१८५७ का स्वातंत्र्य समर (वीर विनायक दामोदर सावरकर)
1857: The Indian War of Independence by Veer Savarkar
विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंखटखटाया गया। कौन है, यह देखने के लिए द्वार खोला तो अंग्रेजों के सिपाही महल में घुसने लगे। तबेले से घोड़े छोड़े गए, हाथी पर बैठी रानियों को नीचे उतारकर उन हाथियों को बाजार में बिकने भेजा गया-वैसे ही राजमहल की सोने-चांदी की वस्तुएं छीन-छीनकर नागपुर के बाजारों में बिकने के लिए रखी गई। राजपत्नी के कंठ में शोभित हार बाजार में धूल खाता पड़ा रहा। हाथी जहां सौ रूपए में बिका, उसी नीलामी में घोड़े की कीमत-जिस घोड़े को डलहौजी के घोड़े से अधिक मूल्यवान खुराक मिलती थी उस घोड़े की कीमत-बीस रूपये और दूसरा जोड़ा पांच रूपए में बिका, क्या आश्चर्य! हाथी और हाथी के हौदे, घोड़े और बैलों की पीठ की झूलें बेची गई। शरीर के सरे अलंकार छिन जाने से रानियां निष्कांचन हो गई। फिर भी अंग्रेजों का स्नेह कम नहीं हुआ था। फिर राजभवन खोदा जाने लगा।16 स्वयं रनी के शयनकक्ष में फिरंगियों की कुदाल चली। पाठक! ठहरें, इतनी जल्दी शरीर में सिहरन मत आनें दें, क्योंकि यह खुदाई अभी तो आगे भी चलेगी। देखिए, वह रानी के शयनकक्ष के पलंग को तोड-फोड़कर भूमि खोदने लगा। और यह कब? जब बराबर के कक्ष में राजपत्नी अन्नपूर्णाबाई जीवन के अंतिम क्षण गिन रही थी। नागपुर के भोंसले घराने की रानी के शयन के पवित्र पलंग पर बैठकर अंग्रेज उस अंतिम सांस के ताल पर कुदाली चला रहे हैं। और अपराध कौन सा? वह यह कि राजा राघोजी दत्तक लेने से पहले स्वर्गवासी हो गए। अन्नपूर्णाबाई अंततः उस असह्य अपमान से मर गई। परंतु रानी बांकाबाई की विलायत से न्याय पाने की आशा अभी नहीं मरी थी। पर जल्दी ही अंग्रेजी डॉक्टरों को लाखों रूपए चराने के बाद उन्होंने जो रामबाण औषधियां दीं उनसे वह आशा भी निजधाम चली गई। फिर रानी बांकाबाई क्या कर रही थी? वह अपनी शेष आयु ‘राजनिष्ठा’ में बिता रही थी। जब सन् १८५७ में झांसी में बिजली कड़क रही थी तब इधर ‘बांका’ नागपुर में अपने पुत्रों के मन में स्वराज्य के लिए तलवार उठाने की इच्छा जाग्रत होने की संभावना को देख “मैं स्वयं तुम्हारे नाम सरकार को बताऊंगी और तुम्हारे सिर कलम करने की सलाह दूंगी”-ऐसी धौंस दे रही थी। कुल-कलंकिनी बांका, जा पड़ नरक में-यदि वहां भी देशद्रोहियों को प्रवेश हो तो। 1857 का स्वातंत्र्य समर – 52 16 डलहौजीज एडमिनिस्ट्रेन', पृष्ठ 165-68 ।