसने क्या उत्तर दिया, यह टेलर के शब्दों में ही बताना उत्तम होगा। मेडोज टेलर ने लिखा है कि "वह तत्काल तनकर खड़ा हो गया और बड़े आवेश सहित उसने कहा, 'नहीं अप्पा, जिस संबंध में तुम मुझे रेजीडेंसी से भेंट करने के लिए कह रहे हो, मैं उस बात को कदापि स्वीकार नहीं करूंगा; रेजीडेंस समझता होगा कि मैं अपने प्राणदान के लिए उससे याचना करूंगा, किंतु स्मरण रहे अप्पा, मैं अपने सहयोगी देशबांधुवों के नाम तो जीवन की अंतिम घड़ी तक भी नहीं बता सकता हूं, किंतु यदि मुझे मेरे स्फूर्तिदाता का नाम बताने हेतु बाध्य किया जाता है तो मेरा स्पष्ट उत्तर है 'नहीं'। क्या काल के गाल में जाने के हेतु बाध्य किया जाता हो तो मेरा स्पष्ट उत्तर है 'नहीं। क्या तोप से उड़ाए जाने, कालेपानी में सड़ाए जाने अथवा फांसी पर लटकाए जाने, इन सबसे भी अधिक भयंकर दंड-अपने आपको देशद्रोहियों की श्रेणी में गिना जाना मानता हूं।'' वीरव्रती नरेश गरज उठा, "अप्पा, मैं तुमसे एक ही याचना करता हूं कि मुझे फांसी पर न लटकाओ, अपितु मुझे तोप से उड़ा दो, फिर तुम देखोगे कि मैं कितनी निर्भीकता और शांति से तोप के समक्ष सधकर खड़ा होता हूं।''

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उस देशभक्त नरेश को पहले फांसी का ही दंड सुनाया गया, किंतु मेडोज टेलर के हस्तक्षेप से उसे कालापानी के दंड में परिवर्तित कर दिया गया। उसे जब अंडमान भेजा जा रहा था तो उसने समीप में किसी को न पाकर जेल के एक वार्डर से पिस्तौल छीन ली और अपने ऊपर गोली दागकर प्राण विसर्जित करते हुए ये अंतिम शब्द कहे-"काला पानी से तो मृत्यु ही श्रेयस्कर है। मेरा तो एक साधारण सा प्रहरी भी बंदीशाला में नहीं रहेगा, फिर मैं तो उनका राजा हूं। मैं कदापि बंदी नहीं रह सकता।'"167 जोहरापुर के नरेश का इस प्रकार पराभव होते हुए देखकर अब तक असमंजस में पड़े नरगुंद के नरेश ने भी अब विद्रोह करने के लिए कमर कस ली। इस वीरव्रती का नाम था भास्करराव बाबासाहब! बाबासाहब बड़ा विद्या-प्रेमी था। उसने अपने पुस्तकालय में विभिन्न उत्तम ग्रंथों का एक संग्रहालय भी बनाया था। वह स्वतः तो दयालु था ही, उसकी धर्मपत्नी भी अनिंद्य सुंदरी थी और साहसी भी। जब उसे दत्तक पुत्र लेने की स्वीकृति न दी गई थी तभी से उसने अंग्रेजी राज्य का सर्वनाश कर देने का संकल्प कर लिया था। उसी की प्रेरणा से, नितांत ही संकोच सहित नरगुंद नरेश ने 25 मई, 1857 को अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठा लिये। बाबासाहब ने ब्रिटिश राज्य सत्ता की दासता का तौक गले से तोड़कर फेंक दिया। जब उन्हें विदित हुआ कि अंग्रेज अधिकारी मैनसन उनपर आक्रमण करने के लिए आ रहा है तो उन्होंने अपने कतिपय विश्वस्त साथियों के साथ नरगुंद के समीप स्थित वन में ही उसे घेर लिया। मैनसन को यमलोक पठा दिया गया और वीर सैनिक उसका सिर काटकर ले आए। मैनसन को यमलोक पठा दिया गया और वीर सैनिक उसका सिर काटकर ले आए। वे इस अंग्रेज अधिकारी के सिर को जुलूस के रूप में नरगुंद लाए और अगले दिन उसे नरगुंद नगर के प्रवेशद्वार पर टांग दिया था। किंतु नरगुंद नरेश के ही सौतेले भाई ने क्रांतिकारियों के साथ सहयोग देना ही स्वीकार नहीं किया, अपितु वह अंग्रेजों से भी जा मिला। अंग्रेज सेना ने नरगुंद पर आक्रमण कर वहां की सेना को पराजित कर दिया। किंतु बाबासाहब शत्रुओं के हाथ में आने से बच निकलने में सफल हो गए। बाद में एक दिन गुप्त रूप से घूमते हुए वे बंदी बना लिये गए और 12 जून को अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दे दी। उनकी नवयुवती, परम सुंदरी महारानी भी जीते-जी अंग्रेजों के हाथ न आई, अपितु उसने अपनी सास सहित मलप्रभा नदी की जलधारा में छलांग लगाकर प्राण विसर्जित कर दिए। इनके अतिरिक्त कोमलदुर्ग के भीमराव, सावंतवाड़ी के अधिपति इत्यादि अन्य लोगों ने भी पेशवा के नाम पर अनेक स्थानों पर विद्रोह किए। किंतु विद्रोह का ठीक समय निर्धारित करने की चतुरता के अभाव, संगठन की अपूर्णता एवं एकाकी और असंगठित जनबल के आधार पर दक्षिण में हुई क्रांतियों में से कोई भी प्रभावी सिद्ध नहीं हुई और अंग्रेजों को भी अपना अधिक ध्यान केंद्रित नहीं करना पड़ा। परिणामतः उन्हें

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167 मेडोज टेलर कृत-'स्टोरी ऑफ माई लाइफ'।

