भारतकोश
१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)

1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar

विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा

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आशा में रंगों बापूजी लंदन के लीडन हॉल स्ट्रीट की सीढ़ियां कितनी बार चढ़े-उतरेंगे। अपमान होने तक-मजाक बनाएं जाने तक-करोड़ों रुपए अंग्रेज बैरिस्टरों की जेब में पहुंचाने पर लौटने के लिए दमड़ी भी न बचने तक-और अंत में हम सतारा नहीं देंगे, ऐसा गर्वीला उत्तर मिलने तक रंगों बापूजी लंदन का मृगजल पीते रहें। जब रंगों बापूजी लंदन जाने की तैयारी में लगे थे तब डलहौजी का ध्यान दूसरा षड़यंत्र रचने में लगा था। मराठा सत्ता का एक पौधा, नागपुर की गद्दी के स्वामी राघोजी भोंसले अपनी आयु के सैंतालिसवें वर्ष में ही अचानक स्वर्ग नाश का कारण बना। जिन्हें यह ज्ञात रहा कि अंग्रेज हमसे द्वेष करते हैं वे बच गए। परंतु जिन्होंने भी यह माना कि अंग्रेजों से हमारा स्नेह है, उनकी गरदन मीठी छुरी से कटी। विदर्भ का राज्य अंग्रेजों की जागीर नहीं थी या वह उनकी मातहत रियासत भी नहीं थी; वह एक स्वतंत्र और बराबरी की सरकार थी। ऐसे राज्य का राजा निस्संतान मर गया तो उस राज्य को अधिग्रहण करने का अधिकार किस पूर्व या पश्चिम के न्याय से मिलता है, यह सिद्ध करके दिखाने के लिए जे. सिल्वियन ने अंग्रेज सरकार का आह्वान किया था। सारी मिलीभगत। एक खाए, दूसरा हजम करे। एक गला काटे, दूसरा पूछे कि किस प्रकार से गला काटा? मानो गला काटनेवालों को कानून का बहुत डर रहता है। सन् 1843 में डलहौजी ने अपने मित्र की गरदन उतार दी। कारण दिखाया-राजा ने दत्तक लिया ही नहीं था। राजे राघोजी संतान-प्राप्ति की संभावना की आयु में एकाएक दिवंगत हो गए। उसमें यदि वे दत्तक न लेते हुए दिवंगत हुए थे तो भी वह अधिकार उनकी पत्नी को प्राप्त था। राजा की मृत्यु के बाद राजपत्नी द्वारा लिये एग दत्तक, 1834 में धार की राजपत्नी द्वारा लिया दत्तकए 1841 में किशनगढ़ की रानी का लिया हुआ दत्तक-एक-दो नहीं अनेक दत्तक अंग्रेजों ने स्वीकार किए थे। परंतु उस समय उन्हें स्वीकारने में लाभ था और आज राघोजी के पीछे उनकी पत्नी द्वारा लिये गए दत्तक को नकारने में लाभ था। क्या लाभकारी था, यह मुख्य प्रश्न था और उसी के अनुसार सारी बातें तय होती थीं। दत्तक नहीं लिया, इसलिए सतारा का राज्य अधिग्रहित किया तो लिया हुआ दत्तक वारिस नहीं होता, इसलिए सतारा का राज्य अधिगृहीत किया। अपने प्राण बचाने की वास्तविकता इच्छा हो तो तर्कशास्त्र के चक्कर में न पड़ें, यही उचित है! नागपुर का राज्य अधिग्रहण कर डलहौजी ने 76, 432 वर्ग मील का विस्तीर्ण प्रदेश, 46,50,000 जनसंख्या और 5 लाख वार्षिक आमदनी का राज्य हड़प लिया। राजवंश की गरीब रानियां दुःख से रो रही थी। ठीक उसी समय राजमहल के दरवाजे को 1857 का स्वातंत्र्य समर - 51