उत्तर में ही अपनी संपूर्ण शक्ति लगाने का सुयोग्य मिल गया। इस प्रकार दक्षिण का विहंगावलोकन करते के उपरांत अब हमें पुनः अहमदशाह की उस वीररस-प्रचुर चरित्र कथा के उस अध्याय पर दृष्टिपात करना होगा ज बवह तड़पते और कराहते अवध की पीड़ा का हरण करने के लिए अंतिम बार प्रयासरत हुआ था। मौलवी सरीखे असाधारण वीरों की मृत्यु भी उनके जीवन के सदृश ही वैभवशाली होती है। दूसरे अनेक व्यक्ति रणभूमि में संघर्ष करते हुए स्वर्ग सिधारते हैं; किंतु जिनके अंतःकरणों में राष्ट्रभक्ति की पावन ज्वाला प्रज्वलित हो रही हो, उसके शमन हेतु रणभूमि पर ‘रक्त-रक्त कहते जो तांडव करते हुए अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हैं, उन्हें तो वस्तुतः मृत्यु भी नहीं मार पाती। ऐसे महान् योद्धा यदि प्रतिशोध की अग्नि पूर्णतः बुझ जाने के पूर्व ही रणभूमि में प्राण विसर्जित कर दें तो भी यमराज के अधीन नहीं हो पाते। यह भी देखा गया है कि ऐसे महान् वीर का शीश धड़ से पृथक् हो जाने पर उनका धड़ ही समर में लिप्त रहता है। और अनेक लोगों में यह भी धारणा व्याप्त है कि यदि ऐसे महावीर के धड़ के भी टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएं तब भी उस वीर का अदृश्य भूत ही रात्रि में शत्रुओं की छाती पर चढ़कर अपनी प्रतिशोधाग्नि को शांत करता है। इस धारणा के मूल में कोई-न-कोई तथ्य अवश्य ही है, ऐसा प्रतीत होता है। जब मौलवी अहमदा शाह समर भूमि में लड़ रहे थे, उस समय लॉर्ड केनिंग ने एक घोषणा प्रसारित कर संपूर्ण अवधवासियों पर यह व्यक्त किया था कि “जो स्वतः आत्मसमर्पण कर देगा उसे विद्रोही न समझते हुए उसके पूर्व के सभी अपराधों को दया सहित क्षमा कर दिया जाएगा और जो लोग आज हमारा साथ दे रहे हैं उनकी संपत्ति और जागीरें आदि भी वापस दे दी जाएंगी। अब अंग्रेजी सत्ता की निश्चित रूपेण विजय हो रही है, अतः अवध के जो लोग अभी भी ब्रिटिश सत्ता का विरोध करने पर डटे रहेंगे उन्हें उनके इस हठ के लिए कठोरतम दंड दिया जाएगा।‘‘ अंग्रेज यह समझते थे किइस घोषणा के उपरांत अवध के प्रायः सभी जमींदार शांत हो जाएंगे। परंतु इन्हीं दिनों यह समाचार भी मिला कि ‘पावेन के राजा ने 5 जून, 1857 को मौलवी अहमद शाह का सिर काट लिया है।’ मंद होती हुई अग्नि मौलवी की मृत्यु के समाचार से पुनः दहक उठी। अत्यधिक प्रयत्नों के उपरांत मिली असफलता से जो अवध थक गया था और जिसे क्षमा के प्रलोभन में फंसाया जा रहा था, वह अवध मौलवी के निधन पर शोक प्रदर्शन करने के स्थान पर ‘प्रतिशोध’, ‘प्रतिशोध’ की गर्जना करता हुआ पुनः रणभूमि में कूद पड़ा। मौलवी का शीश तो उनके क्रूर शत्रु ने काटकर निश्चित रूप से ही नगर के तोरण द्वार पर लटका दिया था, किंतु अब तो उसका धड़ ही रणभूमि में अंग्रेजों के होश उड़ा रहा था। मौलवी की हत्या के कारण संपूर्ण अवध पर ही मानो उनका भूत सवार हो गया था और अब अवध जय-पराजय, हानि-लाभ, आशा-निराशा और जीवन-मरण 1857 का स्वातंत्र्य समर – 393

का मोह त्यागकर नवीन और प्रचंड उत्साह सहित शत्रु से संघर्ष हेतु रणभूमि में पुनः उतर पड़ा था। पावेन के चांडाल से प्रतिशोध लेने के लिए निजाम अली खां पीलीभीत जा पहुंचा । खानबहादुर खान ने चार हजार लोगों को लेकर चढ़ाई की तो फर्रुखाबाद के नेता के साथ पांच हजार लोग थे और तीन हजार लोगों सहित विलायतशाह तथा तीन हजार को साथ लेकर ही नाना साहब, अली खां मेवाती और उनके अनुगामियों ने संपूर्ण अवध में ही उथल-पुथल मचा दी। इनमें से प्रत्येक ही पावेन के राजा का रक्त पीने के लिए उतावला था। इतनी विशाल वाहिनी को चढ़कर आता हुआ देखकर इस देशद्रोही पापी का अंग-अंग कांप उठा। उसके संरक्षण के लिए अंग्रेजी सेना भी वहां तीव्र गति से एकत्रित होती जा रही थी। इस प्रदेश के आसपास शत्रुओं से क्रांतिकारियों का घमासान संघर्ष हो रहा था। घाघरा नदी के तट पर बेगम हजरत महल और हेमू खां डेरा डाले हुए थे। इधर राजा रामबख्श, बाहुनाथ सिंह, चांद सिंह, हनुमंत सिंह एवं अन्य बड़े-बड़े जमींदार अपनी संपूर्ण सेना लेकर अवध क स्वतंत्रता के लिए एक और प्रयास करने में लगे थे। इसी भांति शहजादा फिरोजाबाद, जो अभी तब धार में युद्ध कर रहा था, अवध आ पहुंचा था। अपने असाधारण धैर्य का परिचय देकर कोया के दुर्ग की रक्षा करनेवाले वीर पिता के वीर पुत्र नृपति सिंह अवध के संग्राम में भाग लेने के लिए आ पहुंचे थे। उसके पिता जुस्सा सिंह नाना साहब के परम मित्र थे और स्वतंत्रता के युद्ध में ही उन्होंने अपने प्राण विसर्जित किए थे। उन्होंने ही नाना साहब को अपने दुर्ग में आश्रय दिया था। इसी भांति देशप्रेम क पावन प्रेरणा लिये दृढ़ता और उत्साह से बढ़ता राजा वेणीमाधव भी अपने दुर्ग से निकलकर देश-रक्षा हेतु रण-कंकण बांधकर प्रचंड शौर्य का प्रदर्शन करता कानपुर होते हुए लखनऊ के लिए चल पड़ा। जिनकी विजयी होने की आशाएं धूमिल हो गई हों, किंतु जो जाति के सम्मान हेतु मरण का वरण करने चल पड़े हों, उनके साहस का पारावार पा भी कौन सकता है! केवल अपने क्षत्रिय धर्म का निर्वाह करने हेतु वीर वेणीमाधव ने अनुपम साहस का प्रदर्शन किया था। उन्हें तो विजय प्राप्ति की किंचित् मात्र भी आशा नहीं थी। किंतु विलंब से ही क्यों न हो, उसने लखनऊ पर धावा बोल दिया था। उसने लखनऊ नगर में यह विज्ञप्ति भी प्रसारित कर दी कि नगर में रहनेवाले सभी भारतीय नगर छोड़ दें, क्योंकि फिरंगियों पर मेरा प्रचंड प्रहार आरंभ होनेवाला है। विजय से उत्मत्त और पूर्ण अनुशासनबद्ध सेना से सुरक्षित अंग्रेज भी उसकी इस घोषणा, तत्परता और साहस से आश्चर्यचकित हो गए थे। इसमें आश्चर्य की कौन सी बात थी। मृतवत् और साहस से आश्चर्यचकित हो गए थे। इसमें आश्चर्य की कौन सी बात थी। तत्परता अवध एक निमिष मात्र के लिए क्यों न हो पुनः प्राणहान् सा होकर खड़ा हो गया था। लखनऊ पर इससे पूर्व क्रांतिकारियों का जितना प्रबल आक्रमण पहले कभी भी नहीं हो पाया था, वैसा अब होने वाला था। रक्त के सागर से ता अभी भी अवध के अंग सूख नहीं पाए थे, तभी 13 जून 1857 का स्वातंत्र्य समर -394

1857 को होप ग्रांट लखनऊ के समीप नवाबगंज की ओर बढ़ चला, जहां लखनऊ प्रस्थान करने के लिए क्रांतिकारी वीर एकत्र हुए थे। उन्हें अपनी विजय की तो किंचित मात्र भी आशा नहीं थी। उनपर होप ग्रांट सहसा ही अपने गोरे और कोल सैनिकों सहित टूट पड़ा। अन्य कोई सेना होती तो ऐसे आक्रमण की स्थिति में उसका तितर-बितर हो जाना अपरिहार्य था। परंतु हे क्रांतिवीरों, ठहरो; अभी तो मौलवी का निधन हुए आठ दिन भी व्यतीत नहीं हा पाए हैं। अतः रुको! वे रुके और उन्होंने आक्रमण का प्रतिकार करना आरंभ कर दिया। उन्होंने प्रचंड, उत्कर्ष शौर्य का परिचय दिया उसे देखकर तो शत्रुओं के हृदय भी उनकी वीरता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। आंग्ल वीर होप ग्रांट ने भी उनकी वीरता के संबंध में लिखा-“इतने पर भी उनके आ क्रमण बड़े ही प्रचंड होते थे और उन्हें विफल बनाने के लिए हमें कठोर परिश्रम करना पड़ा। सुदृढ़ साहसी जमींदारों ने दो तोपों सहित हमारी सेना के पिछले भाग पर आक्रमण कर दिया। मैंने हिंदुस्थान में अनेक संग्राम देखे हैं और विजय अथवा मृत्यु का वरण करने के लिए कृतसंकल्प सुभट वीरों को भी देखा है, किंतु जिस असाधारण वीरता का प्रदर्शन इन जमींदारों ने किया वैसी वीरता शायद ही कहीं देखी हो। सर्वप्रथम उन्होंने हडसन के अश्वारोही दल पर आक्रमण किया और उसे तितर-बितर कर दिया और उसकी दो तोपें भी विचलित-सी हो गई। उस समय मैंने सातवीं हुजार पलटन के दस्तों को आगे बढ़ने का आदेश दिया, उनके चार तोपें भी थीं। ये तोपें विद्रोहियों पर केवल पांच सौ गज के अंतर से ही अग्नि-वर्षा कर रही थीं। विद्रोही हंसियां से काटे जानेवाले भुट्टों की तरह गिरते जा रहे थे। उनके प्रमुख ने, जो काफी मोटा था, निर्भय होकर दो पताकाएं अपनी तोपों के समक्ष गाड़ दी। वस्तुतः यह वहीं डटे रहने का संकेत था। किंतु हमारी तोपों से इतने प्रचंड प्रहार हो रहे थे कि जो भी उनके समीप आता, धराशायी हो जाता। हमारी सहायता के लिए अन्य दो दस्ते भी आ पहुंचे। अतः बचे हुए विद्रोहियों को हटना पड़ा। फिर भी वे हम पर तलवारें और भाले चमकाते हुए हमें चुनौती देते रहे। केवल उन दो तोपों के चारों ओर ही एक सौ पच्चीस शव पड़े हुए थे। तीन घंटे के संग्राम के उपरांत विजयश्री हमारे हाथ रही।‘’168 इस प्रकार की घमासान मुठभेड़ पूर्वी अवध, मध्य अवध, उत्तरी अवध अथवा संपूर्ण अवध में ही आरंभ हो गई थीं। अपनी पुरानी शमशीरों और तोड़ेदार बंदूकों से ही अवधवासी अंग्रेजी की प्रबल सत्ता को चुनौती दे रहे थे। अंग्रेजों के रचे हुए जाल को उनकी कृपाणें काट डालने में संलग्न हो उठी थीं। इन उग्र हठी रणवीरों के प्रबल पराक्रम का पूर्ण विवरण प्रस्तुत करना तो स्थानाभाव के कारण संभव नहीं है। किंतु इतना कहना ही उपयुक्त होगा कि अवधवासी रणांगण में भयंकर तांडव करने में संलग्न 1857 का स्वातंत्र्य समर – 395 168 होपग्रांट कृत-‘इंसीडेंट्स ऑफ द सेपॉय वार’, पृष्ठ 292 ।

थे। वे केवल आंग्ल शत्रुओं को ही ठिकाने नहीं लगा रहे थे अपितु शत्रु द्वारा क्षमादान दिए जाने की भूलभुलैया में पड़े हुए राजा मान सिंह तथा पावेन नरेश के समान चांडाल देशद्रोहियों पर भी टूट पड़े थे। इस प्रकार अवध के देशभक्तों को दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ रही थी। उन्होंने पावेन पर धावा बोला, लखनऊ में संग्राम जारी रखा, सुलतानपुर में वे शत्रु के भिड़े, उन्होंने नीचे विश्वासघात मान सिंह को उसके दुर्ग में ही बंद कर दिया, अंग्रेजों के लिए प्रत्येक मार्ग में अवरोध उत्पन्न किया, उनकी चौकिया को लूट लिया। उन्होंने अवध के कण-कण को अपने रक्त का अभिषेक देकर पावन बना दिया। उसके चप्पे-चप्पे में आत्मयाग की पताकाएं गाड़ दीं। जहां कहीं भी अंग्रेज उन्हें घेर लेते थे, वे देशभक्त उसे तोड़कर इधर-उधर फैल जाते थे और युद्ध तथा प्रतिशोध का जयघोष जारी रखते थे। जून से अक्तूबर-पर्यंत और अक्तूबर से दिसंबर-पर्यंत अवध रण में जूझता रहा। दक्षिण से और उत्तर से नही अपितु सभी दिशाओं से नित नवीन अंग्रेजी सेनाएं उनपर आकर धावा बोलती थीं। इस प्रकार अनंत शत्रु सैन्य के साथ कृतनिश्चयी अक्तूबर-पर्यंत लोहा लेते रहे। वेणीमाधव के शंकरपुर को अंग्रेजी सेनाओं द्वारा तीन ओर से घेरा गया। शंकरपुर में सेना भी कम थी और रसद भी। वेणीमाधव ने इस स्थिति में भी शस्त्र समर्पित नहीं किए। तब अंग्रेजी सेना के प्रधान सेनापति ने उन्हें स्वतः यह संदेश भेजा कि "तुम्हारे पक्ष के विजयी होने का अब कोई लक्षण दिखाई नहीं देता। अतः तुम यदि युद्ध के हठ को छोड़कर शरण मांग लोगे तो तुम्हें पूर्णरूपेण क्षमा कर तुम्हारी संपत्ति वापस लौटा दी जाएगी।‘’ वेणीमाधव ने उसे उत्तर दिया, "अब मेरे लिए दुर्ग की रक्षा कर पाना संभव नहीं, अतः उसे तो मैं छोड़ रहा हूं; किंतु तुम्हारी शरण में कदापि नहीं आऊंगा, क्योंकि मेरी इस देह पर मेरा अधिकार नहीं है। यह तो मेरे प्रभु की है। किला तुम्हारे हाथ में आ जाएगा, किंतु वेणीमाधव नहीं, कारण? उसकी देह तो स्वराज्य की दास है।‘’169 1857 का स्वातंत्र्य समर - 396 169 चार्ल्स बाल कहता है-‘उपर्युक्त घोषणा के उपरांत भी अवध का संघर्ष विचित्र सा ही रहा। इन सभी विद्रोहियों को जनता की अपूर्व सहानुभूति प्राप्त थी तथा उन्हें आदमियों की कुमुक भी मिलती रहती थी। ये विद्रोही बिना रसद के ही रवाना हो जाते थे, क्योंकि प्रत्येक स्थान पर ही लोग इन्हें खिलाते-पिलाते थे। ये अपना सामान आदि भी बिना किसी प्रहरी के ही छोड़कर चल देते थे, क्योंकि लोग अपने आप ही उसकी रक्षा करते थे। इन विद्रोहियों को प्रति घंटे ही अंग्रेजों की दशा का पूर्णतः आकलन कर लेते थे। प्रत्येक भोजनालय में मेज के समीप खड़े रहनेवाले खानसामा भी विद्रोहियों से गुप्त रूप से सहानुभूति रखते थे। इस कारण हमारी कोई भी योजना गुप्त नहीं रह सकती थी। यों तो अंग्रेजों के शिविर में ही गुप्तचर खड़े होते थे, विद्रोहियों पर अचानक आक्रमण करना इसलिए संभव नहीं था। कोई कौतिक ही हो जाए तो अलग बात थी। क्योंकि एक मुख से दूसरे मुख तक पहुंचनेवाले समाचारों ने तो हमारे अश्वारोही भी मात कर दिए थे।'-खंड 2, पृष्ठ 572 ।

इस बीच सन् 1857 के नवंबर मास में ब्रिटेन की सम्राज्ञी ने अपनी सुप्रसिद्ध घोषणा की और यह भविष्यवाणी भी इस घोषणा के माध्यम से सत्य ही सिद्ध हो गई कि ठीक सौ वर्ष के पश्चात् कंपनी के राज्य का भारत से अंत हो जाएगा, क्योंकि अब हिंदुस्थान से कंपनी की राज्य सत्ता समाप्त हो गई थी और उसके स्थान पर ब्रिटिश सम्राज्ञी का राज्य आरंभ हो गया था। महारानी की घोषणा में यह भी स्पष्ट वचन दिया गया था कि जिस-जिसने भी अंग्रेजों के विरूद्ध विद्रोह किया है, किंतु अपने शस्त्र समर्पित कर दिए हैं और ब्रिटेन की शरण में आ गए हैं, उन्हें सार्वजनिक रूप से क्षमादान दिया जाएगा और उनकी संपत्ति भी जब्त नहीं की जाएगी। इतना ही नहीं, अपितु उनके अपराधों की भी जांच-पड़ताल नहीं की जाएगी।170 इस घोषणा में ही राजा-महाराजाओं को दत्तक पुत्र लेने का अधिकार भी स्वीकार कर लिया गया। ब्रिटेन की महारानी की इसी घोषणा में ही यह अभिवचन भी दिया गया कि जनता के धार्मिक अधिकारों और रूढ़ियों में किंचित् मात्र भी हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा और उपर्युक्त सभी वचनों का पूर्णरूपेण पालन किया जाएगा। महारानी ने अपनी घोषणा में यह भी कहा-“ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यकाल में नागरिक तथा सैनिक पदों पर काम कर रहे वर्तमान कर्मचारियों को हम उन्हीं पदों तथा अधिकारों पर बनाए रखने का भी वचन देते हैं; किंतु भविष्य के नियम-कानूनों का निर्धारण हम स्वेच्छानुसार करेंगे और उन्हें इनका पालन करना होगा। “मैं यह भी घोषणा करती हूं कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने देशी राज्यों और संस्थानों से जो संधियां की हैं अथवा करार किए हैं, उनका अक्षरशः पालन किया जाएगा। दूसरे 1857 का स्वातंत्र्य समर – 397 170 महारानी के इन वचनों का पालन अंग्रेजों ने किस प्रकार किया, इसका परिचय भारतवासियों को भलीभांति मिला है। विभिन्न साहूकारों से जमानती देकर जो लाखों रुपए ऋण के रूप में लिये गए थे वे रुपए साहूकारों को विद्रोही बताकर देने से पूर्णतः इंकार कर दिया गया। इस संबंध में प्रस्तुत उदाहरण नितांत महत्त्वपूर्ण है। क्योंकि सन् 1857 से संबंधित किसी भी इतिहास ग्रंथ में इसकी जानकारी नहीं मिल सकेगी। इतना ही नहीं, अपितु 'लंदन टाइम्स' से लिए श्री रसेल द्वारा प्रेषित संवाद पत्रों में भी इसका कहीं उल्लेख नहीं है। किंतु 'लंदन टाइम्स' के संपादक जॉन डीलन का आत्मचरित प्रकाशित हुआ है। उसमें 'लंदन टाइम्स' के संपादक को भारत स्थित संवाददाता श्री रसेल द्वारा लिखे गए व्यक्तिगत पत्र का भी समावेश है। इस पत्र में लिखा गया है-‘सन् 1849 के जनवरी मास के अंत में भी सर डब्ल्यू. एच. रसेल लॉर्ड क्लाइव के साथ था। लखनऊ से लिखे गए अपने अंतिम पत्रों में से एक में उसने एक रोचक कहानी बताई है, जो उसने प्रधान सेनापति से सुनी थी। इलाहाबाद के अपने मकान मालिक (एक एंग्लो-इंडियन जनरल मर्चेंट) के संबंध में लॉर्ड क्लाइव ने बताया कि तुम ठीक प्रकार जानते हो कि उसने क्या किया? 'नहीं', अच्छा, जब विद्रोह भड़क उठा तब देशी व्यापारियों का उसपर पर्याप्त ऋण था। वह अब स्पेशल कमिश्नर नियुक्त कर दिया गया था और उसने सर्वप्रथम जो कार्य किया वह यह था कि सभी साहूकारों को फांसी के तख्तों पर लटका दिया'।

पक्ष द्वारा भी उनका पालन होगा, ऐसी भी मुझे आशा है। इस समय जितने प्रदेश पर हमारा अधिकार है, उससे अधिक पर अधिकार करने की हमारी इच्छा नहीं है। जिस प्रकार हम अपनी प्रभुसत्ता के अधिकारों तथा मातहत प्रदेशों पर किसी प्रकार का और किसी का भी अतिक्रमण मौन रहकर सहन नहीं करेंगे, उसी प्रकार दूसरे के अधिकारों पर भी कोई आक्रमण करने की अनुमति नहीं देंगे। देशी नरेशों के अधिकार, सम्मान और पद की प्रतिष्ठा का विचार करते हुए हम उनके साथ नितांत आदरपूर्ण व्यवहार करेंगे। हमारी यह भी इच्छा है कि हमारी प्रजा के समान ही वे भी उन्नति करें और आंतरिक शांति, सुरक्षा और सुप्रबंध से प्राप्त होनेवाली सामाजिक प्रगति का भी उन्हें लाभ प्राप्त हो। “हमारी यह भी अभिलाषा है कि हमारे प्रजाजनों में जो भी अपनी शिक्षा, क्षमता एवं कर्त्तव्य के आधार पर योग्यता अर्जित कर ले, तो जाति, धर्म, पंथ किसी का भी विचार न करते हुए उसे निस्संकोच और निष्पक्ष भाव सहित हमारी सेवा में किसी का भी विचार न करते हुए उसे निस्संकोच और निष्पक्ष भाव सहित हमारी सेवा में किसी पद पर भरती किया जाए। “जिन लोगों ने ब्रिटिश प्रजाजनों की हत्या करने में सक्रिय योग दिया हो और जिनके विरूद्ध अभियोग प्रमाणित हो चुका हो, उन अपराधियों के अतिरिक्त अन्य सभी को हम क्षमा देने की भी घोषणा करते हैं। “जो अन्य व्यक्ति अभी तक भी सशस्त्र होकर हमारे विरूद्ध युद्ध कर रहे हैं वे भी यदि अपने ग्रामों को वापस चले जाएंगे, अपने पहले के कामों में लग जाएंगे तो उन्होंने हमारे तथा हमारे शासन के विरूद्ध जो भी अपराध किए हैं, हम उन्हें नितांत कृपा सहित भूल जाने को तत्पर हैं। इस प्रकार महारानी का घोषणापत्र अथवा भारत का भाग्यलेख प्रकाशित किया गया। निस्संदेह, इसका एकमात्र उद्देश्य अवध की क्रांति-ज्वाला पर पानी डालना ही था। किंतु अवध के क्रांतिदूतों को यह घोषणा तनिक भी आकर्षित न कर सकी। महारानी की घोषणा के सर्वथा विपरीत अवध की बेगम ने घोषणा कर दी-“इंग्लैंड की रानी के घोषणापत्र में यह बताया गया है कि देशी नरेशों से कंपनी ने जो संधियां अथवा प्रस्ताव प्रस्तुत किए हैं वह उन सभी का पालन करेंगी। किंतु भारतीय जनता को इस कपटपूर्ण चाल को भलीभांति समझ लेना चाहिए। कंपनी तो संपूर्ण की रानी ने कौन सी नई बात कही है? भरतपुर नरेश को कंपनी ने वचन दिया था कि उसे पुत्रवत् माना जाएगा और दूसरी ओर उसके संपूर्ण राज्य पर भी हाथ साफ कर दिया। लाहौर के अधिपति (दिलीप सिंह) को लंदन में बंदी बनाकर रख दिया गया है। उन्हें भारत नहीं लाया जाता। नवाब शम्सुद्दीन को इन्हीं अंग्रेजों ने एक हाथ से फांसी पर लटकाया और दूसरे हाथ से उसे 1857 का स्वातंत्र्य समर - 398

सलाम करते हुए भी उन्हें तनिक भी लज्जा न आई। सतारा के छत्रपति को, पूना के पेशवा को बंदी बनाया और मृत्युपर्यंत बिठुर में उससे पेंशन चढ़वाते रहे। काशी नरेश को इन्होंने आगरा में बंदी बनाकर रखा। इन्होंने ही बिहार, उत्कल और बंगभूमि के राजाओं को और जागीरदारों को समूल नष्ट कर दिया। इन्होंने अवशिष्ट वेतन का वितरण करने के नाम पर अवध का संपूर्ण पैतृक धन भी हड़प लिया। हां, इतनी कृपा अवश्य ही की कि संधि के 7वें परिच्छेद में इस प्रतिज्ञा का अवश्य ही उल्लेख कर दिया कि भविष्य में और कोई वसूली नहीं की जाएगी। ऐसी स्थिति में जो कुछ कंपनी ने किया है, यदि उसी को स्वीकृत करने की बात इंग्लैंड की रानी करती हो तो पहले की और आज की स्थिति में अंतर ही क्या है? यह सब तो पुरानी ही बातें हैं। किंतु हाल ही में लिखी गई संधि की शर्तों की पूर्णतः उपेक्षा करके और हमारा लाखों रूपए का ऋण उसकी ओर होते हुए भी कंपनी को जब कोई अन्य बहाना हाथ न आया तो 'शासकों के प्रति प्रजा में असंतोष' का कृत्रिम उपालंभ गढ़कर हमारे विपुल धन और करोड़ों रूपए के प्रदेश को हड़प लिया। यदि हमारी प्रजा इससे पूर्व नवाब वाजिद अली शाह के शासनकाल में ही सुखी नहीं थी तो अब हमारे प्रशासन काल में उसे संतुष्ट हो जाने का कारण क्या है? आज हमारी प्रजा हमारे प्रति जितनी श्रद्धा और प्रेम तथा राजनिष्ठा का प्रदर्शन कर रही है उतनी तो शायद ही किसी राजा की प्रजा ने प्रदर्शित की होगी। ऐसी स्थिति में हमारा प्रदेश हमें क्यों नहीं लौटाया जा रहा है? इंग्लैंड की रानी ने यह भी कहा है कि और अधिक प्रदेशों पर विजय प्राप्त कर उन्हें अपने शासन में मिलाने की उनकी कोई इच्छा नहीं है। किंतु इस कथन के बावजूद राज्यों पर दखल करने का कार्य पूर्ववत् चल ही रहा है। किंतु इस कथन के बावजूद राज्यों पर दखल करने का कार्य पूर्ववत् चल ही रहा है। यदि अब उसने संपूर्ण शासन-व्यवस्था अपने हाथों में ले ली है तो फिर हमारे प्रजाजनों द्वारा स्पष्टतः अपनी इच्छा की अभिव्यक्ति कर देने के पश्चात् भी हमारा राज्य हमें वापस क्यों नहीं दिया जा रहा है? “किसी भी राजा अथवा रानी ने आज तक विद्रोह के अपराध में संपूर्ण सेना अथवा संपूर्ण जनता को दंडित नहीं किया, यह सत्य जगद्विख्यात है। सभी को क्षमा किया जाएगा, क्योंकि संपूर्ण सेना अथवा समग्र हिंदुस्थान को दंडित किया जाना कोई भी विचारवान् व्यक्ति कदापि पसंद न करेगा। उन्हें यह भी भलीभांति विदित है कि जब तक दंड का भय विद्यमान रहता है तब तक विद्रोह की ज्वाला भी शांत नहीं हो पाती। “मरता क्या न करता', यह कहावत भी सुप्रसिद्ध ही है। “रानी की घोषणा में कहा गया है कि जिन्होंने विद्रोहियों को आश्रय दिया अथवा विद्रोह को प्रोत्साहित दिया है, उनका पता लगाकर भी उन्हें प्राणदंड नहीं दिया जाएगा, अपितु नाम मात्र का दंड ही दिया जाएगा। किंतु जिन्होंने स्वयं हत्या की है अथवा हत्या करने में सहायता की है, उनके साथ किसी प्रकार को भी दया प्रदर्शित नहीं 1857 का स्वातंत्र्य समर - 399

की जाएगी; किंतु अन्य सभी को क्षमा प्रदान कर दी जाएगी। इस घोषणा को पढ़कर तो कोई मूर्ख भी यह समझ सकता है कि चाहे कोई अपराधी हो अथवा न हो, कोई भी दंडित हुए बिना नहीं रहेगा। इस घोषणा में तो सभी कुछ लिखकर भी कुछ नहीं लिखा गया। किंतु एक तथ्य तो स्पष्टतः उल्लिखित ही है कि जिस किसी का भी क्रांति से संबंध रहा है, ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं छोड़ा जाएगा। यह भी स्पष्ट है कि जिस नगर अथवा अंचल में हमारे सैनिक रूके हैं उस ग्राम के सभी ग्रामीणों को क्षमा नहीं किया जा सकता। शत्रुता से परिपूर्ण रानी की इस घोषणा को पढ़कर मेरे मन में यह चिंता उत्पन्न हो गई है कि हमारी प्रिय प्रजा के साथ क्या व्यवहार किया जाएगा। उस व्यवहार की तो कल्पना मात्र से ही मेरा हृदय भर आता है। अतः मैं स्पष्ट शब्दों में विश्वास दिलाती हूं कि जो ग्राम-प्रमुख अपनी अनभिज्ञता के वशीभूत अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण कर चुके हैं, वे 1 जनवरी, 1857 से पूर्व ही हमारे शिविर में उपस्थित हो जाएं। इस बात में कोई भी संशय नहीं है कि मैं उन्हें क्षमा प्रदान कर दूंगी। हिंदुस्थान के राज्यकर्ता दयालु और उदार रहे हैं, इस अनुभव को ध्यान में रखते हुए हमारी घोषणा पर विश्वास करो। सहस्रों लोगों ने यह अनुभव ग्रहण किया है, लाखों लोगों ने भारतीय शासकों की यह कीर्ति सुनी है; किंतु अंग्रेजों ने कभी एक भी अपराधी को क्षमा किया है, यह किसी ने नहीं सुना होगा।

“इंग्लैंड की रानी की घोषणा में यह भी कहा गया है कि शांति की प्रस्थापना के उपरांत लोगों की स्थिति सुधारने की दृष्टि से राजमार्ग बनेंगे और नवीन नहरों का निर्माण आदि जनहित के कार्य किए जाएंगे। उनके इस आश्वासन से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि वे हिंदुस्थान की जनता को मार्गों के बनाने और नहरे तथा कुएं आदि खोदने से अधिक अन्य कोई महत्त्वपूर्ण कार्य नहीं सौंप सकते।

“इसका अर्थ यदि जनता ने ध्यानपूर्वक समझने की चेष्टा न की तो फिर आशा की कोई भी संभावना नहीं रह जाएगी।

“मैं यही चाहती हूं कि इस घोषणापत्र के भुलावे में किसी को भी नहीं फंसना चाहिए।”

एतदर्थ अब अवध ने बिना शर्त दिए जानेवाले इस क्षमादान को ग्रहण करना अस्वीकार कर दिया। वह अब भी हाथों में तलवार संभाले हुए था, अश्वारूढ़ था। उसके एक-एक खेत में लड़ाई चल रहा थी, रक्त-स्नान हो रहा था और अवध स्वातंत्र्य यज्ञ की ज्वाला में खुलकर भाग ले रहा है। स्वतंत्रता की प्राप्ति अथवा अंतिम समय तक संग्राम, यही उसकी टेक थी। शत्रु के पैरों में पड़ने के स्थान पर शत्रु का गला घोट देना ही उसने अपनी प्रवृत्ति बना ली थी। इस प्रकार सन् 1859 का अप्रैल मास आ जाने पर भी अवध का संग्राम जारी था। शंकरपुर, डुंडिया खेड़ा, रायबरेली, सीतापुर आदि अनेक

1857 का स्वातंत्र्य समर – 400

स्थान इस समय भी रणस्थली बने हुए थे। किंतु इन स्थानों पर हुई पराजय के उपरांत इन क्रांतिवीरों को नेपाल की सीमा तक हटने पर विवश होना पड़ा। अंग्रेजों ने भी अपनी विभिन्न सेनाओं द्वारा इनका पीछा करना जारी रखा। अतः क्रांतिकारियों को अब नेपाल में ही प्रविष्ट होना पड़ा और साथ ही उनमें यह नवीन आशा भी उत्पन्न हुई कि नेपाल का हिंदू राजा उन्हें संरक्षण प्रदान करेगा। इस समय नेपाल में प्रविष्ट होनेवाले क्रांतिकारियों की संख्या साठ हजार थी। बेगम, उसका पुत्र और तरूण नवाब, नाना साहब तथा बाला साहब ही इनके नेता थे। उन्हें नेपाल के जंगबहादुर का पुत्र मिला था, जिसके उत्तर में नाना साहब और बेगम ने उसे दो पत्र लिखे थे। इनमें से भी नाना साहब का पत्र सुस्पष्ट, मुंहतोड़ तथा मार्मिक था। उसका एक अंश यहां देना उपयुक्त रहेगा। उन्होंने लिखा था- "आपका पत्र प्राप्त हुआ। आपकी उदारता की ख्याति हम अब तक दूर से ही सुन रहे थे। हमने भारत के अनेक प्राचीन राजाओं का इतिहास पढ़ा है तथा नरेशों के भी गुण-दोषों से हम परिचित हैं। तब भी हम यह बात निश्चय के साथ कह सकते हैं कि आपकी समानता किया है उनमें से कोई भी नहीं कर सकता; क्योंकि जिन अंग्रेजों ने आपकी प्रजा से भी दुर्व्यवहार नहीं दिखाया। उनके आग्रह मात्र पर ही आप तत्काल उनकी सहायता के लिए दौड़ पड़े, आपकी निस्सीम उदारता सब पर स्पष्ट हो गई। आज जैसे उदारमना व्यक्ति ने जब प्रत्येक दृष्टि से अपने विरोधी शत्रु की भी सहायता की तो मैं भी आपसे आशा करता हूं कि आपके प्रजाजनों से पेशवाओं के जो वंशज सदैव ही मैत्री और उदारतापूर्ण व्यवहार अपेक्षा अस्वाभाविक है? और विशेषतः उस स्थिति में जबकि आपने कट्टर शत्रु अंग्रेजों-की मुक्त हस्त से सहायता की हैः जिसने अपने शत्रु को अपने घर में सादर नहीं सुना है कि अनेकानेक अन्यायों, दिए गए वचनों के स्पष्टतः उल्लंघन और अनेक संधियों के भंग किए जाने से हिंदुस्थान अंग्रेजों द्वारा किस प्रकार सताया जा रहा है। इसका विवरण यहां प्रस्तुत किया जाना आवश्यक नहीं है। स्वराज्य के अतिरिक्त अंग्रेज हिंदुस्थान के लोगों के धर्म को नष्ट करने के लिए किस प्रकार प्रवृत्त हैं, यह भी जगद्विख्यात है। इन्हीं कारणों से यह क्रांतियुद्ध आरंभ हुआ है। मैं अपने भाई बाबा साहब पेशवा को आपके पास भेज रहा हूं, जिससे कि वे आपसे मिलकर अन्य बातों को विस्तृत रूप से आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे।"171 इस पत्र पर पेशवा की राजमुद्रा भी अंकित की गई। पत्र के पहुंचने के उपरांत 1857 का स्वातंत्र्य समर – 401 171 चार्ल्स बाल कृत-'इंडियन म्यूटिनी', खंड 2 ।

पर्याप्त विचार-विमर्श भी हुआ। विद्रोहियों से भेंट करने के लिए जब जंगबहादुर ने अपने एक सरदार कर्नल बलभद्र को भेजा तो उसे भी विद्रोहियों की सेना के प्रमुखों ने स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया कि "हम हिंदू धर्म की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। महाराज जंगबहादुर (नेपाल-नरेश) भी हिंदू ही हैं, अतः उन्हें हमारी सहायता अवश्य करनी चाहिए" तब उस सरदार ने उनसे प्रश्न किया कि "आपके कार्य करने का उद्देश्य क्या है?" इसके उत्तर में विद्रोही पक्ष के उस प्रतिनिधि ने उसे उत्तर दिया, "हमारे पास अभी भी साठ हजार लड़ाकू जवान हैं। जंगबहादुर ने अंग्रेजों को सहायता दी है; किंतु यदि वे हमें पचास लड़ाकू हजार गुरखा सैनिक दे दें तो मैं उन्हें अंग्रेजों की अपेक्षा दुगुना वेतन दे सकता हूं। यदि वे ऐसा न कर सकते हों तो हमें केवल अपने सुयोग्य सेनापति ही दे दें। मैं पुनः हिंदुस्थान में जाकर अंग्रेजों को कलकत्ता तक भगा सकता हूं और हम जो भी प्रदेश जीतेंगे, उसपर नेपाल राज्य का आधिपत्य होगा, और यदि हो सके तो उसके पश्चात् महाराज हमें अपने राज्य में आश्रय दे दें। हम उनके आज्ञाकारी बनकर वहां रहेंगे।" ये बातें सुनकर सरदार बलभद्र बोला, "किंतु ब्रिटिश सरकार तो कृपा-दृष्टि कर रही है, आप लोग उसके समक्ष आत्मसमर्पण क्यों नहीं कर देते?" इस पर क्रांतिकारी नेताओं ने उसे उत्तर दिया, "हमें अंग्रेजों की वह घोषणा सुन ली है। किंतु दूसरों को मृत्यु के मुख में धकेलकर हम अपनी जीवन-रक्षा करना नहीं चाहते। हम ब्रिटेन के समक्ष आत्मसमर्पण कदापि नहीं करेंगे।" इस प्रकार की अनेक वार्त्ताओं के उपरांत जंगबहादुर ने विद्रोहियों को स्पष्ट उत्तर दिया कि "यदि मुझे तुम्हारी सहायता ही करनी होती तो मैं लखनऊ में तुम लोगों की हत्या कराने हेतु अपनी सेनाएं ही क्यों भेजता?" इतना अधिक नीचतापूर्ण उत्तर देकर ही उसने बस नहीं की अपितु उसने अंग्रेजों को नेपाल में प्रवेश कर क्रांतिकारियों का शिकार करने की पूरी-पूरी छूट भी दे दी। अब सभी आरे से सर्वथा निराश होकर क्रांतिकारी सिपाही अपने-अपने शस्त्रास्त्र छिपाकर अपने घरों को जाने लगे। अब उन्हें उभारने में लाभ न होता देखकर अंग्रेजों ने भी उन्हें छेड़ने का प्रयास नहीं किया। जो क्रांतिकारी अपने घरों को न लौटे वे वन में ही उपवास कर आत्मार्पण करने लगे। इन्हीं दिनों नाना साहब ने प्रमुख ब्रिटिश सेनापति होप ग्रांट को भी एक पत्र लिखा था। अपने इस पत्र में उन्होंने ब्रिटिश कूटनीति की घोर भर्त्सना की तथा विस्तृत आलोचना करने के पश्चात् लिखा था-"What right have to occupy India and declare me an outlaw" (हिंदुस्थान पर राज्य करने का अधिकार तुम्हें किसने दिया है? तुम विदेशी हमारे राजा हो तो क्या मैं चोर हूं?) इतिहास ने नाना साहब के नाम पर ये ही अंतिम शब्द संगृहीत रखे हैं। ये शब्द क्या हैं, वस्तुतः बालाजी विश्वनाथ पेशवा के सिंहासन का अंतिम उच्छ्वास है। 1857 का स्वातंत्र्य समर - 402

शिवाजी के अंतिम उत्तराधिकारी के योग्य, सुदृढ़, न्यायपूर्ण, आत्मभिमान और शान की शोभ बढ़ानेवाले ही ये शब्द हैं। बाजीराव द्वितीय की नपुंसकता के कलंक को रक्त ही शत्-शत् धाराओ से नहलाकर निष्कलंक कर दिया गया था और पेशवा का वह विशुद्ध राजसिंह चित्तौड़ की राजपूतानियों के समान लड़ते, झगड़ते, जलते तथा देदीप्यमान अग्नि ज्वालामालाओं को विस्फारित करते हुए विश्व के रंगमंच से विलुप्त हो गया। उनकी अंतिम आह इन्हीं शब्दों से निकली थी-‘'परकीय हिंदुस्थान के राजा और हम हिंदू-भूमि के ही पुत्र हिंदुस्थान में चोर बना दिए गए हैं।'' इस पत्र के लिखने के पश्चात् नाना साहब का क्या हुआ, इस संबंध में इतिहास मौन है। स्वेच्छा सहित अंगीकृत दरिद्रता में ही बाला साहब का इन्हीं दिनों वनों में ही स्वर्गवास हो गया। तदुपरांत अवध की बेगम और तरूण राजकुमार को नेपाल में अनुमति प्रदान कर दी गई। महान् हुतात्मा गजराज सिंह नामक एक अन्य क्रांतिकारी नेता भी बाद में हुए एक संघर्ष में देवलोकगामी हुआ। इस प्रकार अवध में क्रांतियुद्ध की इतिश्री हो गई। अपनी स्वतंत्रता हेतु अवध ने कितनी वीरता सहित संघर्ष किया था, इसका विवरण शत्रु द्वारा प्रस्तुत किए गए विवरण से ही पढ़ना उचित होगा। स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए इतने महान् हठ और पराक्रम सहित क्या विश्व के किसी अन्य देश ने संघर्ष किया होगा? मैलसन ने लिखा है-‘'सिपाहियों ने स्वतंत्रता के लिए जिस क्रांतियुद्ध का श्रीगणेश किया था उसमें अवध की प्रजा ने बढ़-चढ़कर भाग लिया था। वे स्वदेश की स्वतंत्रता के लिए जूझ पड़े। वे कितनी वीरता सहित संग्राम कर रहे थे, इसका विवरण हम प्रस्तुत कर चुके हैं। किंतु कितने दीर्घकाल तक अवध की जनता संग्राम करती रही उतनी वीरता से हिंदुस्थान के अन्य किसी भी अंचल में संग्राम नहीं हुआ था। सन् 1856 के मध्य से ही उनपर जो अत्याचार और अन्याय हुए थे, इससे उनका अंतःकरण इस्पात के समान कठोर हो गया था और उन्होंने सुदृढ़ संकल्प भी ग्रहण कर लिया था। सदा-कदा उन्हें मारकर पलायन भी करना पड़ जाता था। इस आशा से ही वे ऐसा करते थे कि किसी अन्य मारकर पलायन भी करना पड़ जाता था। इस आशा से ही वे ऐसा करते थे कि किसी अन्य दिवस वे विजय के लिए संघर्ष करेंगे। अंततः लॉर्ड क्लाइव ने अवध पर एक प्रचंड बवंडर के समान अंतिम आक्रमण किया। शेष बचे सैनिकों को नेपाल के वनों में आश्रय ढूंढ़ने पर विवश होना पड़ा। वहां भी जो वीर बचे रह गए थे, उन्होंने आत्मसमर्पण करने के स्थान पर उपवास करते हुए आत्मार्पण करना वरेण्य माना। दीर्घकाल तक चले इस संघर्ष में जब उन्हें विजय की कोई आशा नहीं रही तो अवध के श्रमिकों, कृषको, तालुकेदारों, भूमिधरों और व्यापारियों ने पराजय स्वीकार कर ली।‘’172 1857 का स्वातंत्र्य समर - 403 172 मैलसन कृत-'इंडियन म्युटिनी', खंड 5, पृष्ठ 207 ।

प्रकरण-2 पूर्णाहूति दिनांक 20 जून को ग्वालियर की रणभूमि में हुए घनघोर संग्राम में रणलक्ष्मी लक्ष्मीबाई की पराजय हो गई थी। इस कारण अंग्रेजों को अपने एक दृढ़ निश्चयी शत्रु से मुक्ति मिल गई थी। किंतु अभी रानी से भी अधिक एक दृढ़ निश्चयी शत्रु, जो रण-कौशल में लक्ष्मीबाई की अपेक्षा अधिक सिद्धहस्त था, रणभूमि से पलायन कर अंग्रेजों को झांसा दे गया था। ग्वालियर की रणभूमि में वह 20 मई को ओझल हुआ था तो जावरा और अलीपुर की रणभूमि से भी बच निकलने में सफल हो गया। यत्र-तत्र तात्या टोपे कुद ही दिनों में मध्य हिंदुस्थान के सभी वन, गुफाएं, ग्राम, नगर, पर्वत सभी से प्रचंड रण-गर्जनाएं होने लगीं और यत्र-तत्र 'तात्या टोपे! तात्या टोपे' का ही स्वर गूंज उठा। इसका कारण यह था कि शिकारी के भालों से घिरा हुआ यह मराठा सिंह अब विवश होकर मध्य भारत के जंगलों में घुस गया था। ग्वालियर की रणभूमि में रानी लक्ष्मीबाई के बलिदान हो जाने के कारण मानो उसका दाहिना हाथ ही कट गया था। अनेक पराजयों के फलस्वरूप क्रांति दब-सी गई थी। श्रीमंत नाना साहब से तो सदा के लिए ही बिछुड़ चुका था। कुछ भारतीयों के ही विश्वासघात के कारण अब अंग्रेजी सत्ता अपने अजेय होने का दंभ भर रही थी। इधर तात्या के पास न तो उत्तम सेना थी 1857 का स्वातंत्र्य समर - 404

और न ही तोपें तथा धन ही। उसके पास तो रसद का भी अभाव था। इसे तो इन साधनों के कहीं से उपलब्ध होने की भी आशा नहीं थी, किंतु इस सारी स्थिति में ही अंकुंठित धैर्य रखनेवाला तात्या टोपे, संपूर्ण आपदाओं और विपरीत परिस्थितियों में भी झुका नहीं और नह ही उसने स्वतंत्रता के प्रतीक भगवा ध्वज को ही झुकने दिया। शत्रु के समक्ष अपनी मत्ताका झुकाना-नहीं, यह महापाप कदापि नहीं होगा; क्योंकि भगवा ध्वज का दंड ही ऐसे वृक्ष से निर्मित हुआ है कि उसे कभी शत्रु तोड़ तो सकता है, किंतु वह शत्रुओं के आगे झुक कदापि नहीं सकता। ग्वालियर और जावरा तथा अलीपुर में मिली पराजयों के पश्चात् अपनी बची खुची सेनाओं को लेकर तात्या और राव साहब पेशवा सरमथुरा नामक ग्राम में चले गए। यहीं उन्होंने अपनी संपूर्ण युद्ध योजना के तीन महत्त्वपूर्ण सिद्धांत निर्धारित किए। प्रथम यह कि अब किसी भी स्थान पर प्रत्यक्ष युद्ध नहीं लड़ा जाएगा। दूसरा सिद्धांत यह निर्धारित किया कि चाहे कोई भी स्थिति क्यों न हो, प्रत्यक्ष युद्ध न करते हुए छापामार युद्ध का अनुगमन कर अंग्रेजी सेना को छकाया जाएगा। परंतु इन दोनों निर्धारित सिद्धांतों को कार्यान्वित करने के लिए भी तो रसद और शस्त्रों की प्राप्ति अनिवार्य थी। इस समस्या का निदान करने हेतु तात्या ने तीसरा सिद्धांत यह निर्धारित किया कि मार्ग में जो भी देशी रियासतें मिलेंगी उनसे उनकी इच्छा से अथवा कठोरता सहित शस्त्रास्त्र और धन प्राप्त किया जाएगा। उत्तर और मध्य भारत में तो पग-पग पर देशी रियासतें विद्यमान थीं। प्रत्येक राज्य में ही वर्ष भर के लिए सैनिकों के लिए रसद तथा आवश्यक शस्त्रास्त्र जमा रहते थे। उस रसद और उन शस्त्रास्त्रों को प्रदेश की रक्षा में लगाना ही तो इन नरेशों का प्राथमिक कर्तव्य था। परंतु सन् 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम में इस भूमि और उसमें निवास करनेवाली अपनी प्रजा की इच्छा एवं दृढ़ आशा को फलीभूत करने के स्थान पर इन नरेशों ने अपने व्यक्तिगत लाभ को ही महत्त्व दिया था। इसी कारण ये क्रांतिकारियों के साथ खुला सहयोग नहीं कर सके थे। अतः उनके पास इस समय भी रसद और शस्त्रास्त्र निरूपयोगी होकर पड़े हुए थे। वे अपने राज्यों में उत्पन्न हुए अन्न को भी दबाकर बैठे थे। वे व्यर्थ ही संग्रह किए हुए थे और दूसरी ओर देशभक्त और स्वतः देशमाता भी दरिद्रता में जीवनयापन कर रही थी। ऐसी स्थिति में इन विश्वासघाती जमाखोरों को उत्तम योजना बनाई। अपनी इस योजना के द्वारा उन्होंने स्वातंत्र्य सैनिकों के भोजन के लिए खाद्य सामग्री और युद्ध का कोई दबाव न पड़ेगा, अपितु इन नरेशों से युद्ध-कर की वसूली की जाएगी। इन नरेशों के पास तो नाममात्र के लिए ही सेना थी, अतः उनपर यह 'युद्ध-कर' लादना भी कोई कठिन कार्य सिद्ध न होगा। साथ ही इन देशी राज्यों के पास-पास स्थित होने के कारण खाद्य सामग्री को एक स्थान से ढोकर 1857 का स्वातंत्र्य समर - 405

दूसरे स्थान पर ले जाने की कठिनाई भी नहीं उठानी पड़ेगी। इन दोनों सेनानियों ने निश्चय कर लिया था कि यदि उनके आह्वान मात्र से ये देशी नरेश उनकी योजना को स्वीकार कर लें तो अच्छा है, अन्यथा उन्हें ऐसा करने के लिए विवश किया जाएगा। इन्हीं तीन सिद्धांतों के आधार पर तात्या ने अपने नितांत विस्मयकारक रण-तांडव की संपूर्ण रचना की थी। किंतु अंग्रेजों की यह सहज कल्पना थी कि ऐसी विपन्न अवस्था में किसी भी मनुष्य का बहुत दिनों तक प्रयत्न करते रहना असंभव है। यही समझकर उन्होंने यह धारणा भी बना ली कि अलीपुर में उनका दबाव पड़ने के कारण तात्या के पलायन करते ही वहां से विद्रोह समाप्त हो गया है। इसके साथ ही उन्होंने तात्या को चारों ओर से घेरकर एक-डेढ़ मास में ही आत्मसमर्पण कर देने का विवश बनाने के लिए अपनी सेनाएं भी भेज दीं। ग्वालियर, झांसी, शिवपुरी और गुना-सभी ओर ब्रिटिश सेना छा गई थी, तो राजस्थान में भी रॉबर्ट ने अपनी सेना डटा दी थी। इस प्रकार अंग्रेजों की सेनाओं ने चारों ओर से ही अपनी व्यूह में तात्या को घेर लिया था और अब देखना यह था कि तात्या इस व्यूह से किस प्रकार निकलता है! तात्या की प्रथम दृष्टि भरतपुर पर केंद्रित हुई थी। किंतु वहां अंग्रेजी सेना के पहुंच जाने का समाचार प्राप्त होते ही उसने जयपुर की दिशा में अपने पग बढ़ा दिए। जयपुर के राजदरबार में तात्या से सहानुभूति रखनेवाले अनेक व्यक्ति तो थे ही, साथ ही वहां की सेना और जनता का झुकाव भी तात्या क ओर था। अतः तात्या ने वहां अपना दूत भेजकर अपने शुभचिंतकों को सावधान और सन्नद्ध रहने का निर्देश दिया। किंतु यह सूचना अंग्रेजी सेना के हाथ भी लग गई, अतः उसने तत्काल ही नसीराबाद से जयपुर की ओर प्रस्थान कर दिया। जयपुर की यह स्थिति देखकर तात्या ने दक्षिण दिशा में प्रस्थान कर दिया। उसके पीछे कर्नल होम्स भी अपनी सेना सहित लगा ही हुआ था। यहां तात्या टोपे ने अपने प्रचंड बुद्धि-कौशल का परिचय देते हुए इस सेना को झांसा दिया और टौंक राज्य पर धावा बोल दिया। वा'के नवाब ने नगर के द्वार पर बंद करा दिए और तात्या का प्रतिरोध करने के लिए अपने कुछ सैनिकों को चार तोपों सहित नगर के बाहर भेज दिया। भयंकर संग्राम हो सकता था, किंतु टौंक के इन सैनिकों ने नितांत ही मैत्रीपूर्ण ढंग से तात्या के सैनिकों का अभिनंदन किया। उन्होंने अपनी चारों तोपें भी तात्या को समर्पित कर दीं। इस प्रकार इस नवीन सेना और नवीन तोपों को प्राप्त कर तात्या ने निश्चिंत होकर दक्षिण दिशा में प्रस्थान कर दिया। तात्या टोपे ने इंद्रगढ़ पहुंचकर वहां कुछ समय विश्राम किया। किंतु उसके पीछे ही होम्स की सेना तथा दूसरी ओर से रॉबर्ट की सेना भी आ रही थी। उन दिनों घनघोर वर्षा की झड़ी लगी हुई थी, इस कारण चंबल भी जल से लबालब भरी अपने रोद्र रूप का प्रदर्शन कर रही थी। तात्या के पीछे से शत्रु बढ़ा आ रहा था तो सामने थी बाढ़ से परिपूर्ण चंबल नदी। तात्या उत्तर-पूर्व की ओर मुड़कर बूंदी जा पहुंचा। वहां से बड़ी चतुराई और सफलता सहित शत्रुओं को 1857 का स्वातंत्र्य समर -406